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स्कूलों और शौचालयों में सैनिटरी नैपकिन के लिए लगेंगी मशीनें

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की पहल पर दिल्ली सरकार, एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड (एचएलएल) के साथ मिलकर राजधानी के सभी सरकारी स्कूलों और मॉडल सामुदायिक शौचालयों में सैनिटरी नैपकीन की वेंडिंग और डिस्पोजल मशीनें लगाने पर विचार कर रही है।
Author नई दिल्ली | August 4, 2017 00:54 am
(File Photo)

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की पहल पर दिल्ली सरकार, एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड (एचएलएल) के साथ मिलकर राजधानी के सभी सरकारी स्कूलों और मॉडल सामुदायिक शौचालयों में सैनिटरी नैपकीन की वेंडिंग और डिस्पोजल मशीनें लगाने पर विचार कर रही है। इस बाबत दिल्ली सरकार ने बुधवार को एक बैठक कर एचएलएल से प्रस्ताव मांगा है और उम्मीद की जा रही है कि सितंबर से इस योजना पर कार्यान्वयन शुरू किया जा सकेगा। एनसीपीसीआर दिल्ली को मॉडल की तरह ले रहा है और सफल रहने पर देश के अन्य हिस्सों में भी यह पहल शुरू की जाएगी जिसमेंप्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहला हो सकता है।

सूत्रों के मुताबिक दिल्ली सरकार ने एचएलएल, जो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मान्य सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई है, से एक विस्तृत प्रस्ताव मांगा गया है कि शहर के सभी सरकारी स्कूलों और मॉडल सामुदायिक शौचालयों में सैनिटरी नैपकीन की वेंडिंग मशीनों और डिस्पोजल मशीन अर्थात इंसीनरेटर्स (भस्मक) लगाने की क्या लागत आएगी और लगाने की प्रक्रिया किस तरह की हो सकती है। स्कूलों में तो सैनिटरी नैपकीन मुफ्त में दिया जाता है, लेकिन मशीन लगने से नैपकीन लेने और उसे नष्ट करने में लड़कियों को सुविधा होगी। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक सामुदायिक शौचालयों में यह सुविधा मामूली भुगतान कर ली जा सकेगी।

एनसीपीसीआर शिमला में पॉयलट के तौर पर इस तरह की शुरुआत कर चुका है और अब यह दिल्ली को मॉडल के रूप ले रहा है। एनसीपीसीआर की भूमिका राज्य सरकार, निगम निकायों और एचएलएल को एक मंच पर लाने और जागरूकता फैलाने की है। एनसीपीसीआर की सदस्य रूपा कपूर ने कहा कि बिना सुविधा प्रदान किए जागरूकता के कोई मायने नहीं हैं, इसलिए मशीनें लगाने का काम शुरू होते ही समानांतर रूप से जागरूकता अभियान चलाया जाएगा जिसमें लड़कियों के साथ-साथ लड़कों को भी शामिल किया जाएगा। रूपा कपूर ने कहा, ‘स्कूलों में पैड तो मिलते हैं, लेकिन उन्हें नष्ट करना एक बड़ी समस्या है, वहीं बस्तियों में न तो पैड की सुविधा है, न ही उन्हें नष्ट करने को लेकर लोगों को सही जानकारी है, हमारा मकसद माहवारी स्वच्छता को लेकर लड़कियों और लड़कों दोनों को सभी आधुनिक जानकारियां देना है, इससे वे एक तो प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से बच सकते हैं, पैड सही तरह से नष्ट होंगे तो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचेगा और साथ ही इस मुद्दे पर सामाजिक वर्जनाओं से भी मुक्ति मिलेगी’।

माहवारी स्वच्छता पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता उर्मिला चमन पैड को सही तरह से नष्ट करने को एक अहम पक्ष मानती हैं और कहती हैं कि इसके संबंध में जानकारी और जिम्मेदारी के अभाव में लोग पैड कहीं भी फेंक रहे हैं, जिससे नलियां, नाले जाम हो रहे हैं, जगह-जगह गंदगी फैल रही है जो पर्यावरण और सामुदायिक स्वास्थ्य के लिहाज से खतरा है। एक आकलन के मुताबिक देश के कचरा में सैनिटरी नैपकीन का योगदान 3 फीसद है। उर्मिला इस पूरे अभियान में लड़कों को शामिल किया जाना अहम मानती हैं क्योंकि उनके मुताबिक एक तो वे अपने घरों के अंदर, सहपाठिनों और मोहल्ले की लड़कियों के प्रति संवेदनशील होंगे और दूसरा व्यस्क होने पर सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों में भी उनकी संवेदनशीलता बढ़ेगी।

बंगलुरू आधारित उर्मिला फिलहाल उत्तर प्रदेश में काम में लगी हुई हैं और वहां के ग्रामीण इलाकों में लोगों के बीच माहवारी स्वच्छता की जानकारी का बड़ा अभाव है। वह आयोग और दिल्ली सरकार के इस पहल की प्रशंसा करती हैं लेकिन उनका मानना है कि शहरों के बजाय गांवों में बड़े पैमाने पर काम किए जाने की जरूरत है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में लड़कियों और महिलाओं की आधी से भी कम आबादी सैनिटरी नैपकीन का इस्तेमाल करती है।

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