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इसरो ने सेना को दी थी पाक में आतंकी ठिकानों की सटीक जानकारी

भारतीय अंतरिक्ष एजंसी अभी और भविष्य में भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा में मदद करने के मामले में कभी कमजोर नहीं पड़ेगी।
Author नई दिल्ली | October 3, 2016 02:14 am
उरी हमला: सेना मुख्यालय पर तैनात जवान (PTI Photo)

भारतीय जवानों ने नियंत्रण रेखा के पार आतंकी शिविरों में जिन सटीक ‘लक्षित हमलों’ को अंजाम दिया है, उनमें कुछ ऐसे ‘धात्विक पक्षियों’ ने भी मदद की, जो आकाश में इतना ऊंचा उड़ते हैं कि पाकिस्तानी उन्हें देख नहीं पाते हैं। इसके अलावा इन अभियानों की तैयारी और क्रियान्वयन में कम से कम छह उपग्रहों ने मदद की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) युद्ध नहीं लड़ता और यह पूरी तरह से एक असैन्य एजंसी है। लेकिन देश को कुछ ऐसी क्षमताओं से यह लैस करता है, जो विश्व में उत्कृष्ट हैं। इसरो के 17 हजार कर्मचारी चुपचाप और लगातार 1.2 अरब भारतीयों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए योगदान दे रहे हैं। इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन कहते हैं, ‘अंतरिक्ष एजंसी के पास प्रौद्योगिकी का भंडार है और सभी को समुचित तरीके से तैनात किया गया है। प्रत्येक प्रयोगकर्ता एजंसी इनका इस्तेमाल सर्वोच्च लाभ लेते हुए कर रही है।’ साफ तस्वीरें भेजने वाले उपग्रह का इस्तेमाल शहरी नियोजन में किया जा सकता है। यह सीमा पार आतंकी शिविरों पर भी नजर रख सकता है।

इसरो के अध्यक्ष किरण कुमार ने कहा, ‘भारतीय अंतरिक्ष एजंसी अभी और भविष्य में भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा में मदद करने के मामले में कभी कमजोर नहीं पड़ेगी।’ आज पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा में भारत के 33 उपग्रह हैं और एक उपग्रह मंगल की कक्षा में है। इनमें 12 संचार उपग्रह, सात दिशासूचक उपग्रह, 10 पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रह और चार मौसम निरीक्षक उपग्रह हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में यह उपग्रहों के सबसे बड़े जखीरे में से एक है। हर उपग्रह को किसी काम विशेष के लिए तैयार किया गया है और जब भी जरूरत पड़ती है, तब ये भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा में मदद करते हैं। भारत के पास आकाश में कई पैनी नजरें हैं। ‘लक्षित हमले’ की तैयारी करने में उसके सर्वश्रेष्ठ कारटोसैट 2-शृंखला के उपग्रह ने अहम भूमिका निभाई। इसे 22 जून को प्रक्षेपित किया गया था। धरती से 500 किलोमीटर से अधिक की ऊंचाई पर मौजूद यह उपग्रह पाकिस्तान की हर चीज को सावधानी के साथ देख सकता है और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बड़े बंगले में खड़ी कारों की संख्या तक को आसानी से गिन सकता है। आकाश में मौजूद भारत का यह दुर्जेय जासूस पाकिस्तान में कहीं भी खड़े किए गए प्रत्येक टैंक, ट्रक और लड़ाकू विमान को गिन सकता है। इसकी रेजोल्यूशन क्षमता लगभग 0.65 मीटर की है।

कुमार ने कहा, ‘कारटोसैट 2 शृंखला के पास एक मिनट का वीडियो लेने की अदभुत क्षमता है। अपनी 37 किलोमीटर प्रति सेकेंड की तेज गति के बावजूद यह एक मिनट के लिए किसी एक बिंदु पर फोकस कर सकता है।’ इसके अलावा पृथ्वी की तस्वीरें लेने वाले तीन अन्य उपग्रह- कारटोसैट-1, कारटोसैट-2 और रिसोर्ससैट-2 हैं,  जो दिन के समय उच्च स्तरीय तस्वीरें उपलब्ध करवाते हैं। भारत ऐसे उपग्रह विकसित करना चाहता है, जिनका रेजोल्यूशन 25 सेमी का हो। इसके विपरीत, पाकिस्तान के पास ऐसी कोई क्षमता नहीं है क्योंकि उसका अंतरिक्ष कार्यक्रम बमुश्किल शुरू ही हुआ है। इसरो के पूर्व अध्यक्ष जीमाधवन नायर कहते हैं कि चीन के पास भी इतने अधिक रेजोल्यूशन वाले उपग्रह नहीं हैं। चीन के पास जो सबसे उत्कृष्ट रेजोल्यूशन की क्षमता है, वह पांच मीटर की है। भारत के कुछ ऐसे उपग्रह भी हैं, जिनके पास दिन-रात देख सकने की क्षमताएं हैं।

ये उपग्रह ‘सिंथेटिक एपर्चर रडार सैटेलाइट’ कहलाते हैं। कक्षा में ऐसे दो उपग्रह- आरआइसैट-1 और आरआइसैट-2 हैं। इन दोनों उपग्रहों की नजरों से कुछ भी बच नहीं सकता क्योंकि ये बादल के पार भी देख सकते हैं और रात में भी इनकी देखने की क्षमता सक्रिय रहती है। खासतौर पर आरआइसैट-2 इस श्रेणी का उत्कृष्ट उपग्रह है और इसका घूर्णनकाल तुलनात्मक रूप से कम है। ये रडार उपग्रह बाढ़ पर नजर रखने के साथ-साथ दुर्घटनाग्रस्त हुए विमानों एवं हेलीकॉप्टरों की खोज के लिए भी तैनात किए जाते हैं। भारत की क्षेत्रीय उपग्रह दिशासूचक प्रणाली नाविक (एनएवीआइसी) के सात उपग्रहों में से अंतिम उपग्रह को बीते 28 अप्रैल को प्रक्षेपित किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रणाली के व्यापक लाभों के बारे में बताया था। यह प्रणाली अमेरिकी जीपीएस की तर्ज पर 20 मीटर की सटीकता के साथ दिशासूचक संकेत (नेविगेशन सिग्नल) देती है। इसका दायरा सीमा के हर ओर 1500 किलोमीटर तक फैला है। इससे पूरे साल हर क्षण संकेत भेजे जाते हैं। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में ऐसी क्षमता सिर्फ अमेरिका और रूस के पास ही है। चीन अपनी उपग्रह दिशासूचक प्रणाली तैयार कर रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि भारतीय सैन्य बलों को उपलब्ध यह सिग्नल भारतीय क्षेत्र में अमेरिकी जीपीएस की तुलना में कहीं अधिक सटीक होना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बात की संभावना कम ही है कि भारतीय विशेष बलों ने नाविक से दिशानिर्देशन लेने वाली हस्तचालित मशीनों की मदद से आतंकी शिविरों का पता लगाया क्योंकि इन उपकरणों को अभी सटीक बनाया जा रहा है। भारत के दुश्मनों को इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि जल्दी ही ये स्वदेशी जीपीएस सिग्नल देश के कमांडो को आतंकियों के सरगनाओं के हर ठिकाने तक ले जाएंगे। युद्ध की स्थिति में नाविक से मिलने वाले संकेत निश्चित तौर पर भारत को अपनी मिसाइलों का लक्ष्य निर्धारण करने में मदद करेंगे और दुश्मन को अभूतपूर्व नुकसान पहुंचाएंगे। इनके अलावा 2000 किलोग्राम का अन्य उपग्रह दिन-रात भारतीय क्षेत्र पर नजर रखते हुए देश के सैन्य बलों को अभूतपूर्व क्षमताओं से लैस करता है। यह उपग्रह जीसैट-6 कहलाता है और यह अदभुत उपग्रह मल्टी-मीडिया क्षमता से लैस है। यह दोनों दिशाओं में वीडियो स्ट्रीम कर सकता है। इसके पास सबसे बड़ा एंटीना है, जिसका व्यास छह मीटर है। 21वीं सदी के नेटवर्क केंद्रित युद्ध में यह उपग्रह अहम भूमिका निभाएगा। एक हस्तचलित उपकरण की मदद से सैनिक संपर्क कर सकते हैं और तस्वीरों को सीधे प्रेषित कर सकते हैं। जल्दी ही इसका दूसरा साथी जीसैट-6ए लाया जाएगा, जिसकी क्षमताएं कहीं अधिक होंगी।

नायर ने कहा, ‘सरकार और इसरो को जीसैट-6ए का विकास तेज करना चाहिए ताकि विशेष बलों के लिए जरूरी विशेष क्षमताएं हासिल की जा सकें।’ यदि आपको याद हो, तो वर्ष 2011 में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन पर किए गए लक्षित हमले का सीधा प्रसारण देखा था। भारत का जीसैट-6 और जीसैट-6ए सैद्धांतिक रूप से देश के सुदूर इलाकों से सिग्नलों के सीधे प्रसारण में मदद कर सकेंगे। भारत के एयरोस्पेस कमांड के सूत्रों ने यह पुष्टि की है कि भारत की ‘जुगाड़’ पद्धति का इस्तेमाल करने पर उनके पास सीधी जानकारी प्राप्त करने की सुविधा नहीं थी लेकिन इन उपग्रहों की मदद से ऐसा संभव हो सकेगा।

चूंकि भारत पश्चिमी और पूर्वी मोर्चे पर शत्रुता रखने वाले पड़ोसियों से घिरा है, इसलिए ज्यादातर संसाधनों का फोकस जमीन पर है लेकिन इसरो भारत को घेरे हुए समुद्रों को भूला नहीं है। वह जानता है कि इनकी सुरक्षा भी जरूरी है। भारतीय नौसेना की विशेष मांग पर भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने ‘रूकमिनी’ नामक उपग्रह तैनात किया है। यह संचार उपग्रह है, जो भारतीय नौसेना को उसके पोतों से सुरक्षित संंवाद करने में मदद करता है। आने वाले वर्षों में इसरो भारतीय वायुसेना के लिए भी एक उपग्रह लाएगा। प्रधानमंत्री मोदी अंतरिक्ष में दिलचस्पी रखते हैं और भारत के रॉकेट प्रक्षेपणों का निरीक्षण भी करते हैं। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत की अंतरिक्षीय संपत्ति को कैसे और कहां तैनात करना है, ताकि कोई भी भारत पर बुरी नजर न डाल पाए। हालांकि अंतरिक्षीय संरचनाओं की सुरक्षा के लिए जमीनी स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था का पुख्ता होना हमेशा जरूरी रहेगा।

’इसरो के उपग्रह 500 किलोमीटर की ऊंचाई से तस्वीर खींचते हैं, इसकी रेजोल्यूशन क्षमता 0.65 मीटर है 

’आज पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा में भारत के 33 उपग्रह हैं और एक उपग्रह मंगल की कक्षा में है। इनमें 12 संचार उपग्रह, सात दिशासूचक उपग्रह, 10 पृथ्वी पर्यवेक्षण उपग्रह और चार मौसम निरीक्षक उपग्रह हैं
’यह उपग्रह पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के बड़े बंगले में खड़ी कारों की संख्या तक को आसानी से गिन सकता है। यह पाक में कहीं भी खड़े किए गए टैंक, ट्रक और लड़ाकू विमान को गिन सकता है

– माना जा रहा है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में इसरो के उपग्रहों की जीपीएस प्रणाली अमेरिका जीपीएस सिस्टम से कहीं अधिक बेहतरीन है। इसरो भारतीय सेना को कहीं अधिक बेहतर जीपीएस तकनीक मुहैया करवा रहा है

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  1. Rameshwar Modi
    Oct 3, 2016 at 2:03 am
    बहुत अच्छा .हमेशा शफलता तुम्हारे कदम चूमे
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    Reply
    सबरंग