December 11, 2016

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हंसुआ के ब्याह में खुरपी के गीत…

हंसुआ के ब्याह में खुरपी के गीत मतलब बन्ना-बन्नी को छोड़ लोग मोदी और नोटबंदी को छेड़ रहे हैं, मोदी से जुड़े गीत बजाए और गाए जा रहे हैं।

Author नई दिल्ली | November 30, 2016 11:01 am
जी हां, हंसुआ के ब्याह में खुरपी के गीत मतलब बन्ना-बन्नी को छोड़ लोग मोदी और नोटबंदी को छेड़ रहे हैं, मोदी से जुड़े गीत बजाए और गाए जा रहे हैं।

ये हैं समधी ब्लैकमार्केटिया मोदी इसको पकड़ो आप, दहेज में बोलेरो मांगता है, अरे बाप रे बाप…’ दिल्ली में रह रहे प्रवासी राजाराम के यहां शादी में ‘भतखै’ की रस्म के दौरान शगुन वाली गाली के दौरान औरतें यही गीत गा रही थीं और समधी के साथ लड़के वाले भी इस राजनीतिक निहितार्थ की गाली में मजे ले रहे थे। जब प्रधानमंत्री राष्ट्रीय चैनल पर किसी अहम काम की उद्घोषणा करें और दूसरे दिन से आम लोगों के जीवन की दिशा ही बदल जाए, तो उसका असर तो शादी- ब्याह पर पड़ना ही था। तो इस शादी के सीजन में सदाबहार गीत, आज मेरे यार की शादी है, बेदखल हो चुका है और मोदी जी की नोटबंदी की धुन पर रद्दी बन चुके असली नोटों की माला पहने बाराती थिरक रहे हैं। एक घराती, बराती को लक्ष्य कर गाती है हंसुआ के ब्याह में गाइब हो खुरपी के गीत, पुराना हजरिया नोट के नेग देख बुआ भइल भयभीत…।

जी हां, हंसुआ के ब्याह में खुरपी के गीत मतलब बन्ना-बन्नी को छोड़ लोग मोदी और नोटबंदी को छेड़ रहे हैं, मोदी से जुड़े गीत बजाए और गाए जा रहे हैं। सालियां, जीजा का जूता नहीं अब उनके स्मार्टफोन पर निगाह गड़ाए हैं, क्योंकि दूल्हे राजा पेटीएम तो इसी से करेंगे ना। बन्ना के धोखड़ी (जेब) हई खाली, साली जीजा के दे खूब गाली…।बिहार और पूर्वांचल के इलाकों के घरों की शादियों में नोटबंदी से जुड़ी सीडियां तो बाजार में आ ही गई हैं, लेकिन शादी के शगुन में गाए जाने वाले गीतों पर भी मोदी जी का खुमार छाया हुआ है। दरभंगा के सीएम साइंस कॉलेज के गोपनीय शाखा प्रभारी प्रवीण कुमार झा बताते हैं कि सरकार की नीतियों का असर जब जीने मरने पर पड़ने लगे, तो इसका असर लोकगीतों पर पड़ना स्वभाविक है। तभी तो दइया गे दइया ई का भइ गेलैं… हजरिया पांच सौ टकिया रद्दी भइ गेलै…, पनसुइया-हजरिया घूमे बजरिया, हमरा के छुट्टा कराई दीं बलमाजी…जैसे आम जनों की समस्याओं ने लोकगीतों को प्रभावित किया।

वैसे भी मिथिलांचल की एक समृद्ध परंपरा है और इस बार तो नोटबंदी से सबसे ज्यादा यही लोक गीत प्रभावित हुआ है, तो लोक गीतों की पैरोडी में दरभंगा महाराज के साथ मोदीजी भी गुनगुनाए जा रहे हैं। लोग खुश हैं या दुखी हैं, यह तो बाद की बात है पर शादी ब्याह रोज-रोज की बात नहीं होती। नोटबंदी जैसे फैसले यदि आदमी जीवन में एक बार देखता है, तो शादी भी एक बार ही करता है। शादी का बाजार फीका है, नेग मांगने पर समधीजी पेटीएम और स्वाइप मशीन की बात कह कर छेड़ दे रहे हैं, शादी के माहौल को मजेदार तो मोदी जी की कड़क चाय ही बना दे रही है। मौके के, लोगों के सहज सुख-दुख से जुड़े गीतों को लाने में भोजपुरी संगीत उद्योग हमेशा से आगे रहा है तो नोटबंदी और मोदी के कड़क फैसले से जुड़े गीतों की अगुआई भी वही कर रहा है। ज्यादातर शादियों में मोदी और नोटबंदी से जुड़े गीत बज रहे हैं। केवल बिहार ही नहीं मोदी के विभिन्न फैसलों का असर हरियाणवी और मेवाड़ी लोक गीतों में भी साफ नजर आता है।

 

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First Published on November 30, 2016 5:35 am

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