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‘इशरत पर पूरे हलफनामे को बदल दिया था चिदंबरम ने’

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि दूसरे हलफनामे में हर रिपोर्ट को नकार दिया गया और कहा गया इशरत को आतंकवादी साबित करने के लिए कोई महत्त्वपूर्ण साक्ष्य नहीं है।
Author नई दिल्ली | March 3, 2016 01:23 am
गुजरात में कथित फर्जी मुठभेड़ में 2004 में इशरत जहां मारी गई थी। (फाइल फोटो)

गुजरात में कथित फर्जी मुठभेड़ में 2004 में मारी गई इशरत जहां पर प्रथम हलफनामे को तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बदल दिया था, लेकिन तत्कालीन गृह सचिव जीके पिल्लई ने संपर्क नहीं किए जाने के चलते ऐसा कोई असंतोष दर्ज नहीं किया था। फाइल नोटिंग से यह खुलासा हुआ है कि खुफिया ब्यूरो के अलावा महाराष्ट्र और गुजरात पुलिस से जानकारी के आधार पर प्रथम हलफनामा दाखिल किया गया था जिसमें कहा गया था कि मुंबई के बाहरी इलाके की 19 वर्षीय यह लड़की लश्करे-तैयबा की आतंकी है। लेकिन इसे दूसरे हलफनामे में पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि दूसरे हलफनामे में हर रिपोर्ट को नकार दिया गया और कहा गया उसे आतंकवादी साबित करने के लिए कोई महत्त्वपूर्ण साक्ष्य नहीं है। समझा जाता है कि इस हलफनामे को चिदंबरम ने तैयार किया था। उन्होंने बताया कि तत्कालीन गृह मंत्री ने अपने किसी अधिकारी से बात किए बगैर समूचे हलफनामे को बदल दिया और इशरत को क्लीन चिट दे दी। सूत्रों ने बताया कि फाइल नोटिंग से उद्धरण देते हुए 23 सितंबर 2009 को पिल्लई ने मूल हलफनामा चिदंबरम को भेजा था।

चिदंबरम ने अगले दिन फाइल देखी और लिखा ‘संशोधित’ और यह निर्देश दिया कि इसे अदालत भेजे जाने से पहले उन्हें एक स्पष्ट प्रति दिखाई जानी चाहिए। पिल्लई ने 24 सितंबर 2009 को फाइल में लिखा कि एक स्पष्ट प्रति गृहमंत्री को दिखाई गई है। फाइल में यह लिखा गया कि हलफनामे की एक प्रति कानून सचिव और अटार्नी जनरल को सूचना के लिए भेजी जानी चाहिए। सूत्रों ने बताया कि चूंकि, अटार्नी जनरल दिल्ली में नहीं थे इसलिए वे दूसरे हलफनामे को नहीं देख सके। उन्होंने बताया कि कोई भी हलफनामा तथ्यों पर आधारित होना चाहिए , लेकिन चिदंबरम ने कथित तौर पर हलफनामे में अपनी राय दी।

सूत्रों ने बताया कि इसके अलावा पिल्लई ने फाइल में कोई असंतोष नोट नहीं लिखा। पिल्लई इस पूरी प्रक्रिया से करीबी तौर पर जुड़े हुए थे। लेकिन हलफनामा बदलने का फैसला उनकी मंजूरी के बगैर लिया गया। उन्होंने दावा किया कि अवर सचिव को दूसरे हलफनामे को अदालत में दाखिल करने से पहले इस पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया। गौरतलब है कि पिल्लई ने रविवार को दावा किया था कि यूपीए सरकार के दौरान गृहमंत्री के तौर पर चिदंबरम ने मूल हलफनामे के एक महीने बाद फाइल मंगाई थी। मूल हलफनामे में इशरत और उसके साथियों को लश्करे-तैयबा का सदस्य बताया गया था। यह हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किया गया था।

इस बीच चिदंबरम पर तीखा हमला बोलते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि इशरत जहां मामले में यूपीए सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किया गया दूसरा हलफनामा फर्जीवाड़ा का मामला है। जेटली ने इशरत जहां और लश्करे-तैयबा के उसके अन्य कथित साथियों के गुजरात में मुठभेड़ में मारे जाने को ‘सही’ बताते हुए पूछा कि क्या कांग्रेस को लगता है कि यह फर्जी थी ? अगर ऐसा है तो उसने आरोपपत्र दाखिल नहीं कर और वास्तविक मुठभेड़ में शामिल उन अधिकारियों को गवाह नहीं बनाकर उन्हें 90वें दिन जमानत क्यों हासिल करने दी।

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार के प्रथम हलफनामे में इशरत के आतंकी संपर्कों का जिक्र था जो अस्पष्ट नहीं था। यह बिल्कुल साफ था। दूसरे हलफनामे में फर्जीवाड़ा किया गया। यह पूछने पर कि क्या यूपीए सरकार ने खुफिया रूपरेखा से खिलवाड़ किया, मंत्री ने कहा, ‘बिल्कुल।’ चिदंबरम ने दूसरे हलफनामे को दाखिल किए जाने को सोमवार को उचित ठहराया था और मंत्री के रूप में इस फैसले की जिम्मेदारी ली थी।

चिदंबरम की टिप्पणी पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के उनके साथ खड़े होने के बयान पर जेटली ने कहा कि उनके द्वारा सामने लाए गए सिलसिलेवार तथ्य इस बारे में एक उपयुक्त मामला बनाते हैं कि किस तरह से मनगढ़ंत कहानी गढ़ी गई। उन्होंने कहा कि यह इस राजनीतिक पार्टी की परंपरा रही है। कुल मिलाकर क्या उन्होंने वीपी सिंह के खिलाफ फर्जी बैंक खाता नहीं बनाया था जब वे लोग उनमें भविष्य का प्रधानमंत्री बनने की संभावना देख रहे थे।

उधर संसदीय मामलों के मंत्री एम वेंकैया नायडू ने आरोप लगाया है कि इशरत जहां मुठभेड़ मामले में हलफनामा बदले का निर्णय ‘राजनीतिक स्तर’ पर लिया गया था जिसमें तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी शामिल थे। भाजपा ने कांग्रेस से इस बारे में स्पष्टीकरण भी मांगा है। नायडू ने आरोप लगाया कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने सीबीआइ का दुरुपयोग राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘बदनाम’ करने के लिए किया था जो अब प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संसद में बहस किए जाने और समुचित कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। नायडू ने कहा, पहले यह लश्करे-तैयबा की वेबसाइट पर था और फिर डेविड हेडली के बयान में भी यही बात थी। अब गुजरात उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के हलफनामे में यही बात है और गुजरात पुलिस भी यह कह रही है। आइबी ने यही कहा है। इसके बावजूद उन्होंने हलफनामा बदला।

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