December 08, 2016

ताज़ा खबर

 

संसद में एका लेकिन सड़क पर जुदा-जुदा, विमुद्रीकरण के विरोध में भाजपा के आगे बेबस विपक्ष

बगाल और त्रिपुरा में तृणमूल कांग्रेस का सीधा टकराव वाममोर्चा से है। टकराव के तीसरे कोण पर कांग्रेस है।

Author नई दिल्ली | November 29, 2016 04:20 am
कोलकाता में नोटबंदी के खिलाफ कांग्रेस कार्यकर्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाते हुए। (REUTERS/Rupak De Chowdhuri/28 Nov, 2016)

दीपक रस्तोगी

बड़े नोटों को अमान्य करने के मुद्दे पर विपक्ष ने संसद में तो एकजुटता दिखाई लेकिन संसद के बाहर विरोध करने के तरीके पर बिखराव सामने आ गया। नोटबंदी पर कालेधन के मुद्दे को भाजपा अपना ब्रह्मास्त्र बना रही है। विपक्ष के सामने सत्तारूढ़ दल की पिच पर खेलने की मजबूरी है। जवाब में विपक्ष के मुद्दे कमजोर पड़ रहे हैं। ऐसे में संसद में अगर विपक्षी पार्टियां एकजुट न दिखें तो भाजपा का राजनीतिक दखल बढ़ेगा। दूसरी ओर, सड़क पर इस समीकरण का शीराजा बिखर रहा है। विपक्षी दल अलग अलग अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन की चिंता कर रहे हैं, जिसे एक दूसरे से छीनकर उन्होंने तैयार की है।

विमुद्रीकरण और इसके असर को लेकर देशभर में आंदोलन खड़ा करने की विपक्ष की मुहिम में यही ऊहापोह हावी रहा है। यही कारण है कि देश भर को हलकान करने वाले मसले को लेकर विपक्षी दलों में समन्वय का अभाव दिखा। हर पार्टी ने अपने-अपने अंदाज में अलग-अलग रणनीति और तरीके अख्तियार किए। ऐसे में मुद्दा गौण हो गया और विपक्षी पार्टियां अपने मकसद में नाकाम रहीं। जनता दल (एकी) ने ऐन मौके पर खुद को अलग कर लिया। बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी पार्टी के लोग सड़क पर नहीं दिखे। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां यह समझा पाने में नाकाम रहीं कि उन्होंने 28 नवंबर के अपने एजंडे को अलग-अलग नाम और स्वरूप क्यों दिया। कांग्रेस के ‘जन आक्रोश दिवस’ और वाम मोर्चा के ‘अखिल भारतीय प्रतिवाद दिवस’ का पालन करने के लिए सड़कों पर उतरे नेता और कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति रही। वामपंथी पार्टिंयों ने केंद्रीय स्तर पर सिर्फ धरना-प्रदर्शन और घेराव की बात की। बंद और हड़ताल का फैसला राज्य इकाइयों पर छोड़ दिया। बंगाल, त्रिपुरा और केरल में बंद व हड़ताल रखा गया। इससे भ्रम फैला कि विपक्ष ने कहीं देशभर में बंद तो नहीं रखा है। बगाल और त्रिपुरा में तृणमूल कांग्रेस का सीधा टकराव वाममोर्चा से है। टकराव के तीसरे कोण पर कांग्रेस है। बीते दिनों नई दिल्ली में संसद परिसर में प्रदर्शन के मौके पर तीनों पार्टियों के सांसद एक कतार में थे। लेकिन राज्यों में स्थानीय राजनीति की मजबूरियां उनके हलक में आ गईं। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी के अनुसार, ‘ममता बनर्जी ने पिछले दिनों दिल्ली आने के पहले उन्होंने मुझे फोन किया था। लेकिन हम दोनों का किसी मुद्दे पर एकसाथ होना तभी संभव है, जब वे वामो विरोध की अपनी राजनीतिक लाइन से पीछे हटेंगी।’ संसद में तृणमूल कांग्रेस आम आदमी के साथ होने के एजंडे पर चल रही है। तृणमूल संसदीय दल के नेता सुदीप बंद्योपाध्याय के अनुसार, अगर लोगों की पीड़ा के बारे में सदन में चर्चा नहीं होती है तब संसद किसलिए है। लोगों की परेशानियां बढ़ रही हैं और उन्हें राहत नहीं मिल रही है। हम कालाधन और भ्रष्टाचार पर सरकार का समर्थन करने को तैयार हैं।’

बिहार में सत्ताधारी जनता दल (एकी) ने शुरू में कांग्रेस, तृणमूल और वाममोर्चा का साथ दिया। बाद में जद (यू) नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अलग लाइन ले ली और तब उनकी पार्टी को भी अन्य विपक्षी पार्टियों से अलग लाइन लेनी पड़ी। बिहार में भाजपा के नेताओं ने सीधा हमला कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल पर किया। इन्हीं दोनों दलों के नेता-कार्यकर्ता शिद्दत के साथ सड़कों पर उतरे। जद (एकी) का झुकाव भाजपा की ओर क्यों दिख रहा है? जद (एकी) के नेता शरद यादव के अनुसार, ‘हमारे रवैए में कोई बदलाव नहीं आया है। नीतीश कुमार हमेशा से कालेधन के विरोध में रहे हैं। बिहार में उन्होंने भ्रष्टाचार और कालेधन पर नकेल कसी है। संसद में विरोध ठीक है। लोग कालेधन के खिलाफ हैं।’ दरअसल, नीतीश कुमार खुद को विपक्ष के वैकल्पिक मोर्चे के नेता के तौर पर देख रहे हैं और अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क हैं। मौजूदा माहौल में वे नहीं चाहते कि उनपर कालेधन के मुद्दे पर कोई छींटा डालने का मौका भाजपा को मिले।

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां साथ हैं। कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता देशभर में सड़क पर उतरे। वामो के भी उतरे। कांग्रेस के महासचिव गुलाम नबी आजाद के अनुसार, ‘नोटों का चलन बंद करने का सीधा असर सामने है। लोग कतारों में मर रहे हैं। कारोबार चौपट हो गया है। लोग अपने ही पैसे के लिए तरस गए हैं। कांग्रेस प्रधानमंत्री से जवाब चाहती है। देश की जनता आक्रोशित है।’ माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी के अनुसार, ‘जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हम इस सब के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। साथ ही, दो हजार का नोट चलाए जाने से काले धन पर अंकुश की बात बेमानी हो गई।’ तीन राज्यों में वामो ने बंद का रास्ता चुना और इसके लिए स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखा गया। येचुरी ने कहा, ‘इसका फैसला हमने राज्य कमेटियों पर छोड़ रखा था।’

 

 

लोकसभा में पीएम मोदी की अनुपस्थिति पर मलिकार्जुन खड़गे ने उठाया सवाल; राजनाथ सिंह ने किया बचाव

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 29, 2016 4:20 am

सबरंग