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आक्रामक धर्म और कड़े आर्थिक सुधार का मिलाजुला खेल

पुण्य प्रसून वाजपेयी धार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कहीं ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे हैं। तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हंै, या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक-दूसरे को इसका अहसास करा रहा है कि पहले […]
Author January 7, 2015 09:17 am
संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे हैं। तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हैं

पुण्य प्रसून वाजपेयी

धार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कहीं ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे हैं। तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हंै, या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक-दूसरे को इसका अहसास करा रहा है कि पहले उसका विस्तार हो जाए , फिर एक-दूसरे को देख लेंगे। यानी एक तरफ संघ परिवार ललचा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार वह मोदी सरकार के दौर में खासी तेजी से कर सकता है तो उसे अभी विकास की जनविरोधी नीतियों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है। दूसरी तरफ मोदी सरकार को भी इसका अहसास है कि संघ के बगैर मौजूदा वक्त में दूसरी कोई राजनीतिक ताकत नहीं है जो उसे विश्व बैंक और आइएमएफ के सोच को आर्थिक विकास तले लागू करने से रोक सके।
इस दौर के दो संकेत साफ हैं।

पहला, संघ धर्म को धारण करने के सोच से कहीं आगे ले जाना चाहता है और दूसरा, सरकार खेती और खनिज संपदा को राष्ट्रीय धरोहर से आगे बाजार की धरोहर बनाने-मानने को तैयार है। इस रास्ते में धर्म आक्रामक होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस रास्ते जनता संसदीय राजनीति करने वाले राजनेताओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है, इनकार इससे भी नहीं किया जा सकता। पहली बार कोयला खदान के मजदूरों ने हड़ताल इसलिए की है कि उन्हें निजी हाथों में बेचा जा रहा है। बैंक के कर्मचारी हड़ताल इसलिए करना चाह रहे हैं कि वेतन में इजाफा किए बगैर सरकार के सारे धतकरम को बैंक के जरिए ही पूरा करने की नीति अपनाई जा रही है। बडेÞ-बडेÞ हाथों से एनपीए की वसूली कैसे हो, कोई नहीं जानता।

जनधन के हर खाते को कोई बैंक कैसे संभाले इसकी कोई नीति नहीं है। महंगाई को साधने का कोई उपाय सरकार के पास नहीं है। विपन्न तबके की तादाद लगातार बढ़ रही है क्योंकि विकास का मॉडल रोजगार देते हुए चकाचौंध लाने के खिलाफ है। वहीं विपन्न तबके में धर्म और आस्था के जरिए ही अपने होने का अहसास तेजी से जाग रहा है। राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिए सियासी ककहरा भी इस दौर में विपन्न तबके की ताकत बनी है।
मौजूदा वक्त में धर्म राष्ट्रवाद से जुड़ रहा है। राष्ट्र विकास के सिद्धांत तले पूंजी को ज्यादा महत्त्व दे रहा है। खेती की जमीन को अगर विकास की चकाचौंध तले मुआवजे के नाम पर हथियाने का जमीन सुधार शुरू होगा तो फिर रास्ता जाता किधर है। न तो बहुफसली जमीन मायने रखती है और न ही छत्तीसगढ़ या बंगाल सरीखे राज्यों की खेती अर्थव्यवस्था। औद्योगिक गलियारों के नाम पर रक्षा के लिए हथियारों के उद्योग लगाने के नाम पर या फिर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली पहुंचाने के नाम पर सरकार कोई भी जमीन ले सकती है। सिर्फ मुआवजा पहले की तुलना में ज्यादा मिल जाएगा। लेकिन इसके एवज में सरकार के पास ऐसी कोई योजना भी नहीं है कि रोजगार बढ़े या विपन्न लोगों को रोजगार मिले।

ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर में भी कई तरीकों से उदारीकरण के नाम पर उपजाऊ भू-संपदा कारपोरेट घरानों को सौंपी गई। आवारा पूंजी का खुला खेल नजर आया। कालेधन की उपज भी तो इसी खुली व्यापार योजना के दायरे में होती रही। तो यह खेल अब अलग कैसे होगा। योजना आयोग की घिसी-पिटी लकीरों को मिटाकर नई लकीर खींचने के लिए बने नीति आयोग की नई भर्ती से भी समझा जा सकता है।

याद कीजिए तो मनमोहन सिंह के दौर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर मोंटेक सिंह अहलुवालिया बैठा करते थे और अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर अरविंद पनगढ़िया बैठेंगे। दोनों विश्व बैंक की नीतियों तले बने अर्थशास्त्री हैं। दोनों के लिए खुला बाजार खासा मायने रखता है। विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष में काम करते हुए दोनों ने ही आर्थिक सुधार को न सिर्फ खासा महत्त्वपूर्ण माना बल्कि भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों के लिए दोनों के लिए विकास की रेखा उपभोक्ता की बढ़ती तादाद से तय होती है। दोनों ही विश्व व्यापार संगठन की उन नीतियों का विरोध कभी नहीं कर सके जो भारत के किसान और मजदूरों के खिलाफ रहीं। दोनों ही खनिज संपदा को मुक्त बाजार या कहें मुक्त व्यापार से जोड़ने में खासे आगे रहे।

फिर योजना आयोग से बदले नीति आयोग में अंतर होगा क्या। जिस वक्त नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए लोकसभा के चुनावी प्रचार में जुटे थे उस वक्त अरविंद पनगढ़िया ने भारत में विकास की असमानता को लेकर कई लेखों में सवाल उठाए थे। संघ परिवार का मजदूर संघटन बीएमएस हो या स्वदेशी जागरण मंच, दोनों ने ही हमेशा विश्व बैंक और आइएमएफ की नीतियों को लेकर वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक पर सीधी चोट की है। अब यहां नया सवाल है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना और दूसरी तरफ भारत को विकसित देश बनाने के लिए सरकार की नीतियां।

एक तरफ संघ के तीन दर्जन संगठन हैं, जो आदिवासी से लेकर किसान और मजदूर से लेकर देसी उत्पादन पर टिके स्वावलंबन के लिए बीते चालीस बरस से काम कर रहे हैं, और उन्हीं के बीच से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता जो संघ परिवार के राष्ट्रीय सोच को ही धर्म की चादर में ही लपेटा हुआ दिखा रहे हैं। तो यह आपसी सहमति से है या आपसी अंतरविरोध। या फिर सहमति और अंतरविरोध के बीच की लकीर ही मौजूदा दौर में एक हो चली है। ध्यान दें कि कल तक संघ परिवार के बीच काम करने वाले मुरलीधर राव हों या संघ के पांच सौ से ज्यादा प्रचारक, ये सब वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकर के दौर में विदेशी निवेश और पूंजी पर टिके विकास के खिलाफ थे।

मनमोहन सिंह के दौर में पूंजी पर टिके विकास ने 40 फीसद मजदूरों के रोजगार छीने और 70 फीसद स्वरोजगार में सेंध लगाई। इस दौर में उद्योगों को टैक्स सबसिडी हर बरस पांच लाख करोड़ तक दी गई। और इन सबकी हिमायत विश्व बैंक और मुद्रा कोष से लेकर डब्लूटीओ तक ने तो की है जहां से निकले अर्थशास्त्री अब नीति आयोग को संभाल रहे हैं। मनमोहन सरकार को आर्थिक सलाह देने वाले डॉ बिबेक देवराय भी नीति आयोग के स्थायी सदस्य नियुक्त हो चुके हैं। यानी सिर्फ अरविंद पनगढ़िया का ही नहीं, बल्कि मुक्त व्यापार के समर्थक रहे अर्थशास्त्री देवराय का भी सवाल है जो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह के दौर में अहम सुझाव देते आए हैं और इन सुझावों को कभी भाजपा ने सही नहीं माना।

देवराय इससे पहले की सरकार में विदेशी व्यापार, आर्थिक मसले और कानून सुधार के मुद्दों पर सलाहकार रह चुके हैं। यानी मनमोहन सरकार के दौर की नीतियों का चलन यहां भी जारी रहेगा। फिर सवाल है बदलेगा क्या? वैसे भी जमीन अधिग्रहण से लेकर मजदूरों के लिए केंद्र सरकार की नीतियों से संघ परिवार में भी कुलबुलाहट है। जिस तरह मुआवजे के दायरे में जमीन अधिग्रहण को महत्त्व दिया जा रहा है और मजदूरों को मालिकों के हवाले कर हक के सवाल को हाशिए पर ढकेला जा रहा है, उससे संघ का ही भारतीय मजदूर संघ सवाल उठा रहा है।

छोटे लोगों के लिए बड़े-बड़े काम करेंगे तो क्या नई आर्थिक नीतियां वाकई बडे-बड़े काम छोटे-छोटे लोगों के लिए कर रही हैं या फिर बड़े-बड़े लोगों के लिए। क्योंकि देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जो कम होगी कैसे, इसकी कोई योजना नीतिगत तौर पर किसी के पास नहीं है। बड़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, लेकिन रोजगार कारपोरेट और उद्योगपतियों के हाथ में सिमट रहा है। पहले न मनमोहन सिंह कुछ बोले और न ही अब कोई बोल रहा है।

गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं। लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में सारी योजना तो अब सारी नीतियां कल्याणकारी पैकेज में सिमट रही हैं। ऐसे में नीति आयोग क्या अपने उद्देश्यों पर खरा उतरेगा-यह किसके लिये कितना बड़ा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन असल मुश्किल है कि एक तरफ धर्म के नाम पर घर वापसी का सवाल आक्रामक हो चला है तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की नीतियों की रफ्तार मनमोहन सिंह के दौर से कई गुना तेज है। और यह लगने लगा है कि निजी क्षेत्र चुनी हुई सरकार से भी ताकतवर हो चला है।

 

 

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