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OPINION: बिहार जीते तो 2019 में पीएम बनने का ख्‍वाब देख सकते हैं नीतीश

बिहार विधानसभा के चुनावों को पूरा विश्व टकटकी लगाकर इसलिए देख रहा है क्योंकि राजनीतिक विश्लेषक इन चुनावों को भारत की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला मान रहे हैं..
OPINION: बिहार जीते तो 2019 में पीएम बनने का ख्‍वाब देख सकते हैं नीतीश

बिहार विधानसभा के चुनावों को पूरा विश्व टकटकी लगाकर इसलिए देख रहा है क्योंकि राजनीतिक विश्लेषक इन चुनावों को भारत की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला मान रहे हैं। वास्तव में चुनावी अखाड़े में ऐसे-ऐसे दिग्गज ताल ठोक रहे हैं जो पहले कभी न कभी गहरे दोस्त रह चुके हैं।

ऐसे शुरू हुआ था लालू विरोध
वर्ष 1990 के दशक के पहले नीतीश एवं लालू की जोड़ी जेपी आंदोलन का प्रमुख हिस्सा हुआ करती थी तथा दोनों ही युवा नेता जेपी के प्रिय मित्र माने जाते थे। वर्ष 1990 में लालू के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद दोनों में खटास उस समय आ गई जब लालू यादव ने सत्ता के नशे में दूसरे किसी पुराने साथी को भाव देना बंद कर दिया। वर्ष 1990 का दशक बिहार में लालू यादव के उत्थान का दशक था। वे उन दिनों नित्य नई बुलंदियों को छू रहे थे। अपनी घटती हैसियत देखकर जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश जैसे समाजवादी नेताओं ने मिलकर समता पार्टी का गठन किया और लालू को चुनौती देने के लिए कमर कस ली।

लालू के शाासन को नीतीश ने ही सबसे पहले कहा था जंगलराज
वर्ष 1995 के चुनाव में समता पार्टी जब बिहार विधानसभा में मात्र पांच सीटों पर ही सिमट गई तो इन नेताओं ने हताश होकर भाजपा की ओर दोस्ती के हाथ बढ़ा दिए। वर्ष 2000 का विधानसभा चुनाव भाजपा एवं समता पार्टी ने मिलकर लड़ा, लेकिन मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बावजूद नीतीश कुमार सदन में अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए। इस तरह लालू यादव का जादू बिहार में यथावत चलता रहा। वास्तव में लालू यादव के कार्यकाल को जंगल-राज कहने की शुरुआत नीतीश कुमार ने ही की थी क्योंकि उस समय लालू यादव की तूती बोल रही थी और नीतीश कुमार हाशिये पर जा चुके थे। वर्ष 2005 के विधानसभा के चुनावों में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिल गया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के रूप में उभर कर सामने आए। हालांकि, भाजपा के विधायकों की संख्या जदयू के विधायकों से कहीं ज्यादा थी। बिहार के उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी अक्सर नीतीश कुमार की बड़ाई के कसीदे गढ़ा करते थे और उनको प्रधानमंत्री पद का योग्य पात्र कहा करते थे।

पीएम बनने का ख्‍वाब देखने लगे थे नीतीश
वाजपेयी जी के प्रधानमंत्रित्व-काल में भाजपा एवं जदयू गठबंधन ठीक से चलता रहा, लेकिन वर्ष 2004 के संसदीय चुनावों में भाजपा जब बुरी तरह हार गई तो एनडीए गठबंधन का नेतृत्व वाजपेयी जी के हाथों से निकल कर आडवाणी जी के हाथों में चला गया क्योंकि वाजपेयी जी काफी अस्वस्थ रहने लगे थे। आडवाणी जी एवं नीतीश कुमार के रिश्ते भी ठीकठाक ही बने रहे, लेकिन वर्ष 2009 के संसदीय चुनावों में जब प्रधानमंत्री के प्रत्याशी बनाए जाने के बावजूद आडवाणी जी लोकसभा में बहुमत से काफी दूर रह गए तो नीतीश जी के मन में आस जगी थी कि वर्ष 2014 में होने वाले संसदीय चुनावों में एनडीए शायद इनको प्रधानमंत्री के प्रत्याशी के रूप में स्वीकार कर ले। नीतीश जी की ग्राह्यता वैसे भी भाजपा के दूसरे नेताओं से कहीं अधिक थी। इसी दौरान भाजपा ने वर्ष 2013 में ही जब नरेंद्र मोदी का नाम भावी प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढ़ाना शुरू किया तो नीतीश जी के कान खड़े हो गए और उन्होंने भाजपा से एकतरफा नाता तोड़ लिया। नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के व्यक्तिगत रिश्ते कभी खराब नहीं रहे और शायद यही कारण था कि वर्ष 2002 के गुजरात के कुख्यात दंगों के बाद भी नीतीश कुमार ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इ्तीफा देना उचित नहीं समझा, जबकि रामविलास पासवान वर्ष 2002 के के साम्प्रदायिक दंगों को मुद्दा बनाकर मंत्रिमंडल से अलग हो गए थे।

विडम्बना देखिए कि आज वही रामविलास पासवान भाजपा की गोद में बैठे हुए हैं जबकि नीतीश कुमार भाजपा के कट्टर विरोधी बनकर उनसे लोहा लेने के लिए तैयार हैं। कुछ इसी किस्म की खटास नीतीश कुमार और लालू यादव में भी थी, लेकिन मोदी की लहर ने दोनों को मिलने पर मजबूर कर दिया है। इस पृष्ठभूमि में यदि बारीकी से देखा जाए तो बिहार विधानसभा के वर्तमान चुनाव दोस्त से दुश्मन एवं दुश्मन से दोस्त बने राजनेताओं का ही दंगल है जो एक-दूसरे को अब फना करने के लिए कमर कसे हुए हैं।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश जारी
बिहार विधानसभा चुनावों को देखकर लियो टॉल्सटॉय का बहुचर्चित वाक्य याद हो आता है जिसमें उन्होंने कहा है कि जंग एवं प्यार में कुछ भी ग़लत नहीं हुआ करता। शायद यही कारण है कि बिहार की लड़ाई में दोनों पक्षों की ओर से हरेक किस्म के जुबानी हमले किए जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी एवं नीतीश कुमार में अब चूंकि आर-पार की लड़ाई छिड़ गई है इसलिए दोनों पक्ष कोई भी ऐसा मौका चूकना नहीं चाहते जिससे विरोधी को अधिकतम नुकसान पहुंचाया जा सके। महागठबंधन जहां सर संघचालक मोहन भागवत के आरक्षण के मामले में दिए गए बयान को मुद्दा बना चुका है तो वहीं एनडीए गठबंधन विकास का राग तो अालाप रहा है लेकिन नेपथ्य से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश भी जारी है। वर्ष 2014 के संसदीय चुनावों में यूपी में मुजफ्फरनगर के हुए दंगों से भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से काफी लाभान्वित हो चुकी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि नरेंद्र मोदी एवं नीतीश कुमार की इस भीषण लड़ाई के दूरगामी परिणाम होंगे क्योंकि यदि भाजपा गठबंधन बिहार को फतह करने में सफल हो जाता है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचा हुआ कार्यकाल पूर्णतः निरापद हो जाएगा। वह अन्य राज्यों में भी कब्जा जमाकर वर्ष 2019 के संसदीय चुनावों को फिर जीतने के लिए पूरी तरह ऊर्जान्वित हो जाएंगे। इसके ठीक विपरीत यदि बिहार के चुनावों में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बने महागठबंधन का पलड़ा भारी रहता है तो वर्ष 2019 के संसदीय चुनावों में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद का सर्वमान्य चेहरा बनकर नरेंद्र मोदी को धवस्त करने का बीड़ा उठा लेंगे। इस प्रकार दोनों ही नेताओं का भविष्य बिहार के चुनावों पर टिका हुआ है। नीतीश कुमार अब अंग्रेजी की लोकप्रिय कहावत ‘नो रिस्क नो गेन’ पर चलकर अपने भाग्य को आजमाने का मन बना चुके हैं क्योंकि लगभग सभी दलों के अन्य नेता नरेंद्र मोदी के सामने अब नतमस्तक हो चुके हैं।

संभव है दृढ़ निश्चय की उपरोक्त प्रेरणा नीतीश कुमार को पंचतंत्र के निम्नांकित सूत्र से मिली हो…

कृतनिश्चयिनो वन्द्यास्तुड़िगमा न प्रशस्यते।
चातकः को वराकोअयं यस्येन्द्रो वारिवाहकः ।।

अर्थात् दृढ़ निश्चय ही मनुष्य के जीवन में महत्तव रखता है, उसका लंबा-चौड़ा शरीर नहीं क्योंकि छोटी-सी चातक चिड़ियां विशालकाय बादलों को विवश कर देती हैं कि वे उसके मुंह में स्वाति की बूंद डालें।

(लेखक इंदर सिंह नामधारी दशकों तक बिहार में राजनीति कर चुके हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। वह झारखंड के चतरा से सांसद और विधानसभा के स्‍पीकर भी रहे हैं। यहां लिखे विचार उनके निजी हैं )

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  1. S
    Santosh Makharia
    Oct 27, 2015 at 1:11 pm
    लेखक चाहे जितने भी अनुभव से इस लेख को लिखे हों किन्तु उन्हें इस लेख के द्वारा अपनी सम्भावनाओ के सवार खुलने की उम्मीद है /देश में यदि मोदी जी को सीधी चुनोती किसी ने दी है तो उसकी मांद दिल्ली में ही केजरीवा;ल ने दी है /रहा सवाल नितीश जी का उन्हें बेशक बिहार की जनता ने नजरो से नही उतारा है किन्तु उनकी अवसर वादिता को लेखक ने नजरअंदाज किया है /ऐसा नही की उन्हें इसका अहसास नही किन्तु अपनी सम्भावना उन्हें नितीश की जीत में दिखती है /
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    Reply
    1. S
      Sugandh Kumar
      Oct 19, 2015 at 8:14 pm
      hahahah राहुल, केजरीअल , ममता , जयलाइटी और नितीश वि पम के रेष में लालू को २०१९ में पम बनाना है
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      Reply
      1. उर्मिला.अशोक.शहा
        Oct 22, 2015 at 5:07 am
        वन्दे मातरम- लोहिया समाजवादियोंका यही अफसाना है उन्हें सिर्फ सत्ता चाहिए लालू नितीश के पचीस साल का कार्यकाल बिहार को पिछड़ा रखने में गुजर गया अब बिहार की जनता बदलाव चाहती है विकास चाहती है और मोदी के सिवाय कोई पर्याय नहीं है जा ग ते र हो
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        Reply
        सबरंग