ताज़ा खबर
 

इन पांच कारणों से तय है शरद यादव और नीतीश कुमार का रिश्ता टूटना

लालू यादव की पार्टी राजद दो नेता मनोज झा और रघुवंश प्रसाद सिंह शरद यादव से मिल चुके हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (बाएं) और जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव। (फाइल फोटो)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजद-कांग्रेस गठबंधन से अलग होकर बीजेपी-एनडीए के साथ मिलकर दोबारा सरकार बना लेने के बाद से ही ये अटकल लगाई जा रही है कि जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव पार्टी से अलग हो सकते हैं। शरद यादव मीडिया से कह चुके हैं कि वो नीतीश के फैसले से इत्तेफाक नहीं रखते। शरद ने बीजेपी से हाथ मिलाने को दुर्भाग्यपूर्ण भी कहा। दूसरी तरफ नीतीश ने शरद यादव को सार्वजनिक रूप से रोष जारी करने के बजाय पार्टी के मंच पर बहस करने के लिए कहा। 19 अगस्त को पटना में जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी है। सभी की निगाहें उस पर लगी हैं। लेकिन राजनीतिक जानकारों की मानें तो इस बात की संभावना बहुत बढ़ गई है कि शरद यादव नीतीश से नाता तोड़ लें। लालू यादव के दो करीबी नेता मनोज झा और रघुवंश प्रसाद सिंह शरद से मिले थे। हालांकि शरद के करीबी अभी अलग पार्टी बनाने की बात से इनकार कर रहे हैं। आइए देखते हैं वो पांच कारण कौन से हैं जिनसे टूट सकता है शरद और नीतीश का डेढ़ दशक से पुराना रिश्ता।

1- जदयू में घटता कद- पिछले साल नीतीश कुमार शरद यादव को हटाकर खुद जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष बन गए। शरद यादव जदयू के संस्थापकों में एक हैं लेकिन आज वो केवल राज्य सभा सांसद भर हैं। वो उच्च सदन में पार्टी के नेता हैं लेकिन कब तक रहेंगे कहा नहीं जा सकता। बिहार में जदयू सरकार में है वहां शरद की कोई सीधी दखल नहीं है। जाहिर है पार्टी और राज्य सरकार से उन्हें पहले ही किनारे किया जा चुका है। शरद खुद नीतीश के साथ मिलकर जॉर्ज फर्नांडीस को ऐसे ही किनारे लगा चुके हैं जैसे आज नीतीश उन्हें लगाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। ऐसे में शरद यादव को लग सकता है कि जॉर्ज की हालत में पहुंचने से पहले पार्टी से अलग होकर अपनी इज्जत बचायी जा सकती है।

2- वैचारिक मतभेद- नेताओं के वैचारिक मतभेद को ज्यादा तवज्जो देना व्यावहारिक नहीं है फिर भी पिछले कुछ सालों में शरद यादव और नीतीश कुमार के बीच कई मुद्दों पर तीखे मतभेद रहे। राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार को समर्थन, नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर दोनों के बीच मतभेद सामने आ गए। राजद-कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने और बीजेपी से जोड़ने को लेकर भी शरद ने साफ कह दिया है कि वो नीतीश से सहमत नहीं थे। ऐसे में नीतीश कुमार की तरह शरद यादव भी “अंतरआत्मा की आवाज” सुन लें तो किसे हैरत होगी। जब पार्टी में उनके नजरिए के लिए जगह नहीं बची तो वो रह कर भी क्या कर लेंगे।

3- यादव नेताओं का ‘महागठबंधन’- बिहार में जब 2015 के विधान सभा चुनाव से पहले राजद-कांग्रेस-जदयू ने गठबंधन किया तो उसे “महागठबंधन” का नाम दिया गया। बहरहाल 26 जून को नीतीश ने इस गठबंधन को तोड़ दिया। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में जिस तरह के राजनीतिक हालात बनते दिख रहे हैं उसमें अगर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के सबसे जाने-माने यादव नेता जातीय गोलबंदी के आधार पर आपस में हाथ मिला लें तो बड़ी बात नहीं होगी। शरद यादव भले ही बिहार से राज्य सभा सांसद हों, वो मूलतः मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले हैं। लालू यादव शरद को अपने साथ आने का खुला न्योता दे चुके हैं। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव उनसे बात कर चुके हैं। आपको याद होगा कि कुछ महीनों पहले ये खबर आई थी कि समाजवादी पार्टी और राजद का आपस में विलय हो सकता है। सपा के अखिलेश और मुलायम के खेमे में बंट जाने के बाद ये चर्चा बंद हो गई। लेकिन सभी जानते हैं कि राजनीति संभावनाओं की कला है और इसमें कौन सी संभावना कब जन्म ले ले ये कोई नहीं कह सकता।

4- विपक्षी एकता की धुरी- एक संभावना ये भी जताई जा रही है कि शरद यादव गैर-बीजेपी दलों की एका कायम करने में केंद्रीय भूमिका निभा सकते हैं। बीजेपी 2019 के आम चुनाव के लिए कमर कस चुकी है। बीजेपी के खिलाफ गठबंधन करके आम चुनाव लड़ने की जरूरत तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, राजद के लालू यादव, सपा के अखिलेश यादव और खुद शरद यादव बता चुके हैं। ऐसे में शरद अपने भावी राजनीतिक जीवन के लिए नई और सार्थिक भूमिका की तलाश के लिए ये विकल्प चुन लें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। ऐसा हुआ तो शरद नीतीश का साथ छोड़ने में ही भला समझेंगे।

5-  नीतीश से बदला- नेता भावनाओं की सुनते हों ये बात आज कम लोग मानेंगे। लेकिन अपमान की भावना को भुलाना आसान भी नहीं। अगर शरद बाकी चीजें भूलकर पिछले कुछ सालों में नीतीश द्वारा बार-बार पर कतरे जाने से अपमानित होने की बात याद रखेंगे तो उनके लिए नीतीश से प्रतिकार का सबसे बेहतर मौका मौजूद है। शरद के पास कोई जमीनी वोट बैंक नहीं है। न ही संगठन। लेकिन शरद यादव राजधानी में रहने वाले राष्ट्रीय नेता हैं जिसे राष्ट्रीय मीडिया पूरी तवज्जो देता है। प्रोपगैंडा पर टिकी राजनीति के दौर में वो नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी दोनों के खिलाफ माहौल बनाने वाले नेता के तौर पर यूपीए के लिए काम के साबित हो सकते हैं। और इससे वो अपने अपमान का बदला भी ले सकेंगे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग