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#GandhiJayanti: नेताजी ने रेडियो रंगून से बापू को कहा था ‘राष्ट्रपिता’

आजादी से पहले 6 जुलाई 1944 को रेडियो रंगून से महात्मा गांधी को एक नया संबोधन दिया गया 'राष्ट्रपिता'। गांधीजी के लिए राष्ट्र के इस सर्वोच्च सम्मानजनक शब्द का प्रयोग करने वाले थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस। सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रीय पिता महात्मा गांधी का नाम इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर है।
Author नई दिल्ली | October 2, 2015 16:33 pm
नेताजी ने रेडियो रंगून से 1944 में पहली बार बापू को कहा था ‘राष्ट्रपिता’

आजादी से पहले 6 जुलाई 1944 को रेडियो रंगून से महात्मा गांधी को एक नया संबोधन दिया गया ‘राष्ट्रपिता’। गांधीजी के लिए राष्ट्र के इस सर्वोच्च सम्मानजनक शब्द का प्रयोग करने वाले थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस। सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रीय पिता महात्मा गांधी का नाम इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर है।

उन्होंने देश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज उनका नाम याद करते हुए गर्व का अनुभव होता है। महात्मा गांधी को राष्ट्र पिता के नाम से नवाजा गया है। भले ही महात्मा आज हमारे बीच न हों, लेकिन वह सभी के जहन में बसे हैं। उनके विचार और आदर्श आज हम सबके बीच हैं।

महात्मा गांधी पर कितनी ही किताबें लिखी गई हैं। भारतीय सिनेमा ने भी गांधी के सिद्धांतों को साझा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश के बच्चों से लेकर बड़ों तक की जुबां पर उनका नाम अमर है। हम जब भी आजादी की बात करते हैं तो उनका जिक्र होना लाजमी है।


महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1859 को गुजरात के पोरबंदर शहर में हुआ। उनके पिता का नाम करमचंद और माता का नाम पुतलीबाई था। बापू अपने परिवार में सबसे छोटे थे। उन्होंने अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश को आजादी दिलाई, साथ ही संदेश दिया कि अहिंसा सर्वोपरि है। महात्मा गांधी को सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रेडियो रंगून से ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया था।

महात्मा गांधी ने देश को आजादी दिलाने के लिए कई उल्लेखनीय कार्य किए। लेकिन उन्होंने सभी परिस्थितियों में अहिंसा और सत्य का पालन किया और सभी से इसका पालन करने की वकालत भी की। उन्होंने साबरमती आश्रम में अपना जीवन गुजारा और परंपरागत भारतीय पोशाक धोती व सूती चादर लपेटे वह खुद चरखे पर सूत काता करते थे।

वह जीवन भर शाकाहारी रहे और आत्मशुद्धि के लिए लंबे-लंबे उपवास रखे। 30 जनवरी 1948 की शाम को नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन जाते समय मोहनदास करमचंद गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें गोली मारने वाला नाथूराम गोडसे वहीं झाड़ियों में छिपा था। गांधी के समीप आते ही वह झाड़ी से निकला, उन्हें प्रणाम किया और दनादन गोलियां दाग कर राष्ट्रपिता के सीने को छलनी कर दिया। महात्मा गांधी की समाधि दिल्ली के राजघाट पर बनी हुई है, जहां अखंड ज्योति हमेशा जलती रहती है।

गांधी को कई गीत भी समर्पित किए गए हैं जो उन्हें भावपूर्ण पुष्पांजलि देते हैं, इसमें प्रमुख है संत कवि नरसी मेहता का लिखा भजन- ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये जे, पीर परायी जाणे रे।’ बापू को सच्ची पुष्पांजलि यही होगी कि हम उनके बताई राह पर चलें। दीवारों पर गांधी की तस्वीरें लगाकर उन्हें कितना सम्मान दिया जाता है, यह सबको पता है! ऐसा करना महज दिखावा बन गया है। आज सत्य और अहिंसा पर अमल करने की जरूरत भारत ही नहीं, समूचे विश्व को है।

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  1. K
    kapil patel
    Oct 2, 2015 at 9:27 am
    1869
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग