December 06, 2016

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नहीं दिख रहे संसद में गतिरोध खत्म होने के आसार

भाजपा नियम 56 के तहत कार्यस्थगन प्रस्ताव पर चर्चा कराने को तैयार नहीं हो रही है और पिछले 15 दिनों से संसद के दोनों सदनों में कामकाज सामान्य रूप से नहीं हो रहा है।

Author नई दिल्ली | December 2, 2016 04:58 am
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में हंगामा करता विपक्ष। (PTI Photo/ TV GRAB)

विपक्ष के एकजुट दिखने के भय से सत्ता पक्ष भाजपा नियम 56 के तहत कार्यस्थगन प्रस्ताव पर चर्चा कराने को तैयार नहीं हो रही है और पिछले 15 दिनों से संसद के दोनों सदनों में कामकाज सामान्य रूप से नहीं हो रहा है। सरकार संसद के माध्यम से लोगों में नोटबंदी को जायज ठहराने के प्रयास करने के लिए ही हंगामे के बीच में ही 28 नवंबर को कराधान विधि (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2016 को पेश करके दूसरे दिन व्हिप जारी करके लोकसभा से पास करवा लिया। जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर विषय पर बोलने के लिए जाने जाते हैं और आठ नवंबर की नोटबंदी (पांच सौ और हजार के नोट चलन से बाहर करने) पर सदन के बाहर लगातार बोल रहे हैं वे संसद परिसर के अपने दफ्तर में दिनभर बैठने और संसद के दोनों सदनों में कुछ-कुछ देरी के लिए जाते रहने के बावजूद सदन में बोलने को तैयार नहीं हो रहे हैं। नोटबंदी पर समय बीतने के बाद लगता है सरकार लोगों को नोटबंदी की परेशानियों को झेलने का अभ्यस्त बनने का इंतजार कर रही है या इसी हंगामे में संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने देना चाहती है। नोटबंदी पर बार-बार बदलाव की बात करके सरकार खुद यह संदेश दे रही है कि नोटबंदी की उसकी तैयारी पूरी नहीं थी।

विपक्ष की भी समस्या सत्तापक्ष से कम नहीं है। एक तो विपक्ष बंटा हुआ तो है ही, कई दलों का रुख नोटबंदी पर बदलता जा रहा है। कई दल ऐसे हैं जिनका सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्षी दल से ही विरोध ज्यादा है। पहले ही दिन से विपक्ष दोनों ही सदनों में नियम 56 के तहत नोटबंदी पर चर्चा कराने के लिए नोटिस दिए हुए था। सरकार नियम 193 के तहत चर्चा करवाने पर तैयार थी। नियम 193 के तहत चर्चा के बाद मतविभाजन नहीं होता है और नियम 56 में चर्चा के बाद मत विभाजन अनिवार्य है। राज्यसभा में तो शून्यकाल में नोटबंदी पर चर्चा शुरू करके विपक्ष फंस गया। कई नेताओं के भाषण के बाद विपक्ष को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने चर्चा के समय प्रधानमंत्री को मौजूद रहने और चर्चा का उनसे ही जवाब दिलवाने की मांग शुरू कर दी। बाद में उसमें सदन के बाहर प्रधानमंत्री के एक भाषण का हवाला देकर उनसे माफी की मांग शुरू कर दी, जो अब तक चल रही है। इसके चलते राज्यसभा की कार्यवाही ठीक से नहीं चल पा रही है।लोकसभा का किस्सा दूसरा ही है।

राज्यसभा में तो सरकार अल्पमत में है लेकिन उससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। लोकसभा में सरकार को सामान्य बहुमत से ज्यादा समर्थन है, इसलिए किसी भी तरह से मतदान होने पर सरकार के गिरने का खतरा नहीं है। वित्त मंत्री अरुण जेटली, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू से लेकर संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार तक हर रोज लोकसभा में किसी भी नियम के तहत चर्चा करवाने और उस चर्चा में प्रधानमंत्री के शामिल होने की बात कह चुके हैं। राजनाथ सिंह ने तो चर्चा के नियम के बारे में अध्यक्ष पर छोड़ दिया। अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने नियम 56 के तहत कार्यस्थगन प्रस्ताव को शुरू में ही नामंजूर कर दिया था। आज ही शून्यकाल में उन्होंने कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे, तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय आदि को बोलने की इजाजत दे दी लेकिन नियम पूछने पर शून्यकाल का जैसे ही हवाला दिया विपक्ष के सदस्य भड़क गए और वे अध्यक्ष के आसन के सामने आकर हर रोज की तरह नारेबाजी करने लगे। जवाब में पहली बार सत्ता पक्ष के सदस्य भी पूरे जोर-शोर से प्रधानमंत्री के पक्ष में नारे लगाने लगे और बाकी दिनों की तरह गुरुवार को भी लोकसभा की कार्यवाही करीब साढ़े बारह बजे खत्म हो गई।

विपक्ष की समस्या यह है कि सभी निजी एजंडे पर काम कर रहे हैं। पहले सत्ता पक्ष की शिवसेना ने सरकार का विरोध किया तो विपक्ष के नेताओं की बांछें खिल उठी। लेकिन जनता दल (एकी) अध्यक्ष नीतीश कुमार के समर्थन और बीजू जनता दल के मौन समर्थन से विपक्ष परेशान हुआ। विपक्ष में तृणमूल कांग्रेस और आप नोटबंदी की वापसी की मांग कर रहे हैं जबकि सदन में सबसे बड़ा दल कांग्रेस और एआइडीएमके आदि दल नोटबंदी के तरीके और लोगों को होने वाली परेशानी पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस, वामदल इसमें भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठा रहे हैं। बसपा और सपा भी सरकार का उसी तरह से अलग-अलग विरोध कर रहे हैं जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस और वाम दल या एआइडीएमके और डीएमके। यह सूची काफी लंबी है और कई दल तो ऐसे हैं जिनका लोकसभा में कोई सदस्य ही नहीं है। विपक्षी नेताओं को लगता है कि चर्चा के बाद अगर मतदान होगा तो सरकार के खिलाफ वोट देने वालों में वे विपक्षी दल भी शामिल हो जाएंगे जो कई कारणों से सीधे सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी नहीं किए हुए हैं।

संसद में हंगामे का दृश्य भी अजीब दिखता है। विरोध करते तृणमूल कांग्रेस के सदस्य तो सबसे पहले बेल में जाते हैं। कांग्रेस के कभी पूरे तो कभी आधे सदस्य बेल में होते हैं तो एआइडीएमके के सदस्य बेल के बजाए गैलरी में खड़े होकर नारे लगाते हैं तो सपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, राजद आदि के सदस्य अपनी जगह से खड़े होकर विरोध करते हैं। वाईआरएस कांग्रेस सदन में सरकार के साथ और बाहर विरोधी है, उसी तरह से बीजू जनता दल और तेलुगु देशम सरकार के साथ हैं लेकिन उसके नेता लोगों की परेशानियों पर बोलते हैं। सत्ता पक्ष के दल भी परेशानी की बात करके सरकार का साथ दे रहे हैं। यह आम धारणा है कि चर्चा होने से सरकार को कोई नुकसान नहीं होगा। उसका सदन में बहुमत है। वह जितना चाहेगा अपने लोगों से बुलवाएगा लेकिन नोटबंदी पर कार्यस्थगन प्रस्ताव के तहत चर्चा कराने से नई परंपरा डालने और उससे भी ज्यादा सरकार के खिलाफ इस मुद्दे पर सदस्यों की बड़ी संख्या दिखने से सरकार मतदान से बच रही है। यह भी कहा जा रहा है कि चर्चा में आरोप प्रत्यारोप में उन व्यवसायियों के खुलासे होंगे जिनके सत्ता और विपक्ष में अनेक हितैषी बैठे हुए हैं।

शीतकालीन सत्र महीने भर का है। आधा तो नोटबंदी के हंगामे की भेंट चढ़ चुका है और लगता है कि आगे भी हंगामा होता रहेगा। लोकसभा अध्यक्ष ने परसों कहा था कि एक-दो दिन में सदन सामान्य हो जाएगा लेकिन दोनों पक्षों के अड़ियल रवैये से लगता नहीं कि इस सत्र में सदन में कोई अन्य काम भी हो पाएंगे। सरकार ने नोटबंदी से जुड़ा विधेयक जबरन पास करवा लिया। नोटबंदी के 22 दिन बीत जाने पर भी लोगों को कतारों से मुक्ति नहीं मिली है। लगता नहीं कि प्रधानमंत्री के पचास दिन के दावे के बाद भी हालात सामान्य नहीं हो पाएंगे।

 

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First Published on December 2, 2016 4:58 am

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