December 10, 2016

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‘देश से किसी भी कोने में उठने वाली हर दमनकारी आवाज के खिलाफ नेहरू खुद खड़े हो जाते थे’

सबसे ज्यादा अहम है, नेहरू की भारतीय मेधा को लेकर सतत चिंता। वो चाहते थे कि भारतीय मेधा नवोन्मेषी, तार्किक और मुक्त हो।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू 1947 से 1964 तक 17 साल देश के प्रधानमंत्री रहे। जब वो प्रधानमंत्री बने तो इन पंक्तियों का लेखक 11 साल का स्कूली छात्र था और जब उनका निधन हुआ तो 28 साल का। बचपन में तो वो नटखट था लेकिन 20 साल होने के बाद वो “पंडितजी” की कुछ नीतियों में नुक्स निकालने लगा था। देश की आजादी के लिए पूरी जिंदगी लगा देने वाले प्रधानमंत्री को प्यार करने वाला हर शख्स “पंडितजी” नाम से ही पुकारता था।

1950 के दशक में मेरे लिए ये समझना मुश्किल था कि निजी स्वतंत्रता के प्रेमी नेहरू सोवियत गणराज्य में होने वाले दमन की अनदेखी किस तरह कर सकते हैं। हालांकि नेहरू जिस समाजवाद की पैरवी करते थे उससे मैं भी आकर्षित था। मुझे राजाजी के लाइसेंस-परमिट राज के उभार की आलोचना का भी मैं समर्थक था।

इन सबके बावजूद उनके लिए मेरे मन में जो सहज प्रेम था उसके सामने ऐसी आलोचनात्मक प्रक्रियाएँ छोटी पड़ जाती थीं। नेहरू से पहली मुलाकात ने ही मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। मैं उनसे 1963 की गर्मियों में उनके निवास पर मिला था, जिसे आजकल तीन मूर्ति भवन कहते हैं। लेकिन उस समय आजादी से पहले के लोग उसे ब्रिटिश कमांडर इन चीफ हाउस के तौर पर जानते थे।

इस मुलाकात से पहले मैंने पंडितजी को देखा था लेकिन आमने-सामने मुलाकात नहीं हुई थी। इस मुलाकात की एक विशेष वजह थी। हम लोग दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय मोरल री-आर्मामेंट (एमआरए) की एक बैठक कराना चाहते थे। कार्यक्रम के लिए  हम नवंबर, 1963 में आधे दिन के लिए विज्ञान भवन आरक्षित कराना चाहते थे। लेकिन सरकार कार्यालयों में हमें कोई ये बताना को नहीं तैयार था कि ये कैसे किया जा सकता है। हमसे कहा गया कि विज्ञान भवन को किसी गैर-सरकारी व्यक्ति को किराए पर देने का फैसला केवल प्रधानमंत्री ही कर सकते हैं। मैंने प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा और सौभाग्य से मुझे वो मिल भी गया।

बहुत से लोगों को उन दिनों तीन मूर्ति भवन में मुस्कराते हुए अतिथियों का स्वागत करने वाली विमला सिंधी की याद होगी। मेरा स्वागत भी उन्होने ही किया। मुझे पंडितजी के पास ले जाया गया। वो ग्राउंड फ्लोर पर एक कमरे में सोफे से बैठे थे। मुझे उनके सामने की कुर्सी पर बैठने के लिए कहा गया। उस समय उनका 74वां जन्मदिन करीब ही था। उनकी तबीयत भी ठीक नहीं थी जिस पर उसके पिछले साल चीन से हुए युद्ध पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा था।

28 साल के उस नौजवान से उन्होंने कहा, “कहिए”

मैंने उन्हें अपने आने का कारण बताया। वो ये जानकर हैरान हुए कि विज्ञान भव का सभागार किसी गैर-सरकारी व्यक्ति को किराए पर दिया जा सकता है या नहीं इसका फैसला प्रधानमंत्री को करना है। उन्होंने मुझसे कार्यक्रम तारीख लिखकर देने को कहने के साथ ही ये भी बताया कि मुझे किससे मिलना है।

वो मुलाकात चंद मिनटों की थी लेकिन मैं उनके स्वास्थ्य की हालत देखकर मैं हिल गया था। उनके सहयोगी रवैये से भी मैं काफी प्रभावित हुआ। जब मैं उनके पास गया था तो मुझे मदद की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी क्योंकि एमआरए के बारे में उनके विचार मुझे पहले से पता थे। इसके बावजूद  मैंने पाया कि वो चाहते हैं कि एमआरए का कार्यक्रम हो वहीं हो जो उस समय शायद राजधानी का सबसे बढ़िया सभागार था।

जब कार्यक्रम हुआ तो उसमें कई महत्वपूर्ण लोग (नेहरू के तीखे आलोचक राजाजी भी) आए। पंडितजी ने मेरा एक और अनुरोध मान लिया था। ब्रिटिश लेखक पीटर हॉवर्ड एमआरए के अध्यक्ष थे। वो पंडितजी से मिलना चाहते थे।

जब हॉवर्ड मेरे साथ साउथ ब्लॉक स्थित उनके दफ्तर पहुंचे तो वो पहले से कमजोर नजर आ रहे थे। उन्हें हमसे बात करन से पहले कुछ गोलियाँ खानी पड़ीं। वो बोलने से ज्यादा हॉवर्ड की बात सुनने में रुचि दिखा रहे थे। मैं अपने साथ उन युवा भारतीयों की तस्वीरें भी ले गया था जो भारत को “स्वच्छ, शक्तिशाली और संगठित” बनाने लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे। उन्होंने वो तस्वीरें भी रुचि के साथ देखीं।

छह महीने बाद 27 मई 1964 को मैं कई युवा भारतीयों के साथ नीलगिरी स्थित एक कैंप में था। वहीं हमें उनके निधन की खबर मिली। ये खबर देते हुए मेरा गला अटक गया। खबर सुनकर हर कोई स्तब्ध था।

आज 52 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद मेरे जैसा आदमी उनके बारे में झूठी कहानियाँ फैलाये जाने से दुखी होता है। वो भी एक इंसान थे और उनमें भी कुछ कमियाँ थीं लेकिन उनका व्यक्तित्व शानदार था जिसे लाखों लोग प्यार करते थे और उन पर गर्व करते थे।

सबसे ज्यादा अहम है, नेहरू की भारतीय मेधा को लेकर सतत चिंता। वो चाहते थे कि भारतीय मेधा नवोन्मेषी, तार्किक और मुक्त हो। पूरे देश में कहीं भी अगर कोई दमनकारी आवाज उठती थी तो नेहरू तुरंत उसे खारिज करने के लिए खड़े हो जाते थे। भारत को आज 14 सालों तक उनका जेल में रहने, 55 सालों तक देश की अथक सेवा करने, प्रधानमंत्री के तौर पर उनके 17 सालों की उपलब्धियों और निजी स्वतंत्रता से उनके प्रेम को याद रखने की जरूरत है। और उनका लेखन कौशल भी।

भारत की कई पीढ़ियों को उनकी “आत्मकथा” और “भारत एक खोज” ने किसी और किताब से ज्यादा प्रेरणा दी। उनके “‘ट्रिस्ट विथ डेस्टनी” या “लाइट हैज गॉन आउट” जैसे भाषणों से ज्यादा प्रभावित करने वाले भाषण बहुत ही कम होंगे। ये दोनों ही भाषण निजी स्वतंत्रता से जुड़े हुए थे।

दुनिया को पता है कि सरकार या समाज के कुछ तत्व दमन कर सकते हैं। सरकार गैर-सरकारी दमनकारियों को तब तक छूट दे सकती है जब तकि खुद उसके सीधे दमन  के लिए जरूरी हालत ने बनए जाएँ या फिर गुंडों को सरकार चलाने का मौका दे दिया जाए।

आज हम बहादुर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आवाज दबा देने की मांग करने वाले आवाजें सुन रहे हैं, पाकिस्तानी कलाकारों वाली फिल्मों में को धमकी दी जा रही है। शर्मनाक वादे करवाए जा रहे हैं। पुलिसवालों की “बुरे” चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तारीफ की जा रही है लेकिन “अच्छे” चरमपंथियों के खिलाफ कदम उठाने पर उनके खिलाप कार्रवाई की जा सकती है। तथाकथित मुठभेड़ की पारदर्शिता का सवाल उठाने वालों को चुप कराया जा रहा है।

हम अपने पड़ोसी के हमशक्ल होते जा रहे हैं। संभव है कि अखबारों, टीवी चैनलों, फिल्मों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों से उन सामग्रियों को हटाने की मांग उठने लगे जो समाज के स्वघोषित पहरुओं को पसंद न हो।

आजादी से प्यार करने वालों को इससे तैयार रहना चाहिए।

(लेखक महात्मा गांधी के पौत्र हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ एलिनॉय के दक्षिण एशिया एवं मध्य पूर्व अध्ययन विभाग में रिसर्च प्रोफेसर हैं।)

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First Published on November 14, 2016 12:25 pm

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