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रणदीप सुरजेवाला: राजीव गांधी ने इंग्‍लैंड से इंजेक्‍शन मंगवा कर द‍िलवाया था जीवनदान,17 साल की उम्र से कर रहे स‍ियासत

साल 2005 में सुरजेवाला एक और वजह से सुर्खियों में थे। तब उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को विधान सभा चुनाव में करारी शिकस्त दी थी।
17 साल की उम्र में ही राजनीतिक ककहरा पढ़ने वाले सुरजेवाला को राजनीति विरासत में मिली है।

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता और हरियाणा के कैथल से विधायक रणदीप सिंह सुरजेवाला इन दिनों चर्चा में हैं। गुजरात चुनावों को लेकर सुरजेवाला सोशल मीडिया और मीडिया के अन्य माध्यमों में काफी सक्रिय हैं। कांग्रेस की तरफ से सोशल मीडिया पर सुरजेवाला आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए हैं। सोशल मीडिया पर गुजरात में ‘विकास पागल हो गया’ अभियान में उनकी बड़ी भूमिका रही है। इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह के मुद्दे पर भी आक्रामक रहे हैं। सुरजेवाला पार्टी के न केवल स्पष्ट और कुशल वक्ता हैं बल्कि राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी भी हैं। 17 साल की उम्र में ही राजनीतिक ककहरा पढ़ने वाले सुरजेवाला को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता शमशेर सिंह सुरजेवाला भी हरियाणा सरकार में लंबे समय तक मंत्री रह चुके हैं। लिहाजा, वो राजनीति के दांव-पेंच, घात-प्रतिघात को बखूबी समझते हैं। विपक्षी दलों के लोग भी सुरजेवाला की भाषा शैली, वक्तव्य और विरोधियों की भी ससम्मान आलोचना करने के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं।

साल 2005 में वो हरियाणा सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री रह चुके हैं। उस वक्त उनकी उम्र 38 साल थी और कैबिनेट में सबसे युवा मंत्री थे। इसके बाद साल 2009 से 2014 तक भी वो भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में मंत्री रह चुके हैं। साल 2005 में सुरजेवाला एक और वजह से सुर्खियों में थे। तब उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को विधान सभा चुनाव में करारी शिकस्त दी थी।

सुरजेवाला न केवल अपनी वाकपटुता और चुनावी रणकौशल की वजह से नेहरू-गांधी परिवार के करीब हैं बल्कि गांधी परिवार का उन पर एक बड़ा एहसान भी है। सुरजेवाला के पिता शमशेर सिंह सुरजेवाला ने अपनी आत्मकथा “मेरा सफर, मेरी दास्तां” में लिखा है कि साल 1984 के लोकसभा चुनावों के वक्त जब रणदीप सिंह सुरजेवाला की तबीयत काफी बिगड़ गई थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सहयोग से उन्हें जीवनदान मिला था।

सुरजेवाला ने लिखा है, “वैसे भी उसे एक बार जीवनदान परमात्मा ने ही दिया जब राजीव गांधी ने मेरी देवदूत की तरह मदद की थी। 1984 के चुनाव के दौरान जब मैं किसी कार्यवश दिल्ली था तो मेरे पीछे चुनाव कैम्पेन रणदीप ने शुरु कर दिया। यह उसकी शुरुआती कोशिश थी कि उसे हैपेटाईटस बी हो गया। उन दिनों हैपेटाइटिस बी लगभग लाईलाज बीमारी थी। रणदीप की हालत इतनी खराब हो गई थी कि बेहाश हो गए और लगभग कोमा की स्थिति हो गई थी। तब पी.जी.आई. के डॉक्टरों ने एक इंजेक्शन लिखा जो उस वक्त इंग्लैण्ड में ही मिल सकता था। तब राजीव गांधी जी ने आनन-फानन में अपने किसी पायलट मित्र से फोन पर बात की तथा इंग्लैण्ड से इंजेक्शन मंगवाया। इंजेक्शन आते ही उसे चण्डीगढ़ भिजवाया गया। डॉक्टरों ने इंजेक्शन को लगाया जो परमात्मा की कृपा से संजीवनी बूटी की तरह कारगर रहा और रणदीप को परम-पिता परमात्मा की कृपा और राजीव गांधी के सहयोग से जीवनदान प्राप्त हुआ।”

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