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खुफिया विभाग में शिकायतें और सवालों में रेलवे प्रशासन

उत्तर रेलवे की एक अधिकारी फर्जी तरीके से एक साथ भारतीय और अमेरिकी पासपोर्ट बनवाकर न केवल सरकारी विभाग को चूना लगा रही है। बल्कि बिना बताए देश से बाहर जाकर देश के सुरक्षा के लिए भी खतरा बनी हुई है।
Author October 14, 2016 03:44 am
पासपोर्ट।

उत्तर रेलवे की एक अधिकारी फर्जी तरीके से एक साथ भारतीय और अमेरिकी पासपोर्ट बनवाकर न केवल सरकारी विभाग को चूना लगा रही है बल्कि बिना बताए देश से बाहर जाकर देश के सुरक्षा के लिए भी खतरा बनी हुई है। ताजुब्ब है कि रेलवे के सभी आला अफसरों के अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय, रेल मंत्रालय, विदेश मंत्रालय समेत रॉ, सीबीआइ, एनआइए और दिल्ली पुलिस को बार-बार जानकारी देने के बावजूद किसी ने ठोस कारवाई नहीं की।
उत्तर रेलवे के सांख्यिकी विभाग ने बिना छुट्टी लिए देश से बाहर रहने पर तो उन्हें तलब किया लेकिन 31 अगस्त को उनको निलंबन पत्र में इन कारणों का ब्योरा नहीं दिया गया है।

इतना ही नहीं विभाग के कोई अधिकारी इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। अधिकारी लोग जन संपर्क अधिकारी पर मामला टाल देते हैं और उनके पास कोई जानकारी नहीं होती है। अलबत्ता विभाग प्रमुख (वित्तीय सलाहकार और मुख्य लेखा अधिकारी) अजय माथुर ने इतना भर कहा कि उनके पास शिकायत आई है। मामला विभाग का आंतरिक है इसलिए वे मीडिया को इसका ब्योरा नहीं दे सकते हैं। जिस अधिकारी पर आरोप है वे फिलहाल दफ्तर नहीं आ रही हैं और उनका मोबाइल लगातार बंद आ रहा है। अब तो यह भी जानकारी मिली है कि उनके स्थायी पते का नंबर भी गलत है। अलबत्ता बार-बार जानकारी मांगने पर अब दिल्ली पुलिस की ओर से बताया गया है कि मामले की जांच चल रही है।

रेलवे समेत खुफिया जांच एजंसी से जुड़े हर विभाग को करीब छह महीने से दी गई दर्जनों शिकायतों के आधार पर जानकारी मिली है कि उत्तर रेलवे के सांख्यिकी विभाग में तैनात एक अधिकारी 2003 में पांच साल की छुट्टी लेकर अपने पति के पास अमेरिका गर्इं। उनका पासपोर्ट जून 2009 तक के लिए वैध था। आरोप है कि उन्होंने पासपोर्ट समाप्त होने के पहले अपना नाम और अपने पति और दोनों बच्चियों का नाम और जन्मतिथि आदि बदलकर अमेरिका से ही दूसरा पासपोर्ट बनवा लिया। बदले हुए नाम से ही अमेरिका का पासपोर्ट भी बनवा लिया। उनकी छोटी बच्ची का जन्म अमेरिका में ही 2005 में हुआ। वे लगातार अमेरिका आती-जाती रही हैं। 2011 में दफ्तर आने के बाद लोगों की शिकायत पर विभाग ने उनसे आठ अप्रैल को पत्र लिख कर पासपोर्ट के साथ उन्हें विभाग के मुख्यालय में तलब किया। इसके जवाब में उनका कहना था कि पासपोर्ट की अवधि (2-6-2009) समाप्त होने के बाद स्वास्थ्य के आधार पर (मेडिकल) उन्होंने मार्च 2011 में विभाग को सारे दस्तावेज मुहैया करा दिए हैं।

बताते हैं कि कुछ अफसरों की मेहरबानी से उनपर कार्रवाई टलती रही और 28 अगस्त 2016 को उन्हें विभाग ने निलंबित कर दिया। आदेश में यह लिखा हुआ है कि उन्हें निलंबन के दौरान आधा वेतन मिलेगा और वे निलंबन के दौरान मुख्यालय नहीं छोड़ेंगी लेकिन न तो यह लिखा हुआ है कि यह निलंबन किस अपराध में किया गया है और न ही कोई अधिकारी यह बताने को तैयार है कि जब वे किसी के लिए उपलब्ध नहीं हैं तो उनके मुख्यालय न छोड़ने के आदेश का क्या? इतना ही नहीं उनके खिलाफ लुक आउट आदेश भी जारी है यानी उनका पासपोर्ट पुलिस की निगरानी में है। दफ्तर के दूसरे कर्मचारियों का कहना है कि वे शायद फिर अमेरिका गई हैं।

विभाग के उनके दूसरे सहयोगी ही बताते हैं कि उनके पति अमेरिका में ही काम करते हैं। वे दिल्ली में कम ही रहती हैं। अलबत्ता उनकी बड़ी बेटी नए नाम से फरीदाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही है। इतना कुछ होने के बाद भी विभाग के कोई भी अधिकारी इस पर कुछ भी बोलने से बचते हैं। स्टेट एंट्री रोड के दफ्तर से लेकर बड़ौदा हाऊस के उत्तर रेलने के महाप्रबंधक तक से बातचीत के प्रयास सफल नहीं रहे। वित्तीय सलाहकार (ट्रैफिक) और मुख्य लेखा अधिकारी अजय माथुर ने केवल शिकायत आने की जानकारी दी है जबकि संवाददाता के पास अनेक विभागों में किए गए शिकायत की कॉपी पावती के साथ उपलब्ध है।

मोबाइल बंद होने के कारण आरोपी अफसर का पक्ष नहीं लिया जा सका। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दोहरे पासपोर्ट का मामला सामने आने के बाद भी उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। यह कैसे संभव है कि कोई देश की सरकारी नौकरी में अव्वल पद पर काम करे और वह दूसरे नाम से दूसरे देश का नागरिक भी हो। खुफिया विभागों में बार-बार शिकायत देने के बाद अब दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने जांच शुरू कर दी है। यह भी कम चौंकाने वाली बात नहीं है कि दिल्ली का कोई व्यक्ति दिल्ली पुलिस की जानकारी के बिना विदेश में अपना पासपोर्ट बनवा ले।

 

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