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मोदी की मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक, योजना आयोग के पुनर्गठन पर मंथन

योजना आयोग के पुनर्गठन पर विचार विमर्श के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यहां बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में ज्यादातर राज्यों ने सोवियत व्यवस्था के ढर्रे पर गठित इस निकाय के पुनर्गठन के विचार का समर्थन किया। लेकिन मौजूदा ढांचे को भंग करने के बारे में उनमें कोई एक राय नहीं दिखी। प्रधानमंत्री मोदी […]
नई दिल्ली में रविवार को योजना आयोग को लेकर हुई बैठक में एक-दूसरे का अभिवादन करते प्रधानमंत्री मोदी व राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे।

योजना आयोग के पुनर्गठन पर विचार विमर्श के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यहां बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में ज्यादातर राज्यों ने सोवियत व्यवस्था के ढर्रे पर गठित इस निकाय के पुनर्गठन के विचार का समर्थन किया। लेकिन मौजूदा ढांचे को भंग करने के बारे में उनमें कोई एक राय नहीं दिखी। प्रधानमंत्री मोदी ने इस साल स्वाधीनता दिवस पर अपने संबोधन में योजना आयोग की जगह नया निकाय गठित करने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि नया निकाय नए आर्थिक विश्व की जरूरतों के अनुरूप होगा। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस साल 30 अप्रैल के वक्तव्य का भी उल्लेख किया। जिसमें उन्होंने कहा था कि 1950 में गठित मौजूदा ढांचे के पास आर्थिक सुधारों के दौर में कोई भविष्योन्मुख दृष्टिकोण नहीं है।

मोदी ने रविवार को कहा कि एक ऐसा कारगर ढांचा स्थापित करने की जरूरत है जो ‘सहयोगपूर्ण संघीय व्यवस्था’ और ‘टीम इंडिया’ की अवधारणा को बल प्रदान करे। दिनभर चली बैठक से ऐसे संकेत मिले हैं जिससे लगता है कि सरकार एक ऐसे निकाय की स्थापना का विचार कर रही है जिसमें प्रधानमंत्री, कुछ कैबिनेट मंत्री व कुछ मुख्यमंत्री शामिल होंगे और इसमें विभिन्न तकनीकी विषयों व क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी रखा जाएगा। नए निकाय में मुख्यमंत्रियों को बारी-बारी से प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। राज्यों को योजनागत कोष को अपने आवश्यकतानुसार खर्च करने की छूट दी जा सकती है।

बैठक के बाद वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अभी कोई समयसीमा तय नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि सरकार विचार-विमर्श पूरा हो जाने के बाद सोच-विचार कर इस बारे में कोई फैसला करेगी। हालांकि यह भी संकेत है कि नया निकाय अगले साल 26 जनवरी तक गठित किया जा सकता है। बैठक में पश्चिम बंगाल और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों के अलावा विधानसभा चुनाव के दौर से गुजर रहे जम्मू कश्मीर और झारखंड के मुख्यमंत्री शामिल नहीं हो सके। बैठक में प्रधानमंत्री ने नए निकाय में राज्यों की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया।

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चर्चा के दौरान कांग्रेस नीत सरकार वाले राज्यों ने योजना आयोग को दुरुस्त करने के विचार का तो समर्थन किया लेकिन वे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के स्थापित इस आयोग को खत्म करने के विचार से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि आयोग को नए ढंग से विकसित किया जा सकता है। वहीं दूसरी तरफ राजग सरकार वाले कुछ राज्यों व तमिलनाडु व तेलंगाना ने आयोग को तत्काल खत्म करने की जरूरत पर बल दिया। रविवार की बैठक का एक दौर अलग से बातचीत का था। इसमें प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों के साथ अलग-अलग बातचीत हुई। इस दौर की चर्चाओं में कोई अधिकारी मौजूद नहीं था।

बैठक में मुख्य रूप से चार पहलुओं पर बात हुई। इनमें पंचवर्षीय योजना प्रणाली, वार्षिक योजनाओं और केंद्र से राज्यों को दिए जाने वाले कोष की वर्तमान व्यवस्था के भविष्य का मुद्दा प्रमुख था। वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि यह सवाल भी उठा कि 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) चल रही है और इसे जारी रखा जाएगा या नहीं। नए निकाय में बौद्धिक और शोध संस्थानों की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ऐसे संस्थान में विशेषज्ञों और तकनीकीविदों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। चर्चा में इस पहलू पर भी जोर दिया गया कि इससे योजनाओं और नीतियों के निर्माण में निजी क्षेत्र की भूमिका के लिए भी अवसर बनेगा।

जेटली के मुताबिक करीब-करीब सभी ने बदलाव का पक्ष लिया। लेकिन एक सवाल उठा कि क्या मौजूदा ढांचे को नए रूप में विकसित किया जा सकता है या एक नया ढांचा खड़ा करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि तीन-चार मुख्यमंत्री चाहते थे कि वर्तमान आयोग को ही विकसित किया जाए। यह पूछने पर कि क्या वे कांग्रेस शासित राज्यों के थे, उनका जवाब था-आपका अनुमान सही है। प्रधानमंत्री ने बैठक में कहा कि नीति नियोजन की प्रक्रिया बदलने और इसे ‘ऊपर से नीचे के बजाए’, ‘नीचे से ऊपर’ की प्रक्रिया’ बनाने की जरूरत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्यों के विकास के बगैर देश का विकास असंभव है।

नए निकाय में राज्यों के अहम रोल पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी राज्य महसूस करते हैं कि उनके विचारों को अभिव्यक्त करने का कोई मंच नहीं है। अंतरराज्यीय विवादों के समाधान के लिए एक प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने पूछा- क्या हम नई व्यवस्था तैयार कर सकते हैं जो भारत की शक्तियों के अनुसार योजना बना सके, राज्यों को सशक्त कर सके और सरकार के बाहर होने वाली आर्थिक गतिविधियों समेत सभी आर्थिक गतिविधियों को समाहित कर सके। सहयोगपूर्ण संघीय व्यवस्था की भावना का आह्वान करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य ने भारत को आगे बढ़ने के लिए लंबी छलांग लगाने का एक मौका दिया है।

उन्होंने कहा कि देश अपनी शक्ति के सही उपयोग से इसे संभव कर सकता है व देश की शक्ति के समुचित दोहन के लिए योजना आयोग की जगह एक उपयुक्त निकाय के गठन की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा कि दो दशक से अधिक समय से योजना आयोग की भूमिका, प्रासंगिकता व पुनर्गठन पर बार-बार सवाल उठाए जाते रहे हैं। अब सभी के लिए विकास प्राथमिकता है व अब समय आ गया है जब वृद्धि और विकास के लिए एक नई व्यवस्था बनाई जाए।

मोदी ने यह भी रेखांकित किया कि अमेरिका जैसे देशों में जहां शोध संस्थान सरकार से स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, उनकी नीति निर्माण में बड़ी भूमिका है। उन्होंने कहा कि भारत में भी सरकारी ढांचे से इतर भी आर्थिक गतिविधियां बड़े पैमाने पर होती हैं और उनके लिए भी नीतियां तैयार करने की जरूरत है। मुख्यमंत्रियों ने जो बातें कहीं हैं, उससे योजना आयोग की जगह नए निकाय को स्वरूप देने में मदद मिलेगी। बैठक में अधिकार और योजना के विकेंद्रीकरण पर प्रधानमंत्री के दिए गए बल का उल्लेख करते हुए जेटली ने कहा कि यह सोचना भ्रम है कि केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन के मामले में सबके लिए एक ही पैमाना उपयुक्त होगा। कोई भी ऐसी योजना नहीं हो सकती जो सभी राज्यों को समान रूप से उपयोगी हो।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की अलग से खुले वातावरण में हुई गुफ्तगू में विकास के मुद्दों और अपने-अपने राज्य की सफलता की विशिष्ट कहानियों पर चर्चा के दौर चले। यह पहला मौका है जब मुख्यमंत्रियों के साथ किसी सम्मेलन में उनके साथ प्रधानमंत्री की इस तरह के अलग वातावरण में चर्चा हुई। इसका उद्देश्य एक-दूसरे की सफलताओं से सीखना और उसे दूसरे राज्यों में लागू करना है। मुख्यमंत्रियों ने शासन या सामाजिक सेवाओं की डिलीवरी में सुधार से जुड़े कम-से-कम एक ऐसे पहलू पर चर्चा की, जिसमें उन्होंने कुछ नया किया है और जिसका असर साफ दिखता है।

सभी सहभागियों ने इसे बड़ा उपयोगी प्रयोग बताया और कहा कि भविष्य में भी इसे दोहराया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि दो दशक से अधिक समय से योजना आयोग की भूमिका, प्रासंगिकता व पुनर्गठन पर बार-बार सवाल उठाए जाते रहे हैं। 1992 में आर्थिक सुधार शुरू किए जाने के बाद जब यह महसूस किया गया कि सरकारी नीति में बदलाव के मद्देनजर अलग दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, तब पहली बार इस बारे में आत्मनिरीक्षण किया गया। 2012 में भी संसदीय सलाहकार समिति ने योजना आयोग पर गंभीरता से विचार की जरूरत पर बल दिया और इसकी जगह नए निकाय के गठन की जरूरत बताया।

मंत्रिमंडल की 13 अगस्त को हुई बैठक में 15 मार्च 1950 के उस मंत्रिमंडल प्रस्ताव को खत्म करने को मंजूरी दी गई जिसके तहत योजना आयोग का गठन किया गया था। मंत्रिमंडल ने इसकी जगह नई संस्था की रूपरेखा तय करने के लिए प्रधानमंत्री को अधिकृत किया है।

 

 

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