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ईसाई पर्सनल लॉ के जरिए मिला तलाक अवैध: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि ईसाई पर्सनल लॉ के जरिए मिला तलाक वैध नहीं है क्योंकि यह कानूनी प्रावधान का स्थान नहीं ले सकता।
Author नई दिल्ली | January 20, 2017 01:18 am
पीठ ने कहा कि इस मामले में कई सारे किंतु-परंतु हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि ईसाई पर्सनल लॉ के जरिए मिला तलाक वैध नहीं है क्योंकि यह कानूनी प्रावधान का स्थान नहीं ले सकता। अदालत ने इस संबंध में एक जनहित याचिका खारिज कर दी है। इस याचिका में गिरिजाघर अदालत से मंजूर ऐसे तलाक को समान कानूनी मान्यता देने की मांग की गई थी।
प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के खंडपीठ ने कर्नाटक कैथोलिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष क्लारेंस पेस की याचिका खारिज करते हुए कहा कि अदालत ने इस मुद्दे का अपने 1996 के फैसले में निपटारा किया था जो मोली जोसेफ बनाम जार्ज सेबस्टियन के मामले में दिया गया था। उस वक्त शीर्ष अदालत ने कहा था कि ईसाइयों के पसर्नल लॉ का पक्षों पर धर्म संबंधी या गिरिजाघर संबंधी प्रभाव हो सकता है। लेकिन तलाक अधिनियम के लागू होने के बाद ऐसे पर्सनल कानून के तहत विवाह विच्छेद या समाप्ति का कोई कानूनी प्रभाव नहीं हो सकता क्योंकि कानून ने एक अलग प्रक्रिया और तलाक या विवाह विच्छेद के लिए एक अलग संहिता मुहैया की है।

पेस ने 2013 में दायर याचिका में कहा था कि किसी गिरिजाघर द्वारा मंजूर किए गए तलाक को भारतीय कॉमन लॉ के तहत वैध माना जाना चाहिए जैसा कि ‘तीन तलाक’ के सिलसिले में मुसलमानों के मामले में है। पेस की ओर से पेश हुए पूर्व अटार्नी जनरल सोली सोराबजी ने दलील दी कि जब मुसलिम दंपति के लिए मौखिक रूप से तलाक कहना कानूनी मान्यता पा सकता है तो फिर ईसाई पसर्नल लॉ के आदेश क्यों नहीं अदालती कानून पर बाध्यकारी हो सकते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि ईसाई अदालतों से तलाक मंजूर कराने के बाद शादी करने वाले कई कैथोलिक ईसाइयों ने बहुविवाह के आरोप का सामना किया है क्योंकि इस तरह के तलाक को फौजदारी व दीवानी अदालतों से मान्यता प्राप्त नहीं है। वहीं केंद्र ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि क्रिश्चियन पर्सनल लॉ को भारतीय क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1972 और तलाक अधिनियम 1869 की जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

 

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