December 08, 2016

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26/11 कहानियां हौसलों की: 8 सालों में 100 से ज्यादा अर्जियां देने वाली सबीरा खान को आज भी है मदद का इंतजार

26/11 आतंकी हमले में घायल हुईं सबीरा खान का आज बस एक ही सपना कि वह अपना घर बना सके जहां वह गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना चाहती हैं।

सबीरा खान। (Source: Indian Express)

26 नवंबर 2008, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपने घर वापिस लौट रही सबीरा खान जैसे ही डॉक्यार्ड रोड पर पहुंची तो एक टैक्सी में हुए बम धमाके ने उन्हें अपनी जगह से 20 फीट दूर फेंक दिया। यह वारदात 26 नवंबर 2008 की रात को मुंबई में किए गए हमलों में से एक थी। धमाके के बाद सबीरा की आंखें खुली तो वह एक सरकारी अस्पताल में थीं जहां पर दो महीने तक उनका इलाज हुआ लेकिन सबीरा आज भी बिना बैसाखी के साहरे के चल नहीं सकती।

सबीरा बताती हैं सरकारी अस्पताल में उनका इलाज ठीक से नहीं किया गया। उन्हें जो खून चढ़ाया गया था वह पीलिया से इंफेक्टिड था जिसने उनके पैर को हमेशा के लिए खराब कर दिया। सबीरा अलग-अलग अस्पतालों में 6 सर्जरी करा चुकी हैं लेकिन उनका पैर ठीक नहीं हो सका।
26/11 आतंकी हमलों को गुजरे हुए 8 साल हो गए हैं लेकिन सबीरा आज भी किसी सरकार द्वारा मिलने वाली मदद का इंतजार कर रही हैं। उनका दावा है कि उन्हें न तो सही मुआवजा ही मिला और न ही उनके जख्मों के ट्रीट्मेंट के लिए कोई फंड।

सबीरा के बड़े बेटे हामिद, कैमरा की तरफ अपने हाथों में उन कागजों को दिखाते हैं जिसका शीर्षक है “सेंट्रल स्कीम फॉर असिस्टेंस टू विक्टिम्स ऑफ टेररिस्ट एंड क्मूनल वॉइलेंस” हामिद बताते हैं कि उनकी माँ को 3 लाख रुपये का मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया गया था लेकिन अभी तक दोनों में से कुछ भी नहीं मिला है। हामिद का दावा है कि उसने 100 से ज्यादा अर्जियां तमाम सरकारी मंत्रालयों, विभागों, अधिकारियों और प्रधान मंत्री को भी भेजी हैं लेकिन उनमे से किसी पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई और न ही कोई उम्मीद नजर आती है।

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सबीरा के परिवार में 6 बच्चे हैं और उनकी 90 साल की माँ। उसके पति मुंबई पोर्ट ट्रस्ट में काम करते हैं, लेकिन 2 महीने से अपनी चोट की वजह से वह काम पर नहीं जा पा रहे। सबीरा का बड़ा बेटा हामिद अंधेरी इलाके में जीन्स का स्टॉल लगाता है जिससे घर को हर महीने 10 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। सबीरा ने बताया कि उनके इलाज में 12 लाख रुपये का खर्चा हो चुका है जिसका भुगतान उन्होंने उधार लेकर, दुकान बेचकर और अपने घर को गिरवी रखकर पूरा किया है। परिवार शासन-प्रशासन को लेकर गुस्सा है।

हामिद कहते हैं कि सभी राजनीतिक दल आतंकवाद के शिकार बने पीड़ितों का बस राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं। वह बताते हैं कि जब हमला हुआ था तो कांग्रेस सत्ता में थी तब बीजेपी के कुछ नेता मेरी माँ को मदद दिलाने के लिए मंत्रालय लेकर गए। बीजेपी ने कहा था कि जब उनकी सरकार आएगी तो वह सभी पीड़ितों का ध्यान रखेंगे। आज जब बीजेपी सत्ता में हैं तो उसने भी हमारे लिए कुछ नहीं किया है।

सबीरा बच्चों को उर्दू और अरबी पढ़ाती हैं। 26/11 के दिन भी वह बच्चों की क्लास लेकर घर वापिस लौट रही थीं लेकिन उस बम धमाके ने उनकी जिंदगी बदल दी। पहले वह 20-25 बच्चों को पढ़ाती थीं लेकिन आज उनके घर पर महज 5-6 बच्चे पढ़ने आते है। वह गरीब बच्चों को उनके घर जाकर पढ़ाती थी और बतौर फीस मामूली रकम लेती थी। आज सबीरा का बस एक ही सपना है कि उनका अपना एक घर हो जहां पर वह बच्चों को पढ़ा सकें क्योंकि इसी काम से उन्हें खुशी मिलती है।

वीडियो:26/11 Stories Of Strength: Sabira Khan

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First Published on November 22, 2016 4:55 pm

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