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हाशिमपुरा जनसंहार: 27 साल बाद आए फैसले में सभी आरोपी पुलिसकर्मी बरी

दिल्ली में तीस हजारी की एक अदालत ने 1987 के हाशिमपुरा जनसंहार के सभी 16 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। उत्तर प्रदेश के मेरठ में स्थित हाशिमपुरा में हुए जनसंहार में 42 लोग मारे गए थे। इस मामले में पीएसी के 16 जवान आरोपी थे। अदालत ने कहा कि सबूतों, खास […]
Author March 22, 2015 08:04 am
Hashimpura Massacre: इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद के समक्ष 1996 में आरोपपत्र दायर किया गया था। इसमें 19 लोगों को आरोपी के तौर पर नामजद किया गया था। (एक्सप्रेस फ़ोटो प्रवीण खन्ना)

दिल्ली में तीस हजारी की एक अदालत ने 1987 के हाशिमपुरा जनसंहार के सभी 16 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। उत्तर प्रदेश के मेरठ में स्थित हाशिमपुरा में हुए जनसंहार में 42 लोग मारे गए थे। इस मामले में पीएसी के 16 जवान आरोपी थे। अदालत ने कहा कि सबूतों, खास तौर पर आरोपियों की पहचान से जुड़े सबूतों का अभाव था। साथ ही अदालत ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए मामला दिल्ली राज्य विधि सेवा अधिकरण के हवाले कर दिया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने कहा कि सभी आरोपी बरी किए जाते हैं। अदालत सबूतों और खासतौर पर पहचान के अभाव में संदेह का लाभ देती है। अदालत ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को मामले को भेजा है, जिनकी सही तौर पर पहचान हो गई है। अदालत ने कहा कि सभी 16 आरोपी जिन्हें बरी किया गया है वे घटना के वक्त प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी कर्मी थे। बरी किए गए लोगों में सुरेश चंद शर्मा, निरंजन लाल, कमल सिंह, बुद्धि सिंह, बसंत बल्लभ, कुंवर पाल सिंह, बुद्धा सिंह, रामबीर सिंह, लीलाधर, हमबीर सिंह, मोकाम सिंह, शमीउल्ला, श्रवण कुमार, जयपाल सिंह, महेश प्रसाद और राम ध्यान शामिल हैं। महेश प्रसाद और कुंवर पाल सिंह के अलावा सभी आरोपी अदालत में मौजूद थे और जमानत पर रिहा हैं।

अदालत ने अभियोजन, आरोपी और पीड़ितों के वकील से कुछ स्पष्टीकरण मांगने के बाद पिछली 21 फरवरी को शनिवार के लिए फैसला सुनाने की तारीख तय की थी। अदालत ने इससे पहले 22 जनवरी को अंतिम दलीलों को सुनने के बाद अपना सुरक्षित रख लिया था। विशेष लोक अभियोजक सतीश टम्टा ने कहा कि प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी कर्मी 22 मई को 1987 में आए थे और वहां एक मस्जिद के बाहर एकत्र 500 में से तकरीबन 50 मुसलमानों को उठाकर ले गए। अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़ितों को आरोपियों ने गोली मार दी और उनके शव एक नहर में फेंक दिए। जनसंहार में 42 लोगों को मृत घोषित किया गया। इस घटना में पांच लोग जिंदा बच गए, जिन्हें अभियोजन ने गवाह बनाया। ये पांच गवाह आरोपियों को पहचान नहीं पाए।

इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद के समक्ष 1996 में आरोपपत्र दायर किया गया था। इसमें 19 लोगों को आरोपी के तौर पर नामजद किया गया था और उनमें से 16 के खिलाफ 2006 में यहां की अदालत ने हत्या, हत्या का प्रयास, सबूतों के साथ छेड़छाड़ और साजिश के आरोप तय किए थे, जब सितंबर 2002 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामला दिल्ली स्थानांतरित किया गया। जिन 16 आरोपियों को शनिवार को बरी किया गया वे अभी जीवित हैं। मामले की जांच करने वाली उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआइडी ने 161 लोगों को गवाह के तौर पर सूचीबद्ध किया था। मामले में आरोपपत्र 1996 में गाजियाबाद के चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की गई थी, लेकिन सितंबर, 2002 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस मामले को दिल्ली हस्तांतरित किया गया। साल 2006 में आरोपियों के खिलाफ हत्या, हत्या की कोशिश, सबूतों से छेड़छाड़ और साजिश रचने के आरोप तय किए गए थे।

इससे पहले 21 फरवरी को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने मामले में अपना फैसला सुनाने से पहले अभियोजन, आरोपी व पीड़ितों से कुछ स्पष्टीकरण मांगा था। मामले में उत्तर प्रदेश की सीबीसीआइडी ने 161 लोगों को गवाह बनाया था।

27 साल पुराना मामला:

हाशिमपुरा कस्बे में हुए जनसंहार में 42 मुसलमान मारे गए थे। प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबलरी (पीएसी) के 16 जवानों पर हत्या का आरोप लगाया गया था। 1987 में मेरठ में हुए दंगे के बाद पीएसी के जवान हाशिमपुरा मुहल्ले के 50 मुसलमानों को कथित तौर पर अपने साथ ले गए थे। मामले में अभियोग पत्र गाजियाबाद के चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने 1996 में पेश किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मारे गए लोगों को परिजनों की अर्जी पर 2002 में यह मामला दिल्ली भेज दिया था। सुनवाई के दौरान 19 में से तीन आरोपियों की मौत हो गई।

आरोपियों की पहचान में नाकाम:

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने पीएसी के जवानों को बरी करते हुए दलील दी कि अभियोजन पक्ष संदिग्ध पुलिसकर्मियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा। अदालत ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को मामले को भेजा है, जिनकी सही तौर पर पहचान हो गई है। अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़ितों को आरोपियों ने गोली मार दी और उनके शव एक नहर में फेंक दिए। जनसंहार में 42 को मृत घोषित किया गया। इस घटना में पांच लोग जिंदा बच गए, जिन्हें अभियोजन ने गवाह बनाया। ये पांच गवाह आरोपियों को पहचान नहीं पाए।

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