December 09, 2016

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हाथ में प्लास्टर था, फिर भी मोर्चे पर चले गए थे मेजर सोमनाथ शर्मा- जानिए देश के पहले परमवीर चक्र विजता की वीरता की कहानी

मेजर सोमनाथ शर्मा महज 24 साल की उम्र में कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए 3 नवंबर 1947 को शहीद हो गए थे।

देश के पहले परम वीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा।

परम वीर चक्र भारत का सबसे बड़ा सैन्य पुरस्कार है। आजाद भारत के इतिहास में अभी तक केवल 22 लोगों को ये पुरस्कार मिला है। भारत का पहला परमवीर चक्र 1950 में दिया गया। पहला परम वीर चक्र मेजर सोमनाथ शर्मा (21 जनवरी 1923- 3 नवंबर 1947) को मरणोपरांत प्रदान किया गया था। मेजर शर्मा महज 24 साल की उम्र में देश के लिए कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए 3 नवंबर 1947 को शहीद हो गए थे। आजादी के ठीक बाद पाकिस्तानी सैनिकों के निर्देशन में कबायली लश्करों ने कश्मीर में घुसपैठ कर दी थी। हमलावर मोर्टार, लाइट मशीनगन और अन्य आधुनिक हथियारों से लैस थे। मेजर शर्मा बडगाम में एक पोस्ट पर तैनात थे। शहीद होने से पहले मेजर शर्मा ने ब्रिगेड मुख्यालय को भेजे आखिरी संदेश में उन्होंने कहा था, “दुश्मन हमसे केवल 50 गज दूर है। दुश्मन की संख्या हमसे बहुत ज्यादा है। हमारे ऊपर तेज हमला हो रहा है। लेकिन जब तक हमारा एक भी सैनिक जिंदा है और हमारी बंदूक में एक भी गोली है हम एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।”

वीडियो: चीनी सैनिकों ने रुकवाया नहर का काम-

जब कश्मीर पर पाकिस्तानियों ने हमला किया तो 4 कुमाऊं बटालियन के मेजर सोमनाथ शर्मा के दाहिने हाथ एक हॉकी मैच में फ्रैक्चर हो गया था जिसके कारण उस पर प्लास्टर लगा था। डॉक्टर ने उन्हें आराम करने के लिए कहा था लेकिन वो जिद करके मोर्चे पर गए। मेजर शर्मा और उनके साथ श्रीनगर एयरफील्ड से कुछ किलोमीटर दूर बडगाम में एक पोस्ट पर तैनात थे। हमले के दिन से पहले सेना की तीन कंपनियों ने बडगाम की पैट्रोलिंग की थी। जब वहां दुश्मन की कोई गतिविधि का सूत्र नहीं मिला तो तीनों कंपनियों को वापस भेज दिया गया था। केवल मेजर शर्मा की कंपनी को वहां दोपहर  3 बजे तक रुकने के लिए कहा गया। उन्हें औचक हमला होने की स्थिति में हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकना था। मेजर शर्मा की कंपनी में कुल 50 जवान थे। हमलावरों की संख्या भारतीय सेना के अनुमान से बहुत ज्यादा थी। दोपहर के करीब 2.30 बजे 500 से ज्यादा पाकिस्तानी हमलावरों ने बडगाम पोस्ट के तीन तरफ से हमला किया। हमलावरों की भारी संख्या देखकर उन्होंने अपने ऊपर के अधिकारियों को मदद भेजने का संदेश दे दिया। लेकिन मदद आने तक दुश्मनों को रोकना जरूरी था क्योंकि अगर उन्हें रोका न जाता तो हमलावर श्रीनगर एयरफील्ड पर कब्जा कर सकते थे जो शेष भारत से कश्मीर घाटी के हवाई संपर्क का एक मात्र जरिया था।

मेजर शर्मा दुश्मन की गोलियों की बौछार के बीच खुले मैदान में आकर सैनिकों के अलग-अलग पोस्ट पर जाकर सटीक गोलीबारी के लिए निर्देश देते रहे। उन्होंने हवाई हमले के लिए दुश्मन की शिनाख्त करने के लिए गोलियों की बौछार के बीच कपड़े की पट्टी बिछाई। वो आखिर अपने बाएं हाथ से सैनिकों की बंदूकों में मैगजीन लगाते रहे। मेजर शर्मा आगे बढ़कर अपने साथियों का नेतृत्व करते रहे है। उनके पास पड़े हुए गोला-बारूद में एक मोर्टार का गोला आकर गिरा और धमाके के चपेट में मेजर शर्मा भी आ गए। उनकी शहादत से प्रेरित उनके साथी दुश्मनों का मुंहतोड़ जवाब देते रहे थे।

मेजर शर्मा और उनके साथियों ने हमलावरों को छह घंटे तक आगे नहीं बढ़ने दिया जिसकी वजह से भारतीय सेना को मदद भेजने के लिए पर्याप्त मौका मिल सका। जब तक भारतीय सेना की मदद वहां पहुंचती तब तक मेजर शर्मा के अलावा एक जूनियर कमिशंड ऑफिसर और 20 अन्य जवान शहीद हो चुके थे। भारतीय सैनिकों ने 200 से अधिक हमलावरों को मार गिराया था। मेजर शर्मी की कंपनी की बहादुर की कारण हमलावरों की ताकत कुंद हो गई थी और वो ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके। मेजर शर्मा का शव विस्फोट में बुरी तर क्षत-विक्षत हो चुका था। उनके शव की पहचान उनके जेब में मिले भगवद् गीता के पन्नों से हुई थी। वो अपनी जेब में हमेशा भगवद् गीता की एक प्रति रखते थे। गीता के अलावा उनके पिस्टल की खोल से भी उनकी पहचान की गई। मेजर शर्मा की बहादुरी का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के पहले परम वीर चक्र से सम्मानित करने का फैसला किया।

देखें मेजर सोमनाथ शर्मा के जीवन पर आधारित चेतन आनंद के सीरियल परम वीर चक्र का एपीसोड-

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First Published on November 4, 2016 1:41 pm

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