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नरेंद्र मोदी के दावों पर कैसे भरोसा करें दलित?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेशक खुद को आंबेडकर का भक्त बताएं पर दलितों को उनके दावों पर भरोसा नहीं है।
Author नई दिल्ली | October 1, 2016 23:53 pm
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

अनिल बंसल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेशक खुद को आंबेडकर का भक्त बताएं पर दलितों को उनके दावों पर भरोसा नहीं है। बसपा सुप्रीमो मायावती तो कई बार कह चुकी हैं कि मोदी का दलित प्रेम महज दिखावा है। हकीकत तो यह है कि उनके राज में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं। भाजपा शासित गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में हुई घटनाओं के बाद दलितों में असुरक्षा का भाव भी बढ़ा है। दलितों को सत्ता में हिस्सेदारी की कसौटी पर भी भाजपा खुद को खरा साबित नहीं कर पाई है।  देश में इस समय गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गोवा, असम, महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में भाजपा की अपनी सरकारें हैं। इसके अलावा पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भाजपा सत्ता में हिस्सेदार है। पर एक भी मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री दलित नहीं है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में नए राज्यपाल नियुक्त किए जा चुके हैं। पर बिहार के रामनाथ कोविद को छोड़ दूसरा कोई दलित राज्यपाल नहीं बनाया गया। जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने एक साथ तीन दलितों सूरजभान (उत्तर प्रदेश), बाबू परमानंद (हरियाणा) और न्यायमूर्ति ओपी वर्मा (पंजाब) को राज्यपाल बनाया था।

सरकारी पदों को छोड़ भी दें तो पार्टी में भी दलितों की कोई पूछ नहीं है। वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में दलित बंगारू लक्ष्मण को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। 1980 में बनी भाजपा ने उनके अलावा किसी दलित को आज तक पार्टी का मुखिया नहीं बनाया। जबकि देश में दलितों की आबादी 20 फीसद से ज्यादा है। और तो और पार्टी के आठ महासचिवों में भी कोई दलित नहीं है। जबकि पार्टी के पास संजय पासवान, रामशंकर कठेरिया और विजय सोनकर शास्त्री जैसे मुखर नेता हाशिए पर हैं। केंद्र में मंत्री रह चुके दलित हितों के मुखर पैरोकार संघप्रिय गौतम तो अपनी अनदेखी से दुखी होकर दिल्ली छोड़ बुलंदशहर में जा बसे हैं। उपराष्ट्रपति पद की हसरत पालने वाले गौतम को भाजपा ने राज्यपाल तक बनाना जरूरी नहीं समझा।

पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष बनाने में भी दलितों के साथ नाइंसाफी की है। पंजाब के विजय सांपला को छोड़ एक भी प्रदेश अध्यक्ष दलित नहीं है। पंजाब में चूंकि भाजपा अकाली दल की पिछलग्गू है, लिहाजा वहां अध्यक्ष की कोई खास भूमिका है ही नहीं। नीति आयोग में भी किसी दलित को जगह नहीं मिल पाई है। जबकि योजना आयोग में दलितों की हिस्सेदारी हर सरकार में रही। जहां तक केंद्र सरकार में दलितों की हिस्सेदारी का सवाल है, भाजपा के इकलौते कैबिनेट मंत्री थावरचंद गहलोत हैं। जबकि विजय सांपला, अर्जुन मेघवाल और कृष्णा राज राज्यमंत्री हैं। इनमें एक भी स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री नहीं है। अलबत्ता भाजपा राम विलास पासवान और रामदास आठवले का जिक्र जरूर करती है। जबकि वे दोनों अपनी लोकजनशक्ति पार्टी और आरपीआइ की ताकत के बल पर मंत्री हैं, भाजपा के रहमोकरम पर नहीं। वाजपेयी सरकार में सत्यनारायण जटिया कैबिनेट मंत्री थे तो संघप्रिय गौतम स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री।

दलितों की अनदेखी के बावजूद संघप्रिय गौतम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत पर कोई संदेह नहीं है। प्रधानमंत्री ने दुनिया के कई देशों में कहा है कि उन्हें दुनिया ने युद्ध दिया पर भारत ने दिया बुद्ध जैसा शांति का पुजारी। गौतम चाहते हैं कि आंबेडकरवादियों और बौद्धों को सत्ता में हिस्सेदारी मिले। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति में से एक पद पर किसी दलितों को बैठाया जाए। दलितों के आरक्षण को वैधानिक स्वरूप दिया जाए। साथ ही दलित अत्याचार विरोधी 1989 के वीपी सिंह के बनाए कानून को और प्रभावी किया जाए। गौतम को भरोसा है कि सरकारी नौकरी कर रहे दलितों को तरक्की में भी आरक्षण देने के अपने वादे को प्रधानमंत्री पूरा करेंगे। इसके लिए संविधान संशोधन विधेयक भी लंबित है, जो राज्यसभा से पारित भी हो गया था। इसके अलावा विभिन्न समितियों, निगमों और आयोगों में भी दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अनुसूचित जाति आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश तो जरूर होती है, पर उस पर चर्चा नहीं कराई जाती। मोदी को इस बारे में भी सोचना चाहिए। गौतम की एक शिकायत और है। दलितों में जाटव जाति के लोग ज्यादा हैं। पर भाजपा गैरजाटव जातियों को बढ़ावा देती रही है। उसे लगता है कि जाटव मायावती के समर्थक हैं। जबकि यह धारणा सही नहीं है। जब तक मोदी सरकार दलितों के साथ ईमानदारी से सामाजिक न्याय नहीं करेगी, उसके सरोकार को दलित दिखावा ही समझेंगे। .

 

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First Published on October 1, 2016 11:53 pm

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