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दिल्ली चुनाव में बिजली और पानी का मुद्दा भाजपा को पड़ सकता है भारी

नरेंद्र भंडारी दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनावों में अगर बिजली और पानी चुनावी मुद्दा बना तो वह भाजपा को भारी पड़ सकता है। दिल्ली की चुनावी गणित में आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी। राजधानी में अभी विधानसभा चुनावों की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस […]
Author December 8, 2014 11:48 am
राजस्थान में भाजपा सरकार और संगठन की बिगड़ती छवि से पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व खासा चिंतित

नरेंद्र भंडारी

दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनावों में अगर बिजली और पानी चुनावी मुद्दा बना तो वह भाजपा को भारी पड़ सकता है। दिल्ली की चुनावी गणित में आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को भुनाने की पूरी कोशिश करेगी। राजधानी में अभी विधानसभा चुनावों की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में बैनर युद्ध छेड़ दिया है। धीरे-धीरे यह मुद्दा गहरा सकता है।

दिल्ली में पिछले विधानसभा चुनावों में भी बिजली और पानी ही आप और भाजपा का मुख्य चुनावी मुद्दा था। चुनावों से काफी पहले ही इन दोनों दलों ने इस मुद्दे को काफी गरम कर दिया था। उस समय के भाजपा नेता विजय गोयल ने तो इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में जगह-जगह रैलियों के साथ प्रदर्शन और धरने देकर इसे मुख्य चुनावी मुद्दा बना दिया था। उधर दिल्ली की राजनीति में आप पार्टी का उदय हुआ और उसने भी बिजली और पानी के मुद्दे को काफी हवा दी। आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने तो लोगों को बिजली के बढ़े हुए बिलों की अदायगी रोक देने की अपील की थी। जब बिजली वालों ने बिल अदा नहीं करने वाले उपभोक्ताओं के कनेक्शन काट दिए तो आप के नेता केजरीवाल ने उन उपभोक्ताओं के घरों में जाकर स्वयं उनके कटे हुए कनेक्शन जोड़े।

वर्ष 2013 के चुनावी दौर में भाजपा भी समझ गई कि उसे इस मुद्दे को ज्यादा हवा देनी पड़ेगी। भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान दिल्लीवासियों को चुनाव जीतने के बाद उनके बिलों में 30 फीसद छूट देने की घोषणा कर दी। उधर, इस मामले में आप पार्टी भी पीछे रहने वाली नहीं थी। आप पार्टी ने लोगों को उनके बिलों में 50 फीसद की छूट और मुफ्त पानी देने की दो बड़ी धोषणाएं कर दीं। दिल्लीवासी इन दोनों मामलों को लेकर उस समय की शीला दीक्षित सरकार से काफी क्षुब्ध में थे। वर्ष 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आए तो कांग्रेस को भारी झटका लगा और उसके दिल्ली में सिर्फ 8 उम्मीदवार ही जीत पाए।

उधर आप के 28 उम्मीदवार जीते। ऐसे में भाजपा 32 सीटें हासिल करने के बाद भी वह दिल्ली की गद्दी नहीं पा सकी। दिल्ली में आप ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई और आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री का पद संभालते ही केजरीवाल समझ गए थे कि उनकी सरकार ज्यादा समय तक चलने वाली नहीं है। उन्होंने दिल्ली की गद्दी संभालते ही बिजली और पानी को लेकर ऐतिहासिक फैसले लेने शुरू कर दिए। उन्होंने तत्काल दिल्ली में बिजली के बिलों में 50 फीसद छूट की घोषणा क र दी। उसके बाद आप पार्टी ने दिल्लीवासियों को एक तय सीमा तक मुफ्त पानी की सुविधा देने की भी घोषणा कर दी। केजरीवाल दिल्लीवासियों की दुखती रग को समझते थे। उन्होंने दिल्ली में बिजली वितरण करने वाली उन बिजली कंपनियों को रोजाना किसी न किसी मुद्दे पर धमकाना शुरू कर दिया, जिनके खिलाफ दिल्ली की कांग्रेस सरकार कोई बड़ा कदम नहीं उठा पाई थी।

दिल्ली में वर्ष 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केजरीवाल ने बिजली कंपनियों का आॅडिट करवाने और तेज भागते मीटरों की जांच करवाने की भी दो बड़ी घोषणाएं कर दीं। अभी ये मामले आगे बढ़ते कि केजरीवाल की सरकार ने 49 दिनों में जनलोकपाल बिल पास नहीं होने पर सत्ता छोड़ दी और दिल्ली में उपराज्यपाल का शासन लग गया। बाद में आम चुनाव हुए तो वहां भी क ांग्रेस की शिकस्त हुई और भाजपा के नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा के पास बिजली और पानी के मुद्दे को अपने पाले में करने का एक स्वर्ण मौका था। दिल्लीवासियों को भी लग रहा था कि भाजपा सत्ता में आते ही इन दोंनों मुद्दों पर कोई अहम फैसले लेगी। लेकिन अभी तक भाजपा इन दोंनों मुद्दों पर कोई बड़ा कदम नहीं उठा पाई है। उधर आप पार्टी ने एकबार फिर से इन दोनों मुद्दों को गरम करना शुरू कर दिया है। फिलहाल केंद्र में भाजपा की सरकार है। अगर दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने इन दोनों मुद्दों को लेकर कोई अहम फैसले नहीं लिए तो एक बार फिर से उसके दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने में कठिनाइयां सामने आ कर रहेंगी।

 

 

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