December 06, 2016

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86 फीसद मुद्रा को बाहर कर बना दिए हाहाकार जैसे हालात

आक्रोश दिवस पहला ऐसा कदम है, जिसमें विपक्ष की एका दिखी है। सरकार ने इसे भारत बंद की तरह प्रचारित किया।

Author नई दिल्ली | December 1, 2016 03:35 am
बैंक के बाहर खड़ी लाइन की प्रतिकात्मक तस्वीर। PTI Photo by Subhav Shukla

वर्तमान राजग सरकार के पहले मोराराजी देसाई सरकार ने भारत में पहली बार विमुद्रीकरण किया था। लेकिन उस वक्त इतनी परेशानी इसलिए नहीं हुई थी क्योंकि सरकार ने सिर्फ एक फीसद मुद्रा को चलन से बाहर किया था। लेकिन इस बार रातोंरात 86 फीसद मुद्रा को चलन से बाहर कर राजग सरकार ने हाहाकार के हालात पैदा कर दिए। ये बातें राज्यसभा सांसद व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता देवीप्रसाद त्रिपाठी ने जनसत्ता के विचार शृंखला कार्यक्रम बारादरी में बातचीत के दौरान कहीं।नोटबंदी पर विपक्ष की एकता पर उठे सवाल पर डीपी त्रिपाठी ने कहा कि इस मुद्दे पर सिर्फ तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अलग रास्ता अख्तियार किया है। ये दोनों पार्टियां विमुद्रीकरण का ही विरोध कर रही हैं और इसे वापस लेने की मांग कर रही हैं। दूसरी ओर, बाकी विपक्षी पार्टियां संसद में और संसद के बाहर दो सवालों को लेकर एकजुट हैं। पहला, विमुद्रीकरण को लागू करने के तरीके पर हमारी आपत्ति है। इसे पूरी तैयारी से लागू करना चाहिए था। इससे लोगों को परेशानी नहीं होती। दूसरा, हड़बड़ी में इसे क्यों लागू किया गया- इसकी जांच कराने की हम मांग कर रहे हैं।

इसे लेकर पूरे विपक्ष ने आंदोलन किया। आक्रोश दिवस पहला ऐसा कदम है, जिसमें विपक्ष की एका दिखी है। सरकार ने इसे भारत बंद की तरह प्रचारित किया। हमने विरोध का नारा दिया था, इसलिए नाम आक्रोश दिवस था। मोदी सरकार का विकल्प यह बहुवचन होगा, कोई अकेली पार्टी नहीं, आगे भी एकता रहेगी। संसद में इस मुद्दे को लेकर विपक्ष में एकता है। विपक्ष अपनी यह बात साबित करने में सफल रहा है कि सरकार इस योजना को बिना तैयारी के लेकर आई और सरकार को हमारी मांगों के मुताबिक इसमें संशोधन लाने भी पड़े। सरकार को इस बात का अहसास होना चाहिए था कि अचानक से 86 फीसद मुद्रा को चलन से बाहर करने का व्यापक असर होगा और सरकार को इसके लिए व्यापक तैयारी करनी थी। हमारा मूल विरोध बिना तैयारी के इतनी बड़ी योजना को लागू करने को लेकर है। विपक्ष अपने पक्ष को रखने में कामयाब हुआ।  सरकार के इस फैसले से आरबीआइ की स्वायत्तता पर उठे सवालों को खारिज करते हुए राज्यसभा सांसद ने कहा कि मैं नहीं मानता कि इससे आरबीआइ की स्वायत्तता भंग हुई है, क्योंकि ऐसे बहुत से फैसले होते हैं जिनमें गोपनीयता बरतनी चाहिए। गोपनीयता बरते बगैर कोई फैसला कामयाब नहीं हो सकता है। हां, गोपनीयता बरतते हुए भी इसके लिए पुख्ता तैयारी रखी जा सकती थी।

त्रिपाठी ने एक सवाल पर कहा कि यह सच है कि अभी तो ऐसा लग रहा है कि सरकार को भी पता नहीं कि आगे क्या होने वाला है? मुख्य समस्या शहरों में उतनी प्रबल नहीं जितनी गांवों में है। हम पहले दिन से यह मांग करते रहे कि गांवों में सहकारी बैंकों को अधिकृत कर दें, कि आप नोट बदल सकते हैं, ग्रामीणों को सहूलियत हो जाएगी। आपको बाजार में प्रवाह बनाने के लिए अधिक नोट देने ही होंगे। हमारी व्यवस्था मूलत: नकदी पर आधारित है, गांवों में कितने एटीएम हैं? कितने अकाउंट रखने वाले लोग हैं? एक बड़ी आबादी के पास तो हिसाब-किताब और बैंकिंग की चेतना भी नहीं पहुंची है। कल ही मुझसे मिलने मालेगांव के बुनकर आए थे जिनका बैंक खाता तक नहीं खुला है। बहुत से अल्पसंख्यक हैं जिनके खाते नहीं हैं। सरकार इतनी बड़ी सच्चाई से आंखें मूंदे कैसे रह सकती है?

कालेधन की सफाई के नाम पर लाई गई विमुद्रीकरण योजना को सरकार अब नकदी रहित समाज के निर्माण की तरफ अहम बता रही है और इसे वैश्वीकरण के लिए भी जरूरी बता रही है तो हिंदुस्तान के ताजा हालात में आप इसे कैसे देखते हैं? इस सवाल पर डीपी त्रिपाठी ने कहा कि भारत वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा का वाहक रहा है और इसने तमाम विचारों को स्वीकृत किया है। हमें वैश्वीकरण को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। भारत से पहले चीन ने आगे आकर वैश्वीकरण और निजी पूंजी और अर्थव्यवस्था में निजीकरण को स्वीकार किया। अभी कुछ दिनों पहले मैं वियतनाम गया था। वहां कोई पुराने संघर्षों को याद नहीं कर रहा था, वे अमेरिकी निवेश में ज्यादा रुचि रख रहे हैं। आज के दौर में हम वैश्वीकरण से खुद को अलग नहीं रख सकते। लेकिन यहां यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एक सहज वैश्वीकरण होता है, जो दुनिया में सबसे ग्राह्य होता है। लैटिन अमेरिका का अमरूद भारत में आ गया और इलाहाबादी अमरूद बनकर प्रसिद्ध भी हो गया। अगर ब्राजील की हवा नहीं चलेगी तो कनार्टक के कॉफी में वो स्वाद नहीं आएगा। यह एक सहज वैश्वीकरण है। लेकिन एक आरोपित वैश्वीकरण है जिसे अमेरिका जैसे धनी देश थोपते हैं, इस थोपे हुए वैश्वीकरण के संकेत काफी संगीन हैं। हमें इसके खतरों से निपटने की तैयारी करते हुए चलना होगा।

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First Published on December 1, 2016 3:35 am

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