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JNU प्रोफेसर का दावा- राष्‍ट्रवाद के विरोधी थे टैगोर, जीवित होते तो अपने गीत को नहीं बनने देते National Anthem

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने दावा किया कि वह धार्मिक सांप्रदायिक राष्‍ट्रवाद के विरुद्ध थे। उन्‍होंने हमेशा शिक्षा की शक्ति पर बल दिया। एक बार किसी ने उनसे पूछा- आपकी ताकत क्‍या है तो उन्‍होंने जवाब दिया- अस्थिरता।
Author नई दिल्‍ली | March 1, 2016 13:59 pm
प्रोफेसर रणबीर चक्रवर्ती ने यह भी कहा कि टैगोर ने किंग जॉर्ज के सम्‍मान में नहीं लिखा था ‘जन गण मन’ ।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU‍) के प्रोफेसर रणबीर चक्रवर्ती ने सोमवार को छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि रबिंद्रनाथ टैगोर ने स्‍वराज को जाति और राष्‍ट्र से ऊपर रखा। उन्‍होंने हमेशा मानवता को राष्‍ट्रवाद से ज्‍यादा अहम माना। प्रोफेसर चक्रवर्ती ने हैरानी जताते हुए कहा, ‘टैगोर उन देशों (भारत और बांग्‍लादेश) के बारे में कैसा महसूस करते होंगे, जहां उनकी कविता को नेशनल एंथम के रूप में गाया जाता है। उन्‍होंने आगे कहा, ‘टैगोर को ज्‍यादातर लोग इसलिए जानते हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने भारत और एशिया से नोबेल पुरस्‍कार जीतने वाले पहले शख्‍स थे। उनकी ऐसी कविताएं लिखीं, जो ‘भयविहीन’ हैं। वह ब्राह्मण स्‍कूल में पढ़ें, लेकिन उनके बारे में कई बातें ऐसी भी हैं, परस्‍पर विरोधाभासी हैं।’

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने कहा, ‘टैगोर में कई बातें परस्‍पर विरोधाभासी हैं। इनमें से एक थी कि उन्‍होंने हमेशा राष्‍ट्रवाद की आलोचना की। लेकिन दो राष्‍ट्र हैं और शायद तीसरा भी (श्रीलंका) जहां टैगोर का लिखा नेशनल एंथम गाया जाता है। राष्‍ट्रवाद को सपोर्ट किया बिना टैगोर इन देशों के नेशनल एंथम से जुड़े हैं। मुझे इस बात पर शक है कि अगर वह जीवित तो अपने लिखे गीतों को नेशनल एंथम बनाने पर सहमत होते।’

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने यहां तक दावा किया कि ‘जन गण मन’ को टैगोर ने राष्‍ट्र के प्रति सम्‍मान प्रकट करने के लिए लिखा था। उन्‍होंने कहा था कि यूपी के एक विधायक ने कहा था कि ‘जन गण मन’ किंग जॉर्ज का स्‍वागत करने के लिए लिखा गया था। लेकिन यह सच नहीं है। एक पत्र में टैगोर ने लिखा था कि उन्‍होंने इसे राष्‍ट्र के प्रति आदर प्रकट करने के लिए लिखा था। लोगों को यह पत्र पढ़ना चाहिए।

राष्‍ट्रवाद और राष्‍ट्रविरोध के बारे में बात करते हुए प्रोफसर ने कहा, ‘आज कल सबकुछ पारिभाषित है। कौन राष्‍ट्रवादी है, कौन राष्‍ट्रविरोधी है…ऐसा लगता है कि जिनका नजरिया थोड़ा अलग है, उनसे सवाल पूछा जाता है…हमारे जैसे विश्‍वविद्यालयों के बारे में बड़ी आसानी से ब्रांडिंग कर दी जाती है। लेकिन टैगोर ने हमें सवाल पूछना सिखाया है और उनके सवालों से हमें सवाल पूछने की हिम्‍मत मिलती है।’

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने दावा किया कि वह धार्मिक सांप्रदायिक राष्‍ट्रवाद के विरुद्ध थे। उन्‍होंने हमेशा शिक्षा की शक्ति पर बल दिया। एक बार किसी ने उनसे पूछा- आपकी ताकत क्‍या है तो उन्‍होंने जवाब दिया- अस्थिरता। लोग उनसे पूछते थे- आपकी कमजोरी क्‍या है, इसके जवाब में भी वह यही बात कहते थे- अस्थिरता। हमें सवाल पूछने चाहिए। अगर हम सत्‍ताधारियों से सवाल नहीं पूछेंगे तो हमें कभी पता नहीं चलेगा कि भविष्‍य में क्‍या होना है।

टैगोर की दो लाइनों के साथ अपना लेक्‍चर समाप्‍त करते हुए चक्रवर्ती ने कहा, ‘यदि आप अपने राष्‍ट्र से प्रेम करना चाहते हैं तो उससे ऊपर जाओ और मानवता को कभी इसका विकल्‍प मत समझो।’

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