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निवेश की खातिर

विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक सुधारों को लेकर जो बातें कहीं, वे लगभग वही हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ के आह्वान के वक्त कही थीं। मोदी सरकार का जोर देश में सहज कारोबारी माहौल बनाने, अधिक से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने और विनिर्माण […]
Author November 7, 2014 15:21 pm

विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आर्थिक सुधारों को लेकर जो बातें कहीं, वे लगभग वही हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ के आह्वान के वक्त कही थीं। मोदी सरकार का जोर देश में सहज कारोबारी माहौल बनाने, अधिक से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने और विनिर्माण को बढ़ावा देने पर है। इसी को ध्यान में रख कर श्रम और भूमि अधिग्रहण कानूनों को लचीला बनाने का फैसला किया गया। स्वाभाविक ही उद्योग जगत ने इन कदमों का स्वागत किया। अब वित्तमंत्री ने संकेत दिया है कि घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों को भी निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया जा सकता है। पहले ही बीमा, रक्षा और रेलवे के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई जा चुकी है। सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री का इरादा भी नया नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय विनिवेश जुटाने के मकसद से एक अलग मंत्रालय ही बना दिया गया था। उस समय कई सार्वजनिक उपक्रमों को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया गया था। तब इस पर राजग सरकार की काफी किरकिरी हुई थी। मगर उसने अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर प्रसारित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पर हकीकत यह है कि उससे सामान्य नागरिकों के जीवन में कोई बेहतरी दर्ज नहीं हुई। सार्वजनिक उपक्रमों की दशा खराब होते जाने के पीछे उनके प्रबंधन को प्रतिस्पर्धी स्तर पर न ले आ पाना रहा है। अगर इस दिशा में सुधार का प्रयास हो तो कई सार्वजनिक उपक्रम निजी कंपनियों को चुनौती पेश कर सकते हैं।

मगर काफी समय से विश्व आर्थिक संस्थाओं का दबाव बना हुआ है कि श्रम कानूनों और भूमि अधिग्रहण आदि से जुड़े नियम-कायदों में कठोरता के कारण विदेशी कंपनियां भारत में कारोबार करने से हिचकती हैं। यह सलाह भी दी जाती रही है कि निजी क्षेत्र के लिए अधिक जगह मिलने से प्रतिस्पर्धी माहौल बनेगा और उत्पादन में गति आएगी, बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। यह दबाव यूपीए सरकार पर भी बना रहा। मगर जब विकास दर बढ़ाने की चिंता से सरकारें निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास करती हैं तो उसका लाभ ज्यादातर बड़ी कंपनियों को मिलता है। इसके चलते छोटे और मंझोले उद्योग लगातार खराब स्थिति में पहुंचते गए हैं। जबकि हकीकत यह है कि इन उद्योगों में सबसे अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर हैं। अगर इन्हें प्रोत्साहित करने की नीति बने तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की चिंता इतनी नहीं करनी पड़ेगी। यह भी छिपी बात नहीं है कि बड़ी कंपनियों के हितों की रक्षा करने के मकसद से श्रम कानूनों और भूमि अधिग्रहण संबंधी नियमों में ढील दिए जाने से श्रमिक समुदाय के हित बाधित होते हैं, उनमें असंतोष उभरता है। इसके चलते संगठित क्षेत्र की अपेक्षा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की तादाद लगातार बढ़ती गई है। समझना मुश्किल है कि सरकार को नागरिकों के रोजी-रोजगार से जुड़े हितों की रक्षा से ज्यादा बड़ी कंपनियों की चिंता क्यों है। यह देखना मुश्किल नहीं है कि बिजली, तेल, गैस आदि के उत्पादन में लगी निजी कंपनियों की तुलना में सार्वजनिक उपक्रमों का योगदान सराहनीय है। अगर उन्हें निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया जाता है, जैसा कि वाजपेयी सरकार के समय पहल हुई थी, तो इससे उत्पादन भले कुछ बढ़ा हुआ दर्ज हो, कीमतों पर काबू पाना कठिन ही बना रहेगा। विनिवेश जुटाने का अर्थ अतार्किक और अव्यावहारिक रूप से एक खास वर्ग के हितों का ध्यान रख कर फैसले करना नहीं हो सकता।

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