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तीसरे मोर्चे में मुलायम सिंह यादव की विश्वसनीयता बड़ा संकट

अनिल बंसल नरेंद्र मोदी के खिलाफ जनता दल के पुराने कुनबे को जोड़ने की कवायद अभी बेमानी लगती है। सियासी ताकत के तौर पर तो मुलायम के झंडे तले जमा हुए छह दलों का खास वजूद है ही नहीं, एकता में सबसे बड़ी बाधा मुलायम सिंह यादव की विश्वसनीयता है। उनके अतीत में झांके तो […]
Author December 8, 2014 08:33 am
मुलायम सिंह यादव के परिवार वाले ही इस प्रस्तावित विलय के विरोध में खड़े हो गए हैं। उनकी दलील है कि राजनीति के इन पिटे हुए मोहरों को साथ लेने से क्या हासिल होगा?

अनिल बंसल

नरेंद्र मोदी के खिलाफ जनता दल के पुराने कुनबे को जोड़ने की कवायद अभी बेमानी लगती है। सियासी ताकत के तौर पर तो मुलायम के झंडे तले जमा हुए छह दलों का खास वजूद है ही नहीं, एकता में सबसे बड़ी बाधा मुलायम सिंह यादव की विश्वसनीयता है। उनके अतीत में झांके तो वे विश्वसनीयता के मामले में दिवालिया दिखते हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, एचडी देवगौड़ा और सोनिया गांधी सभी को उन्होंने ऐन वक्त पर ठेंगा दिखाया था। यहां तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब पीए संगमा को राष्ट्रपति बनाने की सोच रही थीं तो शुरू में उनका साथ देने का वादा कर बाद में मुलायम ने अपनी राह अलग पकड़ ली थी।

समाजवादी पार्टी, राजद, जद (सेकु), जद (एकी) और इनेलो के लोकसभा में महज 15 सदस्य हैं। तीन सौ से ज्यादा बहुमत वाली मोदी सरकार की सेहत पर इन दलों के एक साथ आने का शायद ही कोई फर्क पड़े। छठा दल चंद्रशेखर की सजपा (राष्ट्रीय)है। चंद्रशेखर के एक पुत्र सपा से राज्यसभा में हैं तो दूसरे भाजपा में। पर सियासी वजूद के मामले में शून्य हो चुकी उनकी विरासत को उनके चेले कमल मुरारका अभी भी ढो रहे हैं। कोई भाव नहीं देता सो, वे भी मुलायम के घर हुई बैठक में पहुंच गए थे।

मुलायम के प्रस्तावित मोर्चे की रूपरेखा का भी अभी अता-पता नहीं है। उत्तर प्रदेश में अजित सिंह ने पिछले दिनों मुलायम के साथ जाने का संकेत दिया था। पर वे अभी कांग्रेस का मोह भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। तभी तो पिछले हफ्ते उनके बेटे जयंत चौधरी ने मेरठ में कहा कि मुलायम के मोर्चे का राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। मुलायम के धुर विरोधी और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे अशोक यादव कहते हैं कि मुलायम की कोई साख बची ही नहीं। उन्होंने कभी समाजवादी आंदोलन को आगे नहीं बढ़ाया। उनकी दुनिया केवल अपने गांव सैफई के विकास तक सीमित रही है। पिछड़ों के कल्याण का उनका एजंडा भी अपने परिवार से आगे नहीं जाता तो उनके साथ जुड़ने वालों को क्या हासिल होगा?

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव अरुण सिंह का कहना था कि जब तक राज्यों में गैरभाजपा और गैरकांग्रेस दल एक साथ नहीं आते, ऐसी एकता का कोई मतलब नहीं है। जहां तक बिहार का सवाल है, वहां नीतीश कुमार और लालू यादव अपना अस्तित्व बचाने की फिक्र में हैं। इसलिए विचार न मिलने पर भी एक-दूसरे से गलबहियां कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव में सूबे की जनता इस गठबंधन को नकार देगी। अरुण सिंह कहते हैं हरियाणा में इनेलो और बिहार में लालू यादव की पार्टियां तो वैसे भी नेतृत्वहीनता की शिकार हैं। ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला चुनाव लड़ ही नहीं सकते। यही संकट लालू यादव के सामने है।

अशोक यादव को लगता है कि इन दलों में अगर किसी नेता की विश्वसनीयता है तो वे केवल शरद यादव हैं। लेकिन दिक्कत दूसरी है। एकता के पीछे कोई सियासी एजंडा, कार्यक्रम या सिद्धांत नहीं है। यह एकता मोदी से लड़ने की मंशा से हो रहा है। यानी इसकी बुनियाद ही नकारात्मक है। रही मुलायम की साख की बात तो मुजफ्फरनगर के दंगों में लोग मरते रहे और वे सैफई में नाच देखते रहे। अपने जन्मदिन पर उन्होंने विक्टोरिया की बग्घी में सवारी कर साबित कर दिया कि लोहिया की विचारधारा से उनका दूर का भी नाता नहीं है।

इस नए गठबंधन के सामने अभी और भी कई चुनौतियां हैं। क्या ये सारे दल अपना निजी वजूद खत्म कर लेंगे। यदि एक दल बनेगा तो उसका नाम और नेता कौन होगा? दल एक नहीं बना तो फिर केवल गठबंधन करने से क्या हासिल होगा? मोदी को रोकने की ताकत मुलायम में यूपी तक में तो बची नहीं, देश में वे क्या मुकाबला करेंगे? उत्तर प्रदेश की सपा सरकार का हाल देश के सामने है। सूबे में न कोई विकास है और न सुशासन। भ्रष्टाचार जरूर मायावती के राज से भी आगे पहुंच चुका है। यादव सिंह के मामले में सपा नेताओं के हास्यास्पद रवैए ने हकीकत लोगों के सामने ला दी है।

 

 

 

 

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