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वर्ष 2016: अदालतों में रिक्त पदों को लेकर विधि मंत्रालय को पड़ी चीफ़ जस्टिस की फटकार

ठाकुर ने विधि आयोग द्वारा वर्ष 1987 में की गई अनुशंसा को याद किया जिसमें प्रति दस लाख लोगों पर न्यायाधीशों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 करने का सुझाव था।
Author नई दिल्ली | December 26, 2016 20:25 pm
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर( File Photo)

उच्च न्यायपालिका में बढ़ते रिक्त पदों को लेकर इस साल कानून मंत्रालय को निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर की फटकार का कई बार सामना करना पड़ा। यहां तक कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में नियुक्ति से संबंधित दिशा-निर्देशों के मसौदे को अंतिम रूप देने का मंत्रालय का प्रयास भी अंजाम तक नहीं पहुंच सका। मंत्रालय ने इस साल 126 न्यायाधीशों की नियुक्ति की जो बीते कई वर्षों में सर्वाधिक है। मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में 24 अप्रैल को हैरान करने वाला वाकया हुआ जब प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में भावुक हो उठे। उन्होंने न्यायाधीशों के पदों को वर्तमान 21,000 से बढ़ाकर 40,000 करने में सरकार की ‘निष्क्रियता’ पर खेद व्यक्त करते हुए कहा, ‘आप सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते।’ असामान्य रूप से भावुक ठाकुर ने विधि आयोग द्वारा वर्ष 1987 में की गई अनुशंसा को याद किया जिसमें प्रति दस लाख लोगों पर न्यायाधीशों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 करने का सुझाव था।

ठाकुर द्वारा न्यायाधीश-आबादी अनुपात पर विधि आयोग की अनुशंसा का हवाला देने के कुछ दिन बाद तत्कालीन विधि मंत्री सदानंद गौड़ा ने कहा कि वह रिपोर्ट वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित नहीं थी। इस सम्मेलन में यह फैसला हुआ कि लंबित मामलों की संख्या में कमी लाने के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उच्च न्यायालयों में पुन: नियुक्ति के लिए संविधान के अत्यंत विशिष्ट प्रावधान का उपयोग किया जाएगा। विधि मंत्रालय ने सम्मेलन के ब्यौरों को मंजूरी देने के कुछ दिन बाद संसदीय समिति को बताया कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों से निपटने की कोई व्यवस्था नहीं है। फिलहाल सरकार के पास छह उच्च न्यायालयों के 18 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की पुन: नियुक्ति लंबित है। सरकार और न्यायापालिका के बीच टकराव एक बार फिर देखने को मिला जब सरकार ने उच्च न्यायालयों में न्यायमूर्तियों के खाली पदों पर नियुक्ति के लिए 43 उम्मीदवारों के नाम उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम को वापस लौटा दिए। कॉलेजियम ने कुल 43 नामों में से 37 नाम फिर दोहराए जबकि तीन प्रस्ताव टाल दिए। अब उसके पास तीन और नाम अभी मौजूद हैं। उच्चतम न्यायालय ने 18 नवंबर को सरकार को बताया कि उसने उन सभी के सभी 43 नामों को दोहराया है जो सरकार द्वारा कॉलेजियम को पुन: विचार के लिए भेजे गए थे।

हालांकि विधि राज्यमंत्री पी पी चौधरी ने लोकसभा को लिखित जवाब में बताया कि कॉलेजियम ने केवल 37 नामों की सिफारिश ही दोहराई है। सरकार और न्यायपालिका के बीच विवाद का मुख्य बिंदु प्रक्रिया ज्ञापन को अंतिम रूप देने का रहा। यह वह दस्तावेज है जो उच्चतम न्यायालय और 24 उच्च न्यायालयों में भविष्य में न्यायाधीशों की होने वाली नियुक्ति से संबंधित दिशा-निर्देश तय करेगा। उच्चतम न्यायालय ने इसका पहला मसौदा अस्वीकार कर दिया था जबकि अगस्त माह में भेजा गया दूसरा मसौदा अभी उसके पास लंबित है। उम्मीद है कि इस पर फैसला न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहड़ द्वारा चार जनवरी को प्रधान न्यायाधीश का पद संभालने के बाद लिया जाएगा। सरकार ने विधि आयोग को समान नागरिक संहिता का विवादित मुद्दा यह देखने के लिए भेजा कि इसे लागू किया जा सकता है या नहीं। इस मुद्दे के कारण भी विधि आयोग चर्चा में रहा। समान नागरिक संहिता और ‘तीन तलाक’ के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष में बुलंद आवाजों के बीच विधि आयोग ने इन विषयों पर जनता की राय मांगी। 22 दिसंबर तक आयोग को 40,000 प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो चुकी हैं।

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