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दिल्ली के पास विकल्प नहीं: सीएसई

अदालती फटकार के बाद दिल्ली सरकार ने सड़क पर कारों की राशनिंग का फार्मूला बनाया है। इसके साथ ही दिल्ली में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने का फरमान सुनाते हुए पर्यावरण संरक्षण के कई उपाय सुझाए हैं।
Author December 12, 2015 03:29 am

अदालती फटकार के बाद दिल्ली सरकार ने सड़क पर कारों की राशनिंग का फार्मूला बनाया है। इसके साथ ही दिल्ली में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने का फरमान सुनाते हुए पर्यावरण संरक्षण के कई उपाय सुझाए हैं। फिलहाल दिल्ली सरकार के वाहन फार्मूले पर बहस जारी है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की अनुसंधान शाखा की कार्यकारी निदेशक व वायु प्रदूषण शाखा की प्रमुख अनुमिता रायचौधरी का कहना है कि हम दिल्ली सरकार के इस कदम का स्वागत करते हैं। हालत बद से बदतर होने के बाद दिल्ली सरकार ने मजबूरी में यह कदम उठाया है। सच कहें तो दिल्ली सरकार के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था।
क्या गाड़ियों की राशनिंग की योजना सफल होगी के सवाल पर अनुमिता ने कहा, ‘सच यह है कि दिल्ली के लोगों के पास इस योजना को कामयाब बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। या तो लोग इस योजना को सफल बनाएं या फिर शहर में हर घंटे वायु प्रदूषण से संबंधित बीमारियों के कारण होने वाली एक मौत और हर तीसरे बच्चे के कमजोर फेफड़े के साथ जीना स्वीकार कर लें’।
दिल्ली की सड़कों पर यह योजना कामयाब होती है तो यह पूरे देश के लिए रोल मॉडल हो सकता है। लेकिन इसके लिए सरकार को कई कदम उठाने पड़ेंगे। दिल्ली सरकार सार्वजनिक परिवहन दुरुस्त करने के साथ पर्याप्त फीडर सेवा भी मुहैया कराए। बिना फीडर सेवा के सार्वजनिक वाहनों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। फीडर सेवाओं की कमी का ही नतीजा है कि लोग मेट्रो स्टेशनों तक पहुंचने के लिए भी गाड़ी निकालने के लिए मजबूर होते हैं।
सड़क पर गाड़ियों का समीकरण समझाते हुए अनुमिता कहती हैं कि मौजूदा दौर में दिल्ली में 8.80 करोड़ गाड़ियां हैं, और इस संख्या में रोजाना 1400 नई गाड़ियों का इजाफा होता है। महज 2013-14 और 2014-15 में गाड़ियों की संख्या में 14 फीसद का इजाफा हुआ है। एक साल में दिल्ली में 1.25 लाख कारों का रजिस्ट्रेशन होता है। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई तीनों महानगरों में गाड़ियों की कुल संख्या पर भारी पड़ता है अकेले सिर्फ दिल्ली का आंकड़ा। दिल्ली में रोज 500 नई गाड़ियों का पंजीकरण होता है। दिल्ली का 2014-15 का आर्थिक सर्वे बताता है कि 15 सालों में राजधानी में कारों की संख्या में 2.7 गुणा का इजाफा हुआ है।
दिल्ली में कार की मार का समाधान बताते हुए अनुमिता कहती हैं कि इसका सबसे सीधा रास्ता यह है कि निजी कारों पर छिपी हुई सबसिडी खत्म की जाए। अगर कार उपभोक्ताओं को सड़क पर जगह, पार्किंग, सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल और प्रदूषण फैलाने के अनुपात में पैसे अदा करने पड़ें तो उनके लिए पहला आकर्षण परिवहन के सार्वजनिक साधन ही होंगे। दिल्ली में एक कार उपभोक्ता एक बस की तुलना में नौ गुना कम रोड टैक्स अदा करता है। जहां एक बस रोजाना 1000 सवारियों को ढोती है वहीं एक कार जो सड़क पर बस का आधा हिस्सा लेती है महज एक से दो सवारियों को ढोती है। हर फेरे में 65 सवारियों को ढोनेवाली बस सालाना 15000 का रोड टैक्स भरती है। वहीं छह लाख रुपए में आने वाली एक कार 15 सालों के लिए महज 1600 रुपए का ही रोड टैक्स भरती है। वहीं दिल्ली जैसे शहर में कारें आवासीय परिसर और ज्यादातर सार्वजनिक जगहों पर मुफ्त पार्किंग का इस्तेमाल करती हैं, और व्यावसायिक जगहों पर मामूली पार्किंग शुल्क अदा करती हैं। शहर की सेहत बनाने के लिए अब यह जरूरी है कि कारों पर करों को बढ़ाया जाए वहीं बसों पर से करों का बोझ हटाया जाए।

 

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