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इंसाफ़ की अंतहीन आस छोड़ने को तैेयार नहीं विस्थापित आदिवासी

दामोदर घाटी परियोजना के लिए 240 गांवों के 12 हजार परिवारों की 38 हजार एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण हुआ था। 1670 परिवारों के घर भी परियोजना में ही समा गए थे।
Author नई दिल्ली | October 20, 2016 21:43 pm
दामोदर घाटी परियोजना। (फाइल फोटो)

झारखंड और पश्चिम बंगाल के चार जिलों के बारह हजार विस्थापित आदिवासी परिवारों का जीवट वाकई अनूठा है। मुआवजे और पुनर्वास की आस इन गरीबों ने उजड़ने के छह दशक बाद भी छोड़ी नहीं है। पर पटना, रांची और कोलकाता ही नहीं दिल्ली में बैठी सरकारों को कभी उनकी पीड़ा का अहसास नहीं हुआ। ये बारह हजार आदिवासी परिवार दामोदर घाटी परियोजना के चलते आजादी के बाद ही विस्थापित हो गए थे। अपने मकानों और जमीन के मुआवजे व पुनर्वास के लिए एक बार फिर धनबाद के सीमा पत्थर गांव में 17 अक्तूबर से आमरण अनशन पर हैं।

घटवार आदिवासी महासभा के बैनर तले ये आदिवासी पिछले एक दशक में विभिन्न स्थानों पर दर्जनों बार धरना, प्रदर्शन, भूख हड़ताल और आमरण अनशन कर चुके हैं। इस अवधि में विभिन्न सरकारी एजंसियों ने उनके साथ 34 बार लिखित समझौते भी किए। पर इंसाफ के लिए वे आज भी तरस रहे हैं। महासभा के सलाहकार रामाश्रय सिंह को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इंसाफ की उम्मीद बंधी थी। पर केंद्र और झारखंड दोनों जगह भाजपा की सरकारें होने के बाद भी उनकी त्रासदी खत्म नहीं हो पाई।

दामोदर घाटी परियोजना केंद्र सरकार ने ताप बिजली घर के लिए स्थापित की थी। इसके लिए 240 गांवों के 12 हजार परिवारों की 38 हजार एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण हुआ था। 1670 परिवारों के घर भी परियोजना में ही समा गए थे। लेकिन न तो सबको जमीन का मुआवजा दिया गया और न वादे के मुताबिक हर विस्थापित परिवार के पुनर्वास के लिए एक सदस्य को परियोजना में नौकरी। बकौल रामाश्रय सिंह महज पांच सौ आदिवासी परिवारों को ही अब तक बतौर पुनर्वास नौकरी दी गई। जबकि परियोजना के अधिकारी सबके पुनर्वास का दावा करते हैं। बेचारे आदिवासियों को यही देखकर तो सदमा पहुंचा कि उनके नाम पर नौ हजार फर्जी लोगों को नौकरी दे दी गई।

सीमा पत्थर गांव में विस्थापित आदिवासी परिवारों ने इस साल यों सत्याग्रह तो एक मार्च को ही शुरू कर दिया था पर सरकारी एजंसियों के कानों पर जूं नहीं रेंगी तो 17 अक्तूबर से सैकड़ों आदिवासी आमरण अनशन पर बैठ गए। इन आदिवासियों की मांग अब अपने मुआवजे और पुनर्वास से ज्यादा इस पुनर्वास घोटाले की सीबीआइ जांच की है। यूपीए सरकार के वक्त भाजपा ने वादा किया था कि वह केंद्र की सत्ता में आई तो नौ हजार आदिवासियों की नौकरी हड़प जाने के घोटाले की सीबीआइ जांच करा कर दोषियों को सजा और आदिवासियों को इंसाफ सुनिश्चित करेगी।

विस्थापित आदिवासियों को अब आसानी से किसी पर भरोसा नहीं होता। उनके साथ छल कपट ही इतनी बार हो चुका है कि वे अब आशंका से मुक्त हो ही नहीं पा रहे। इस साल 27 जून को ही झारखंड के मुख्यमंत्री सचिवालय से रामाश्रय सिंह को टेलीफोन पर सूचना दी गई थी कि राज्य सरकार इस मामले की सीबीआइ जांच की केंद्र के पास सिफारिश जल्द भेजने जा रही है। पर यह आश्वासन भी खरा साबित नहीं हुआ। इससे पहले घटवार आदिवासी महासभा ने दर्जनों पत्र केंद्रीय ऊर्जा मंत्री और प्रधानमंत्री को भेजे। पर खानापूरी से ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ।

आदिवासियों का आरोप है कि दामोदर घाटी परियोजना के अधिकारी सीबीआइ जांच में रोड़ा बने हुए हैं। यह बात उनके साथ बातचीत में पिछले साल 22 अप्रैल को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी मानी थी। उन्होंने परियोजना के प्रबंधन को पत्र भी लिखा था कि 30 दिन के भीतर मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराएं। लेकिन कुछ नहीं हुआ। धनबाद के एसडीएम ने खुद पिछले साल परियोजना के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश तक कर दी थी। लेकिन उसे दबा दिया गया।

अपने मुआवजे और पुनर्वास की लड़ाई ये आदिवासी सुप्रीम कोर्ट से भी जीत चुके हैं। 22 जनवरी, 2010 को धनबाद के उपायुक्त की अध्यक्षता में हुए समझौते में दामोदर घाटी निगम ने विस्थापित आदिवासियों को नौकरी देने की दो शर्त रखी थी। एक- जो छूट गए वे एसडीएम के माध्यम से हल्फनामे दें। दो- वे अपने परिवारों से अनापत्ति भी दिलाएं कि किस सदस्य को रोजगार दिया जाए। बकौल रामाश्रय सिंह चार महीने की तय समय सीमा के भीतर 1300 परिवारों ने औपचारिकताएं पूरी कर दी। लेकिन नौकरी एक को भी नहीं मिल पाई।

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