March 24, 2017

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समान नागरिक संहिता, तीन तलाक पर विधि आयोग ने लोगों से मांगी राय

क्या तीन तलाक का चलन खत्म कर देना चाहिए या इसे बरकरार रखा जाना चाहिए या उचित संशोधनों के साथ बरकरार रखा जाना चाहिए।

Author नई दिल्ली | October 8, 2016 00:57 am
( फाइल फोटो)

क्या तीन तलाक का चलन खत्म कर देना चाहिए ? क्या समान नागरिक संहिता वैकल्पिक होनी चाहिए ? यदि इन मुद्दों पर आपके कोई विचार हों तो आप विधि आयोग को अपनी राय से अवगत करा सकते हैं । विधि आयोग ने शुक्रवार (7 अक्टूबर) को इन संवेदनशील मुद्दों पर लोगों से राय मांगी है। समान नागरिक संहिता पर गर्मागर्म बहस के बीच विधि आयोग ने परिवार कानूनों के पुनरीक्षण और उनमें सुधार के विषयों पर लोगों की राय मांगी है। आयोग ने कहा कि इस कदम का मकसद कानूनों की बहुलता कायम करने की बजाय सामाजिक अन्याय को खत्म करना है। शुक्रवार को जारी एक अपील में आयोग ने कहा कि इस प्रयास का उद्देश्य कमजोर समूहों के खिलाफ भेदभाव को खत्म करना और विभिन्न सांस्कृतिक रिवाजों को सुसंगत बनाना है। आयोग ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि ‘किसी भी एक वर्ग, समूह या समुदाय के नियम-कायदे परिवार कानूनों में होने वाले सुधार की ध्वनि पर हावी नहीं होंगे।’

एक प्रश्नावली में आयोग ने पूछा है कि क्या मौजूदा पर्सनल लॉ और प्रचलित रीतियों को संहिताबद्ध करने की जरूरत है और क्या इससे लोगों को फायदा होगा। आयोग की ओर से तैयार किए गए 16 प्रश्नों की प्रश्नावली में यह भी पूछा गया कि क्या तीन तलाक का चलन खत्म कर देना चाहिए या इसे बरकरार रखा जाना चाहिए या उचित संशोधनों के साथ बरकरार रखा जाना चाहिए। यह भी पूछा गया है कि क्या समान नागरिक संहिता वैकल्पिक होनी चाहिए। विधि आयोग ने पूछा है कि क्या समान नागरिक संहिता में तलाक, शादी, गोद लेने, बच्चों की कस्टडी, उत्तराधिकार और पैतृक धन जैसे विषयों को भी शामिल किया जाना चाहिए। आयोग ने लोगों और हितधारकों से पूछा है कि क्या समान नागरिक संहिता से किसी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन होगा।

विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) बी एस चौहान ने कहा, ‘आयोग को उम्मीद है कि वह समान नागरिक संहिता के औचित्य पर स्वस्थ चर्चा की शुरूआत कर पाएगा और सभी धर्मों के परिवार कानूनों और प्रचलित रीतियों की विविधता पर फोकस करेगा, ताकि कानूनों की बहुलता कायम करने की बजाय सामाजिक अन्याय को खत्म किया जा सके।’ उन्होंने कहा कि सामाजिक बदलाव की मांगों पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए आयोग सभी हितधारकों एवं आम लोगों की राय पर विचार करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘किसी एक वर्ग, समूह या समुदाय के नियम-कायदे परिवार कानूनों में सुधार की ध्वनि पर हावी नहीं हो सकें।’

न्यायमूर्ति चौहान ने अपील में कहा कि परिवार कानूनों में सुधार के तहत महिलाओं के अधिकारों को संवैधानिक प्रावधान, धार्मिक अधिकार एवं राजनीतिक वाद-विवाद की बजाय अपने आप में उद्देश्य समझा जाना चाहिए। सरकार ने जून में विधि आयोग से कहा था कि वह समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर विचार करे। नागरिक संहिता का क्रियान्वयन भाजपा के चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा है। मुस्लिम नेताओं के एक समूह ने कहा है कि वह तीन तलाक एवं अन्य पर्सनल लॉ को खत्म करने के किसी भी कदम का विरोध करेगा।

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First Published on October 8, 2016 12:57 am

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