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अमीरों को कबूल नहीं एक से ज्यादा बेटियां

बच्चे के पैदा होने से पहले लड़का चाहने की इच्छा के तहत कराए जाने वाले जन्मपूर्व लिंग परीक्षण को विशेषज्ञ गरीबी से संबंधित नहीं मानते क्योंकि पिछले दशकों की आर्थिक तरक्की निश्चित तौर पर ज्यादा लैंगिक समानता के रूप में देखने को नहीं मिली है।
Author July 9, 2015 11:37 am
गरीबी नहीं भ्रूण हत्या की वजह

बच्चे के पैदा होने से पहले लड़का चाहने की इच्छा के तहत कराए जाने वाले जन्मपूर्व लिंग परीक्षण को विशेषज्ञ गरीबी से संबंधित नहीं मानते क्योंकि पिछले दशकों की आर्थिक तरक्की निश्चित तौर पर ज्यादा लैंगिक समानता के रूप में देखने को नहीं मिली है।

‘जन्मपूर्व लिंग निर्धारण पर नीति वार्ता’ के मुद्दे पर यहां आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञों ने लैंगिक भेदभाव के पीछे की वजहों और इनसे निपटने के संभावित हलों पर चर्चा की। महिला विकास अध्ययन केंद्र (सीडब्लूडीएस) की मैरी ई जॉन ने कहा, ‘हमारा समाज पितृसत्तात्मक है, जहां माता-पिता विभिन्न कारणों से बेटियों के बजाय बेटों को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन हमें यह समझने की जरूरत है कि यह मध्यकाल में ही नहीं बल्कि 21वीं सदी में हो रहा है’।

उन्होंने कहा, इसके पीछे की वजह अब गरीबी नहीं रही है, जहां माता-पिता बुढ़ापे के सहारे के रूप में या दहेज से बचने या आर्थिक पहलुओं को देखते हुए बेटों को प्राथमिकता देते थे। लेकिन अब ऐसा उन क्षेत्रों में कहीं ज्यादा हो रहा है, जो उच्च शिक्षा स्तर और तुलनात्मक तौर पर ज्यादा समृद्धि रखते हैं। इसलिए यह चलन अब गरीबी से जुड़ा हुआ नहीं रह गया’।

लिंग निर्धारण के नाम पर हर साल गर्भपात के कारण छह लाख से ज्यादा लड़कियों की मौत की बात कहते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव राकेश कुमार ने कहा, किसी परिवार के बेटी का जन्म बर्दाश्त किए जाने या न किए जाने पर अन्य कारकों की तुलना में ज्यादा प्रभाव इस बात का पड़ता है कि परिवार में पहले जन्मा बच्चा लड़का है या लड़की? यह एक स्थापित तथ्य है कि अगर पहला बच्चा लड़की है तो अगली गर्भावस्था में लिंग निर्धारण की संभावना बढ़ जाती है’।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि जन्मपूर्व लिंग परीक्षण की तकनीक की उपलब्धता और संवहनीयता के कारण और इस मांग को अवैध रूप से पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में निजी चिकित्सालयों के तैयार होने के कारण इस चलन को बल मिला है। यूएनएफपीए की भारत में प्रतिनिधि फेड्रिका मीजर ने इस समस्या से निपटने के लिए मेडिकल स्कूलों के पाठ्यक्रम को मजबूत करने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा, ‘हमें हमारे भविष्य के डॉक्टरों को विभिन्न लैंगिक सिद्धांतों के बारे में प्रशिक्षित करने की जरूरत है। मेरा मानना है कि लैंगिक भेदभाव और लैंगिक हिंसा जैसे मुद्दों से निपटने के लिए एमबीबीएस पाठ्यक्रम को मजबूत करने से उन लोगों में जागरूकता पैदा होगी’।

लिंग निर्धारण के चलन और इस समस्या से निपटने के तरीकों पर अंतरराष्ट्रीय जानकारी के आदान-प्रदान के लिए सामाजिक अनुसंधान केंद्र के आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन की शुरुआत बुधवार को यहां हुई। इस सम्मेलन में दक्षिणी कोरिया, वियतनाम, जर्मनी और अमेरिका के विशेषज्ञ शामिल होंगे और इस मुद्दे पर अहम जानकारी साझा करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए नीतिगत सिफारिशें करेंगे।

 

गरीबी नहीं भ्रूण हत्या की वजह

‘भ्रूण हत्या के पीछे की वजह अब गरीबी नहीं रही है, जहां माता-पिता बुढ़ापे के सहारे के रूप में या दहेज से बचने या आर्थिक पहलुओं को देखते हुए बेटों को प्राथमिकता देते थे। लेकिन अब ऐसा उन क्षेत्रों में कहीं ज्यादा हो रहा है, जो उच्च शिक्षा स्तर और तुलनात्मक तौर पर ज्यादा समृद्धि रखते हैं। इसलिए यह चलन अब गरीबी से जुड़ा हुआ नहीं रह गया।’
मैरी ई जॉन, महिला विकास अध्ययन केंद्र

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