December 06, 2016

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गंगा और गाय सांप्रदायिक नहीं सभ्यता का मुद्दा : गोविंदाचार्य

साल 1969 में गोहत्या बंदी पर राजधानी में हुए उग्र आंदोलन के बाद उस दौरान पुलिस की कार्रवाई से मारे गए सैकड़ों गौसेवकों की मौत के बाद उस आंदोलन के बिखरने के बाद अब फिर से उसमें उबाल आना शुरू हो गया है।

Author नई दिल्ली | November 6, 2016 03:51 am
जाने माने चिंतक के. एन. गोविंदाचार्य। (Photo: PTI)

गोहत्या बंदी पर केंद्रीय कानून बनाने की मांग को लेकर देश भर से साधु-संत दिल्ली पहुंच रहे हैं। इसकी शुरुआत सात नवंबर को दिल्ली के जंतर मंतर से होगी। साल 1969 में गोहत्या बंदी पर राजधानी में हुए उग्र आंदोलन के बाद उस दौरान पुलिस की कार्रवाई से मारे गए सैकड़ों गौसेवकों की मौत के बाद उस आंदोलन के बिखरने के बाद अब फिर से उसमें उबाल आना शुरू हो गया है।  इस बार आंदोलन की कमान गोविंदाचार्य के हाथों में है। आंदोलन से जुड़े लोगों ने बताया कि जंतर मंतर पर होने वाले धरने में शंकराचार्य निश्चिलानंद सरस्वती, वृंदावन से स्वामी राजेंद्र दास, दत्ता श्रद्धानंद महाराज, गोपाल मणि महाराज, गोपाल दास महाराज, अनंतनंदा महाराज, अरूपानंद महाराज, दिनेश गिरि महाराज राजधानी पहुंच रहे हैं। धरने पर विभिन्न दलों के राजनेताओं को भी निमंत्रण दिया गया है। जंतर मंतर पर धरने के बाद एक प्रतिनिधिमंडल इस मांग को लेकर केंद्र की मोदी सरकार को ज्ञापन देगा।

सरकार को इस मामले में एक केंद्रीय कानून बनाने के लिए एक साल का समय दिया जाएगा। गोविंदाचार्य ने कहा कि गंगा और गाय सांप्रदायिक नहीं सभ्यता और पहचान का मुद्दा हैं। गऊ रक्षा क्रांति के तहत आठ नवंबर को गोपाष्टमी का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य इंद्रेश कुमार, गोविंदाचार्य, केंद्रीय मंत्री उमा भारती, पर्यटन मंत्री महेश शर्मा, सांसद महेश गिरी, मीनाक्षी लेखी, राष्ट्रीय सेविका समिति के अधिकारी एवं साधु-संत यमुना में दीप प्रज्ज्वलित करने के कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।  इस आंदोलन के जरिए संघ में अपनी वापसी के मुद्दे पर गोविंदाचार्य ने सीधे कुछ भी न कहते हुए सिर्फ इतना कहा कि उनका हमेशा मानना है कि व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश होता है। वे मुद्दों एवं मूल्यों पर कृत संकल्पित हैं। उनका किसी से टकराव नहीं है। सबकी बुनियादी मांग एक है और वह गोवंश की सुरक्षा है।

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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोरक्षकों के बाबत की गई टिप्पणी के बारे में उन्होंने कहा कि हो सकता है कि उन्होंने (मोदी) वोटों की राजनीति या फिर उस समय के कुछ हालात को लेकर कहा हो। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और अन्य गोरक्षा संगठनों की ओर से शुरू होने वाले इस आंदोलन के तहत सरकार के समक्ष विभिन्न बिंदुओं पर एक निर्देश पत्र तैयार किया गया है। इसके तहत यह मांग की गई है कि देश में संपूर्ण गोहत्या बंदी का केंद्रीय कानून बने, भारतीय गोवंश पर छाए संकट को दूर करने के लिए गोमांस के निर्यात को प्रतिबंधित किया जाए, गोचर भूमि को सरकारी एवं गैरसरकारी अतिक्रमण से मुक्त किया जाए। गोविंदाचार्य ने कहा कि गोवंश के हितों को ध्यान में रखते हुए गोरक्षा, गोपालन और गौसंवर्द्धन के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार में गौ मंत्रालय की स्थापना की जाए। उन्होंने कहा कि गंगा और गाय सांप्रदायिक मुद्दा नहीं बल्कि सभ्यता और देश की पहचान से जुड़ा विषय है। यह अर्थव्यवस्था, पर्यावरण समेत व्यापक संदर्भ वाला विषय है। ऐसे में गंगा और गाय की सुरक्षा समय की जरूरत है।

 

गोविंदाचार्य ने कहा कि आजादी के बाद से देश में प्रति मनुष्य मवेशियों के अनुपात में गंभीर गिरावट दर्ज की गई है। आजादी के समय एक मनुष्य पर एक मवेशी था जबकि आज सात मनुष्य पर एक मवेशी का अनुपात रह गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे में केंद्र स्तर पर गोवध प्रतिरोधक कानून लाया जाना चाहिए, साथ ही वनभूमि का अतिक्रमण रोका जाना है। गोविंदाचार्य ने कहा कि आज के संकटमय समय में पारिस्थितिकी अनुकूल विकास अहम है। जल, जंगल, जमीन, जानवर का संपोषण ही विकास का नाम हो सकता है। जीडीपी की वृद्धि दर का असमान वितरण को हम विकास से नहीं जोड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब देश के आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं तब विकास को पोषक आहार की समान उपलब्धता से जोड़ा जाना चाहिए। इस संदर्भ में गोवंश का संपोषण अत्यंत जरूरी है।

गोविंदाचार्य ने कहा कि वे चाहते हैं कि वोट की चिंता से परे हटकर उनकी मांग मानी जाए। क्योंकि अब तक सरकारों की गलत नीतियों के कारण भारतीय नस्ल का गोवंश खतरे में पड़ गया था। हमें इस बात को समझना होगा कि भारतीय सभ्यता में विकास मनुष्य केंद्रित नहीं बल्कि प्रकृति केंद्रित है।

 

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First Published on November 6, 2016 3:51 am

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