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मैटर्निटी लीव को बढ़ाकर 26 हफ्ता किया गया, बिल को राज्यसभा की मंजूरी

प्रसूति अवकाश के दौरान महिलाओं को वेतन भी मिलेगा और तीन हजार रुपए का मातृत्व बोनस भी दिया जाएगा।
Author नई दिल्ली | August 11, 2016 19:38 pm
राज्यसभा की कार्यवाही। (पीटीआई फाइल फोटो)

मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह करने के प्रावधान वाले एक महत्वपूर्ण विधेयक को गुरुवार (11 अगस्त) को राज्यसभा की मंजूरी मिल गई। श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने प्रसूति प्रसुविधा (संशोधन) विधेयक 2016 पर हुई चर्चा के जवाब में कहा कि कामकाजी महिलाओं की आवश्यकताओं को देखते हुए इसमें यह प्रावधान किया गया है। उनके जवाब के बाद उच्च सदन ने विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। विधेयक में मातृत्व अवकाश की अधिकतम अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह किए जाने का प्रावधान किया गया है ताकि माताएं अपने बच्चों की बेहतर देखभाल कर सकें। दो बच्चों के मामलों में यह सुविधा 26 सप्ताह की होगी।

इसके बाद यह सुविधा 12 हफ्ते की होगी। साथ ही प्रसूति सुविधाएं किसी ‘अधिकृत माता’ या ‘दत्तक माता’ के लिए भी होंगी जो वे बालक के हस्तगत करने की तारीख से 12 सप्ताह की प्रसूति लाभ की हकदार होंगी। विधेयक में किसी माता को घर से काम करने की सुविधा को सुगम बनाने पर भी जोर दिया गया है। 50 से अधिक कर्मचारी वाले प्रतिष्ठानों के लिए शिशु कक्ष (क्रेच) की व्यवस्था अनिवार्य होगी। माताओं को प्रति दिन चार बार शिशु कक्ष जाने जाने की अनुमति होगी। ऐसी व्यवस्था न करने वाले संगठनों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक प्रतिष्ठान हर महिला को उसकी आरंभिक नियुक्ति के समय कानून के तहत उपलब्ध सुविधाओं के बारे में लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप से जानकारी देगा।

इससे पूर्व दत्तात्रेय ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि प्रसूता मां और बच्चों को बेहतर जीवन प्रदान करना एक बहुत ही गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दा है तथा यह विधेयक इस दिशा में काफी मददगार साबित होगा। उन्होंने कहा कि विधेयक का उद्देश्य है कि कार्यबल और कार्मिक बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जाए। संशोधनों से 18 लाख महिलाओं को लाभ होगा। विधेयक पर हुई चर्चा के दौरान कई दलों के सदस्यों ने इस विधेयक के दायरे में ‘किराये की कोख’ की सुविधा देने वाली माताओं को भी लाने का सुझाव दिया।

दत्तात्रेय ने कहा कि विधेयक में प्रसूति अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया है। प्रसूति अवकाश के दौरान महिलाओं को वेतन भी मिलेगा और तीन हजार रुपए का मातृत्व बोनस भी दिया जाएगा। 26 सप्ताह के प्रसूति अवकाश की सुविधा दो बच्चों के मामले में ही लागू होगी और अन्य मामलों में यह सुविधा 12 सप्ताह की ही रहेगी। मंत्री ने कहा कि 50 या अधिक कर्मचारी रखने वाले संस्थानों को शिशुओं के लिए क्रेच की सुविधा भी रखनी होगी जहां कोई भी मां चार बार अपने बच्चे से मिलने के लिए जा सकेगी। कोई भी नियोक्ता न तो कानून का उल्लंघन कर पाएगा और न ही इस वजह से किसी को निकाल पाएगा। उन्होंने कहा कि इस दौरान सदस्यों ने जो सुझाव दिए हैं, उन पर विचार किया जाएगा।

मंत्री ने कहा कि मातृत्व अवकाश के बारे में भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश दिया जाता है। मेक्सिको में 15, स्पेन में 16, फ्रांस में 16, ब्रिटेन में 20, नॉर्वे में 44 और कनाडा में 50 सप्ताह का मातृत्व अवकाश दिया जाता है। इससे पूर्व विधेयक पर हुई चर्चा में लगभग सभी दलों ने विधेयक के प्रावधानों का स्वागत किया और उन्होंने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के मुद्दों पर भी गौर करने का आग्रह किया। चर्चा में कई सदस्यों ने पितृत्व अवकाश का भी प्रावधान किए जाने का आग्रह किया ताकि माता और पिता मिलकर जिम्मेदारी उठाएं।

विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस की रजनी पाटिल ने कहा कि विधेयक के प्रावधानों से 18 लाख महिलाओं को फायदा होगा। उन्होंने दत्तक या सरोगेसी के मामले में भी 26 सप्ताह का अवकाश दिए जाने का सुझाव दिया। उन्होंने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए भी कुछ कदम उठाए जाने की मांग की। रजनी पाटिल ने कहा कि माता के साथ पिता की भी जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने कहा कि पितृत्व अवकाश का भी प्रावधान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नौकरियां देने के समय महिलाओं से तरह तरह के सवाल किए जाते हैं जो आपत्तिजनक हैं।

भाजपा के नारायण लाल पंचारिया ने कहा कि मातृत्व अवकाश 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह किए जाने से बड़ी संख्या में महिलाओं को लाभ होगा। उन्होंने कहा कि बच्चों को घर में छोड़कर माताओं के काम पर जाने से दोनों को परेशानी होती है। अन्नाद्रमुक की विजिला सत्यानंद ने कहा कि तमिलनाडु में पहले से ही 26 सप्ताह के मातृत्व अवकाश का प्रावधान है और अब वहां इसे 39 सप्ताह किए जाने का प्रस्ताव है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु की योजना पूरे देश के लिए रोल मॉडल होनी चाहिए।

तृणमूल कांग्रेस की डोला सेन ने विधेयक के प्रावधानों को प्रगतिशील बताते हुए कहा पितृत्व अवकाश का प्रावधान किए जाने का सुझाव दिया और कहा कि इससे दोनों मिलकर जिम्मेदारी उठा सकेंगे। जदयू की कहकशां परवीन ने कहा कि शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के मकसद से यह विधेयक लाया गया है। उन्होंने सरकार के इस प्रयास को सराहनीय करार दिया। हालांकि उन्होंने कहा कि सरकारी क्षेत्र में तो स्थिति ठीक है लेकिन कार्पोरेट क्षेत्र में क्या स्थिति रहेगी। घर से काम करने की सुविधा के प्रावधान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह सुविधा ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे मिल पाएगी।

विधेयक में दो बच्चों तक के लिए मातृत्व अवकाश का जिक्र होने पर उन्होंने कहा कि कई ऐसे मामले भी होते हैं जहां दो पुत्रियां रहने पर दत्तक पुत्र लेने की स्थिति रहती है। ऐसी स्थिति में भी लाभ मिलना चाहिए। माकपा के तपन कुमार सेन ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि इसका प्रयोजन तभी सार्थक होगा जब जमीनी स्तर पर महिलाओं को इसका लाभ मिले। बीजद की सरोजिनी हेम्ब्रम ने विधेयक को अच्छा कदम बताते हुए पितृत्व अवकाश की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि विधेयक लाने का कारण यह है कि आज एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है। संयुक्त परिवारों के न होने से बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है। ऐसे में बच्चे की देखरेख के लिए मां का घर पर रहना बेहद जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि विधेयक लाए जाने का दूसरा कारण यह है कि बच्चों में कुपोषण की समस्या बढ़ रही है। उन्हें स्तनपान कराना जरूरी होता है, लेकिन जब मां ही घर पर नहीं होगी तो बच्चे को स्तनपान कैसे कराया जा सकता है।

मंत्री ने कहा कि यह कोई अवकाश नहीं है। इसे अवकाश नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि बच्चे के पालन-पोषण के समय माताएं बहुत तनाव में होती हैं। उन्होंने कहा कि माताओं के लिए ऐसे में साढ़े छह महीने का समय पर्याप्त होगा। हालांकि संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन इससे भी ज्यादा अवकाश देते हैं। उन्होंने कहा कि संबंधित समस्याओं को लेकर महिलाओं के बार-बार ई-मेल आ रहे हैं। मेनका ने कहा कि 50 से अधिक कर्मचारियों वाले संगठन यदि कानून के मुताबिक बच्चों के लिए क्रेच की व्यवस्था नहीं करेंगे तो उनके लिए दंड का भी प्रावधान किया गया है।

उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं को अच्छा आहार उपलब्ध कराए जाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। देश के 200 जिलों में इंदिरा गांधी मातृत्व योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को पोषक आहार उपलब्ध कराया जाता है। बसपा के अशोक सिद्धार्थ ने विधेयक को स्वागतयोग्य बताया, लेकिन कहा कि मातृत्व अवकाश 26 सप्ताह की बजाय नौ महीने का होना चाहिए। भाकपा के डी राजा ने कहा कि महिलाओं की एक बहुत बड़ी संख्या असंगठित क्षेत्र में काम करती है जिनमें ज्यादातर दलित और जनजातीय महिलाएं हैं, ऐसे में इनके लिए भी एक केंद्रीय कानून लाया जाना चाहिए।

कांग्रेस के नरेंद्र बुढानिया ने मातृत्व अवकाश की अवधि 26 सप्ताह से बढ़ाकर एक वर्ष किए जाने की मांग की और कहा कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। सपा की जया बच्चन ने विधेयक का स्वागत किया और पूछा कि क्या संसद में काम करने वाली महिलाओं को भी ऐसी सुविधा मिलती है। इस पर मेनका ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि संसद में काम करने वाली महिलाओं को ऐसी सुविधा मिलती है। जया ने आगे कहा कि मातृत्व अवकाश को बढ़ाकर एक वर्ष या फिर कम से कम आठ महीने किया जाना चाहिए तथा आंगवाड़ी में काम करने वाली महिलाओं को भी इस तरह की सुविधाएं मिलनी चाहिए।

बसपा के सतीश मिश्र ने किराए की कोख उपलब्ध कराने वाली माताओं को भी विधेयक के दायरे में लाने की मांग की। इस पर कांग्रेस के आनंद शर्मा और तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने भी उनका साथ दिया और किराए की कोख उपलब्ध कराने वाली माताओं को विधेयक के दायरे में लाने की मांग की। चर्चा में मनोनीत अनु आगा, राकांपा से वंदना चौहान और कांग्रेस से वांसुक साइम ने भी भाग लिया।

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