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JNU Row: लिंगदोह की नाफरमानी पर अड़ा JNU

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में लिंगदोह नाफरमानी का नया विवाद अनायास नहीं, बल्कि सोच-समझकर उठाया गया कदम है।
Author नई दिल्ली | April 16, 2016 03:22 am
(express Photo)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में लिंगदोह नाफरमानी का नया विवाद अनायास नहीं, बल्कि सोच-समझकर उठाया गया कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रसंघ चुनाव में लिंगदोह कमेटी की सिफारिश को लागू करने के निर्देश दिए थे, साथ ही तीन साल तक इसकी मॉनिटरिंग करने को भी कहा था और फिर मामला संवैधानिक पीठ को भेज दिया गया था। तीन साल पूरे हो चुके हैं। इसके बावजूद कई ऐसे तर्क हैं जिनकी बदौलत जेएनयूएसयू (छात्र संघ) का सत्तारूढ़ वाम धड़ा छात्र संघ चुनाव लिंगदोह के तहत नहीं कराने पर अड़ा है। इसे लेकर जेएनयूएसयू में सत्तारूढ़ वामपंथी संगठनों आइसा-एसएफआइ के अपने तर्क हैं और एबीवीपी के अपने तर्क।

बता दें कि जेएनयू के वाम छात्रों ने छात्र संघ चुनाव के लिए लिंगदोह समिति की सिफारिशें ठुकरा दी हैं और चुनाव के लिए विश्वविद्यालय के संविधान का पालन करने का फैसला किया है। जेएनयूएसयू ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा है कि जेएनयू छात्र संघ चुनाव लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार नहीं, बल्कि जेएनयू के संविधान के अनुसार कराया जाएगा।

जेएनयूएसयू उपाध्यक्ष शहला राशिद शोरा का कहना है कि लिंगदोह समिति की सिफारिशों में विभिन्न मनमाने अनुच्छेद हैं जिनका हमने हमेशा विरोध किया है। बहरहाल, अब हमने इसे खारिज करने और अपना चुनाव विश्वविद्यालय संविधान के अनुसार करने का फैसला किया है। वहीं आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व जेएनयूएसयू अध्यक्ष सुचेता डे ने कहा कि जेएनयू संविधान के तहत सालों से हो रहे चुनाव लिंगदोह की सिफारिशों से भी आगे संयमित हैं। यही वजह है कि खुद जेएम लिंगदोह ने भी अपनी सिफारिश में जेएनयू छात्र संघ चुनाव का उदाहरण देते हुए ऐसी व्यवस्था सभी विश्वविद्यालयों में लागू करने की बात कही थी। फिर जेएनयू पर लिंगदोह क्यों? जेएनयू का ढांचा अलग है। यहां शोध (पीएचडी) छात्रों का दायरा बड़ा है। यही वजह है कि चार साल पहले जेएनयू छात्र संघ को लिंगदोह में चुनाव लड़ने की उम्र सहित कई तरह की छूट मिली थी। इसकी समीक्षा करने की बात भी कही गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब जेएनयू शर्त नहीं चाहता, बल्कि अपने संविधान के तहत चुनाव चाहता है।

सुचेता ने एक सवाल के जवाब में कहा कि जेएनयू के संविधान और लिंगदोह में खास अंतर यह है कि जेएनयू के संविधान में चुनावों को लेकर छात्रों के लोकतांत्रिक मूल्यों को ज्यादा तरजीह दी गई है। इसके तहत छात्रों को ही चुनाव कराने के अधिकार दिए गए हैं, प्रशासन का इसमें कोई दखल नहीं होता। इससे छात्रों में आत्म चिंतन और स्वानुशासन बढ़ता है। हालांकि यह मामला अभी क्यों उठाया गया, जबकि जेएनयू के छात्र चार साल तक निलंबित रहे अपने संगठन (जेएनयूएसयू) की 2012 में सशर्त बहाली पर तैयार हो गए थे। इस सवाल पर ज्यादातर छात्र नेता कन्नी काट जाते हैं। जेएनयूएसयू के पदाधिकारी चर्चा में बने रहने के आरोप को भी खारिज करते हैं।

जेएनयूएसयू के सचिव और एबीवीपी के छात्र नेता सौरभ शर्मा ने इस मुद्दे पर कहा कि एबीवीपी का रुख साफ है और वह सुप्रीम कोर्ट के अंतिम दिशानिर्देश मिलने तक यथास्थिति चाहता है। 70-80 लोग सात-आठ हजार लोगों के भाग्य का फैसला नहीं कर सकते। एबीवीपी इस मामले में किसी भी फैसले से पहले छात्रों के बीच बहस और हस्ताक्षर अभियान चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि वाम धड़ा विश्वविद्यालय में जमीनी काम न कराए जाने के मुद्दे से ध्यान हटाना चाह रहा है। लिंगदोह की सिफारिशें नहीं मानने की उसकी जिद से छात्रसंघ के निलंबन की संभावना ज्यादा बढ़ गई है जबकि एबीवीपी का मानना है कि जेएनयूएसयू का अस्तित्व ज्यादा जरूरी है। पिछले कई महीने से कैंपस में क्या हो रहा है यह सर्वविदित है। छात्रसंघ के फैसले में एबीवीपी की सहमति नहीं है।

बता दें कि लिंगदोह समिति की सिफारिशों का पालन नहीं करने पर चार साल (2008 से 2011) तक निलंबित रहने के बाद जेएनयू ने 2012 में चुनाव प्रक्रिया बहाल की थी। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह की अध्यक्षता में बनी समिति ने विश्वविद्यालय की राजनीति को साफ करने के लिए प्रति उम्मीदवार पांच हजार रुपए के चुनाव खर्च समेत अनेक सिफारिशें कीं। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन सिफारिशों को लागू किया जाए। चार साल की कानूनी लड़ाई के बाद जेएनयू के छात्र सिफारिशों के पांच बिंदुओं पर सहमति के साथ चुनाव में शामिल हुए। हालांकि अब वाम दलों की अगुआई में छात्रों ने लिंगदोह समिति की सिफारिशों को खारिज कर नया विवाद पैदा कर दिया है।

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