December 08, 2016

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गांधीजी की “नाइंसाफी” की वजह से सरदार पटेल नहीं बन पाए भारत के पहले प्रधानमंत्री?

आजादी के 69 सालों बाद भी ये बहस नहीं थमी है कि अगर जवाहरलाल नेहरू के बजाय सरदार पटेल देश के प्रधानमंत्री बने होते तो क्या होता?

नेहरू (दाएं) के साथ सरदार पटेल (Photo: Express Archive)

सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 में हुआ था। भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारतीय रियासतों का विलय कराकर देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित किया जाने का  श्रेय दिया जाता है। लेकिन आजादी के 69 सालों बाद भी ये बहस नहीं थमी है कि अगर जवाहरलाल नेहरू के बजाय सरदार पटेल देश के प्रधानमंत्री बने होते तो क्या होता? इस सवाल का जवाब पाना संभव नहीं क्योंकि इतिहास में जो हो चुका है वो हो चुका है, जो नहीं हुआ है वो होता तो क्या होता इसका जवाब पाने का कोई तार्किक तरीका नहीं है। लेकिन पटेल के भारत के पहले पीएम बनने की अटकल हवाई नहीं बल्कि ठोस तथ्यों पर आधारित है। और ये मानने के ठोस आधार हैं कि अगर महात्मा गांधी ने नेहरू का अलोकतांत्रिक समर्थन न किया होता तो इतिहास कुछ और भी हो सकता था।

नेहरू की “रूमानी” छवि के उलट पटेल की छवि एक “व्यावहारिक” प्रशासक की थी। कांग्रेस पार्टी का व्यावहारिक कामकाज पटेल देखते थे। 1946 में ये साफ हो गया था कि भारत आजाद होने वाला है। और ये भी तय था कि 1946 में जो कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा वही देश का पहला प्रधानमंत्री होगा। 1946 के चुनाव में कांग्रेस को चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं। लेकिन मुस्लिम इलाकों में मुस्लिम लीग को भारी जीत मिली थी। मौलाना अबुल कलाम आजाद 1940 से ही कांग्रेस के अध्यक्ष थे। भारत छोड़ो आंदोलन और दूसरे विश्व युद्ध जैसे कारणों से पिछले कई सालों से कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव नहीं हुआ था। 1946 में जब अध्यक्ष पद का चुनाव होने की बात शुरू हुई तो कलाम ने भी फिर से अध्यक्ष बनने की इच्छा जाहिर की। लेकिन गांधीजी ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया।

वीडियो: पीएम नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल को दी श्रद्धांजलि-

ये सभी को मालूम था कि गांधीजी नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 29 अप्रैल 1946 थी। कांग्रेस अध्यक्ष का नामांकित कांग्रेस की 15 प्रादेशिक और क्षेत्रीय कमेटियों को करना था। नेहरू को गांधीजी का पूरा समर्थन है ये जानने के बाद भी किसी भी प्रादेशिक या क्षेत्रीय कमेटी ने नेहरू का नाम नामित नहीं किया। 15 में 12 कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम नामित किया था। तीन कमेटियों ने किसी का भी नाम नामित नहीं किया था।

महात्मा गांधी ने इसे अपने लिए चुनौती माना। गांधीजी ही पहले भी कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ऊपर अपनी मर्जी थोप चुके थे। 1939 में लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस की जीत को गांधीजी ने अपनी हार बताते हुए उन्हें इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया था। 1946 में भी यही हुआ। गांधीजी ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ऊपर अपनी मर्जी थोपी और पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनने दिया। पटेल गांधीजी के आज्ञाकारी अनुयायी थे। इसलिए उन्होंने गांधीजी के फैसले को बगैर किसी शिकवा-शिकायत के स्वीकार कर लिया। ऐसे में क्या ये अनुमान लगाना गलत होगा कि अगर गांधीजी एक “नाइंसाफी” न करते तो सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री हो सकते थे? बहरहाल, पटेल भले ही पहले प्रधानमंत्री न बन सके हों लेकिन 15  दिसंबर 1950 को दुनिया से अलविदा कहने से पहले भारतीय रियासतों का विलय कराकर वो इतिहास में सदा के लिए अमर हो गए।

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First Published on October 31, 2016 3:29 pm

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