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मोदी का कद बढ़ा, विपक्ष बन गया बौना, बजट सत्र में वही हुआ जो सरकार ने चाहा

पहले से ही बंटा विपक्ष इन नतीजों के बाद तो बेजान हो गया और इसी का एक परिणाम यह हुआ कि संसद का कामकाज पूरी तरह से सत्ता पक्ष के नियंत्रण में आ गया।
Author नई दिल्ली | April 13, 2017 04:10 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कार्यक्रम के दौरान। PTI Photo by Subhav Shukla

मनोज मिश्र

भाजपा संसदीय दल की बैठक में संसद में कोरम का सवाल आने पर मोदी की टिप्पणी का इतना असर हुआ कि सांसद कुछ घंटे के लिए गैर हाजिर होने के लिए इजाजत लेते थे। इसी का परिणाम हुआ कि तय समय से ज्यादा संसद में बहस चली। प्रधानमंत्री बुधवार को लोकसभा और गुरुवार को राज्यसभा में रहते हैं लेकिन उत्साह में कई बार वे बाकी दिन भी संसद में बैठे दिख जाते थे। अलबत्ता बजट सत्र के दूसरे भाग में उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया, न ही संसद में कोई बखेड़ा हुआ।

बजट सत्र के बीच में आए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणामों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष को पस्त कर दिया। पहले से ही बंटा विपक्ष इन नतीजों के बाद तो बेजान हो गया और इसी का एक परिणाम यह हुआ कि संसद का कामकाज पूरी तरह से सत्ता पक्ष के नियंत्रण में आ गया। लोकसभा में भाजपा बहुमत में है ही, उसने जैसा चाहा, सदन को चलाया। इतना ही नहीं राज्यसभा में भी बहुमत न होते हुए अनेक बिल पास करवाए। शायद जगहंसाई के डर से आखिर में कांग्रेस ने अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) संशोधन विधेयक और माटर यान (संशोधन) विधेयक को पास नहीं होने दिया। इसे भाजपा ने मुद्दा बना लिया।इस बार संसद में कुछ नई परंपराएं डाली गईं। पहली बार रेल बजट को आम बजट में ही पेश किया गया। इसकी विपक्ष ने आलोचना की लेकिन सरकार ने अपना इरादा नहीं बदला। दूसरे पहली बार बजट सत्र 31 जनवरी को ही शुरू हुआ और एक फरवरी को बजट पेश किया गया। सरकार का तर्क था कि 31 मार्च तक बजट पास होने से नए बजट से पैसे खर्च किए जाएंगे न कि किसी और तरीके से(लेखनुदान) पैसों का आबंटन कराना पड़ेगा। 31 जनवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद एक फरवरी को बजट पेश हुआ। री बजट सत्र का पहला हिस्सा पूरा किया गया। 9 मार्च से बजट सत्र की दूसरा हिस्सा शुरू हुआ जो बुधवार को समाप्त हुआ। दूसरा भाग शुरू होने के तीन दिन बाद पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए। बजट सत्र के पहले भाग में बजट पेश करने न करने पर बहस के बाद नेता चुनाव में व्यस्त हो गए और दूसरे भाग में विधानसभाओं के नतीजों ने विपक्ष को पूरी तरह पस्त कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक कद पहले से बड़ा हो गया। पूरा ही माहौल मोदी के पक्ष में बन गया। चुनाव नतीजों के बाद जब मोदी संसद में आए तो भाजपा के सदस्यों ने कौन आया, कौन आया-गुजरात का शेर आया कहकर उनका स्वागत किया। पहले भाजपा में किसी नेता की हिम्मत उनके खिलाफ बोलने की नहीं थी फिर तो विपक्ष पूरी तरह से धराशायी हो गया।

वैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संसद में नहीं बोलती हैं। बीमार होने के बाद तो उनका संसद में आना कम हो गया था लेकिन वे जब भी लोकसभा आती थीं पूरे समय बैठती और अपने सदस्यों को बोलने के लिए उत्साहित करती रहती। कांग्रेस उपाध्यक्ष तो शीतकालीन सत्र में सक्रिय दिख रहे थे लेकिन बजट सत्र में या तो गैरहाजिर रहे या संसद में आए तो केवल अपने लोगों से मिल कर चले गए। जिस तरह से नोटबंदी के समय विपक्षी एकता का प्रयास हुआ था, वैसा कोई प्रयास बजट सत्र में होता नहीं दिखा।
पूरे सत्र में वही हुआ जो सरकार ने चाहा। विधान सभा चुनाव परिणामों ने नरेंद्र मोदी को ज्यादा शक्तिशाली बना दिया। पार्टी की संसदीय दल की बैठक में ही नहीं राजद की बैठक में भी हर तरफ से मोदी-मोदी होता रहा।

 

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