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राज्यसभा विपक्ष ने सरकार पर लगाया ‘शिक्षा के सांप्रदायीकरण’ का आरोप

तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि शिक्षा नीति में हिन्दू, ईसाई, बौद्ध या कोई भी मिशनरी हो, सभी के विचार समाहित किए जाने चाहिए।
Author नई दिल्ली | August 11, 2016 21:39 pm
राज्यसभा (फाइल फोटो)

राज्यसभा में गुरुवार (11 अगस्त) को विपक्ष ने सरकार पर शिक्षा का सांप्रदायीकरण करने का आरोप लगाते हुए देश के भविष्य को ध्यान में रखते हुए आधुनिक शिक्षा पर जोर देने और शिक्षा को बाजार के प्रभाव से मुक्त कराने की सलाह दी। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने प्रारूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016 पर उच्च सदन में अल्पकालिक चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि मौजूदा सरकार नयी शिक्षा नीति के तहत शिक्षा में केन्द्रीकरण, व्यवसायीकरण और सांप्रदायीकरण का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ की इजाजत नहीं दी जा सकती।

उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें भी शिक्षा के सार्वभौमीकरण पर विशेष जोर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे देश में एकता की भावना मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि देश में शिक्षा के अधिकार को मूलभूत अधिकार बनाया गया है। किन्तु जब तक हम पड़ोस के स्कूल में पढ़ाने की नीति को नहीं अपनाते, सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाएगी। येचुरी ने कहा कि सरकार नई शिक्षा नीति के नाम पर वैदिक शिक्षा देने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि हम प्राचीन शिक्षा का विरोध नहीं कर रहे हैं। किन्तु हमें वर्तमान समाज की जरूरत को देखते हुए प्राचीन और आधुनिक युग की जो भी सर्वोत्तम बातें हो, उनका समावेश शिक्षा में करना चाहिए।

तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो समावेशी हो तथा विविध विचारों एवं मतों के प्रति खुली हो। उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा में सभी धर्मों की अच्छी बातों का समावेश किया जाना चाहिए। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के उस बयान का उल्लेख किया कि मसौदा शिक्षा रिपोर्ट विचार विमर्श का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि सरकार को नई शिक्षा नीति तैयार करते समय व्यापक विचार विमर्श करना चाहिए। डेरेक ने कहा कि सरकार ने जिस तरह जीएसटी विधेयक के मामले में राज्यों के साथ व्यापक विचार विमर्श कर आपसी सहमति तैयार की है, उसी तरह नई शिक्षा नीति के मामले में राज्यों के साथ समुचित विचार विमर्श किया जाना चाहिए।

सपा के रवि प्रकाश वर्मा ने कहा कि आजादी के 70 साल बाद हमारे देश में शिक्षा की जो अवस्था है, वह किसी से छिपी नहीं है। उन्होंने कहा कि आज देश में हजारों युवक उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद महज एक नौकरी के लिए भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो देश अपने बच्चों की उपेक्षा करता है, वह देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि हमें शिक्षा में गुणात्मक बदलाव लाने हैं तो हमें अपने शिक्षकों पर ध्यान देना होगा। वर्मा ने कहा कि सरकार तथा समाज में सभी को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिन्दुस्तान कैसे ज्ञान से संचालित होने वाला देश बने।

मौजूदा शिक्षा नीति के प्रारूप को दिशाहीन बताते हुए पूर्व मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि इसमें शिक्षा की गुणवत्ता, उस तक पहुंच और समानता की ओर ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा तक पहुंच बनाना आवश्यक है जिस ओर शिक्षा नीति के मसौदे में ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि देश में शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय के निजी क्षेत्र में अधिक संस्थान हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति को विचारधारा निरपेक्ष होना चाहिए जबकि सरकार आईसीएचआर, नेशनल बुक ट्रस्ट जैसी तमाम संस्थाओं में एक खास विचारधारा के लोगों को नियुक्त कर रही है।

इसके अलावा उन्होंने कहा कि अब राज्यपाल जैसे पद का भी भगवाकरण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसी कोई बात लेकर आनी चाहिए जिससे भारत का दीर्घकालिक हित हो। उन्होंने कहा कि शिक्षा का राजनीतिकरण नहीं बल्कि इसका उपयोग बच्चों के सशक्तिकरण के लिए किया जाना चाहिए जिससे अंतत: देश आगे बढ़ेगा। जदयू के अली अनवर अंसारी ने कहा कि आजादी के बाद जितने प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में हुए हैं शायद उतने किसी अन्य क्षेत्र में नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि हमने अपनी शिक्षा को बजार के हवाले छोड़ दिया है।

उन्होंने कहा कि एक ओर तो हमने शिक्षा को मूलभूत अधिकार बना दिया किन्तु आज बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूलों में लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि आज तो यह समय आ गया है कि लोग सबको समान शिक्षा देने का नारा तक नहीं लगाते। अंसारी ने कहा कि मौजूदा सरकार शिक्षा का सांप्रदायीकरण करना चाह रही है। उन्होंने कहा कि हमारा विविधतापूर्ण समाज सरकार की इस कोशिश को कभी कामयाब नहीं होने देगा।

अन्नाद्रमुक के एस आर बालासुब्रमण्यम ने कहा कि मसौदा शिक्षा नीति के संबंध में जो रिपोर्ट तैयार की गई, उसे तैयार करने वालों में सभी नौकरशाह थे। उसमें शिक्षा क्षेत्र के लोगों को शामिल किया जाना चाहिए था। उन्होंने शिक्षा को मातृभाषा में ही दिए जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि हम शिक्षा के माध्यम से अपनी विविधता वाली संस्कृति को बचाकर अपनी एकता कायम रख सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि शिक्षा नीति में अलग-अलग विचारों का संगम होना चाहिए। हिन्दू, ईसाई, बौद्ध या कोई भी मिशनरी हो, सभी के विचार समाहित किए जाने चाहिए। अल्पसंख्यक स्कूल चिंतित हैं। राज्यों के परामर्श के बिना नीति तैयार नहीं की जानी चाहिए।

बसपा के सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि नीति में प्राथमिक शिक्षा पर सबसे पहले ध्यान दिया जाना चाहिए। शिक्षा नीति ऐसी होनी चाहिए कि पढ़ने के बाद छात्रों को रोजगार भी मिले। कांग्रेस के के. रहमान खान ने कहा कि यदि सरकार आश्वस्त कर दे कि शिक्षा नीति देश के उत्थान के लिए है तो सभी इसका समर्थन करेंगे। जब गुरुकुल की बात की जाए तो मदरसे की बात भी की जानी चाहिए क्योंकि देश के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद मदरसे से ही पढ़े थे। जब संस्कृति की बात की जाए तो सभी संस्कृतियों की बात की जानी चाहिए। चर्चा में जदयू के अली अनवर अंसारी, बीजद के दिलीप कुमार तिर्की, राकांपा की वंदना चव्हाण, मनोनीत अनु आगा, टीआरएस के डॉ. के. केशव राव, भाजपा के शिव प्रताप शुक्ल ने भी भाग लिया। चर्चा अधूरी रही।

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