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गुस्से में तब्दील होता समर्थन

समाज को इसके लिए तैयार होना चाहिए। दरियागंज स्थित देना बैंक की शाखा में लगी कतार दो सौ मीटर से ज्यादा थी।
Author November 16, 2016 03:48 am
एटीएम के सामने खड़ी लंबी कतार। (Representative Image)

नोटबंदी के बाद बिगड़े दिल्ली के हालात में भले ही कोई सुधार न हुआ हो, लेकिन दिल्लीवालों की सोच में बदलाव दिखने लगा है। लोगों ने इस सच को कुबूल कर लिया है कि बैंकों में चार-पांच घंटे का समय लगना ही है। उन्हें गुस्सा सिर्फ तब आ रहा है जब उनकी बारी आने पर उन्हें नगदी खत्म होने की सूचना मिलती है। शुरुआती दिनों से उलट अब नोट पाने की कतार में लगे लोग तरह-तरह की चर्चाओं में मशगूल दिख रहे हैं। कोई फैसले का समर्थन करते हुए इसे राष्ट्रभक्ति की परीक्षा बता रहा है तो कोई फैसले और व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठा रहा है। कई लोग कतार में लगने के लिए टिफिन लेकर आ रहे हैं तो कई देरी होने पर अपनी जगह खड़े होने के लिए विकल्प साथ ला रहे हैं। नोटबंदी प्रकरण ने कतार में लगे कई लोगों की दोस्ती भी करा दी है।

मंगलवार को दिल्ली एक बार फिर कतार में थी। जनसत्ता ने बैंक की कुछ शाखाओं की पड़ताल की। दीन-दुनिया की बातें, गीता-कुरान की सीख, प्रबंधन की बातें, नीति-निर्माण की बातों के अलावा काला धन को सफेद करने के जुगाड़ के किस्से कतारों में चर्चा का हिस्सा बनते नजर आए। लोग बीते एक हफ्ते का दुखड़ा साझा कर लोग अपनी बारी के इंतजार कर समय काट रहे हैं। मंगलवार सुबह साढ़े आठ बजे सीजीओ स्थित सरकारी दफ्तरों वाले परिसर सूचना भवन के बैंक आॅफ इंडिया की शाखा पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। आमतौर इन दिनों जनता बैंक वालों पर बिफर रही है, लेकिन यहां कतार में लगे लोग प्रबंधन की तारीफों के पुल बांध रहे थे। हालांकि थोड़ी देर में यह साबित हो गया कि ऐसा क्यों है? वर्दी पहने लोग और बैंक के कर्मचारी भी अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। पौने नौ बजे मुख्य प्रबंधक ने बैंक से बाहर आकर कतार में लगे लोगों को संबंधित फार्म दिए और खुद गार्ड की भूमिका में उतर आए।

उनके निर्देश पर बैंक नौ बजे नगदी देने लगा। यहां से कुछ कदम पर सीबीआइ मुख्यालय है। लोगों ने बताया कि शनिवार को यहां आए तीन-चार लोग खुद को सीबीआइ का बताकर सीधे काउंटर तक पहुंचना चाहते थे, लेकिन उन्हें लाइन में लगा दिया गया। वे दस मिनट तक खड़े रहे और फिर बैरंग लौट गए। इसलिए लोगों को यहां दो घंटे खड़े रहने के बाद भी खीझ नहीं सताती। जंगपुरा से यहां आए अमित ने कहा, ‘मोदीजी ने सबको कतार में लगा दिया, लेकिन उनके इस कदम से अमीर-गरीब के बीच की खाई जरूर कम होगी। जिनके पास काला धन नहीं है उनको सुकून है।’ हजरत निजामुद्दीन से यहां पहुंचे मो इम्तियाज अली ने कहा कि नानी का धन और बेईमानी का धन ज्यादा दिन नहीं रुकता। उन्होंने कुरान का हवाला देते हुए कहा कि हमारे यहां कमाई का एक निश्चित हिस्सा दान में खर्च का प्रावधान है। बंदा खुद तय करता है कि उसने क्या कमाया और उसका साढेÞ बारह फीसद खुदा के लिए दान देता है।

उन्होंने कहा कि काला धन पाप है। समाज को इसके लिए तैयार होना चाहिए। दरियागंज स्थित देना बैंक की शाखा में लगी कतार दो सौ मीटर से ज्यादा थी। यहां कई लोग हाथ में टिफिन लिए लाइन में लगे थे। यहीं के सब्जी बाजार में दुकान लगाने वाले राजेश ने कहा कि मुझे शुगर है। दवा लेता हंू। रविवार को भी यहां आया था, लेकिन चक्कर आ गया तो बिना पैसे लिए घर लौट गया। इसीलिए आज फिर आया हूं। यहीं खड़े सोमदत्त ने कहा कि नोट बंदी का फैसला अब तक का सबसे शानदार फैसला है, लेकिन इंतजाम के मोर्चे पर अधिकारी, नौकरशाही व आरबीआइ चूक गया। शायद यही वजह है कि जिस नोटबंदी के लिए प्रधानमंत्री को 100 में 100 अंक मिलने चाहिए वहीं उन्हें डिविजन (60 फीसद) बचाना मुश्किल हो रहा है।

संसद मार्ग स्थित स्टैट बैंक आॅफ इंडिया की शाखाओं पर दोपहर बाद तक लंबी लाइन लगी थी। जनसत्ता के सवाल पर यहां कतार संभाल रहे एक अधिकारी ने कहा कि काले धन को दोबारा काले धन में बदलने के लिए एक ही व्यक्ति अलग-अलग पहचान पत्रों के जरिए रोज लाइन में लगने आ जा रहा है। इससे आम लोगों की परेशानी बढ़ रही है, जिनके पास खर्च चलाने का भी संकट है। एक दूसरे अधिकारी ने दबी जुबान से कहा कि नोट बदलने की बारंबारता पर अंकुश लगाए जाने की जरूरत है।

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