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‘लोकतंत्र की हत्या हो रही हो तो Supreme Court कैसे खामोश रह सकता’

राज्यपालों के अधिकारों की समीक्षा कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस कथन पर कड़ी आपत्ति की कि राज्यपाल के सारे फैसले न्यायिक समीक्षा के लिए उपलब्ध नहीं है।
Author नई दिल्ली | February 5, 2016 00:56 am

राज्यपालों के अधिकारों की समीक्षा कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस कथन पर कड़ी आपत्ति की कि राज्यपाल के सारे फैसले न्यायिक समीक्षा के लिए उपलब्ध नहीं है। अदालत ने कहा कि अगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ‘हत्या’ हुई तो वह मूक दर्शक बना नहीं रह सकता। न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि अगर लोकतंत्र की हत्या हो रही हो तो अदालत खामोश कैसे रह सकती है। पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब राजनतिक संकट से जूझ रहे अरुणाचल प्रदेश के भाजपा विधायक के वकील ने अपनी बात कहने के लिए राज्यपालों के अधिकारों का हवाला दिया कि अदालतें राज्यपाल के सारे फैसलों की ‘समीक्षा’ नहीं कर सकतीं।

इस बीच, पीठ ने अक्तूबर से अभी तक का अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के पत्राचार का ब्योरा आठ फरवरी को तलब किया है क्योंकि वह विधानसभा अधिकारी द्वारा पेश दस्तावेजों से संतुष्ट नहीं थी। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति पीसी घोष और न्यायमूर्ति एनवी रमण शामिल हैं।

पीठ सदन का सत्र बुलाने, इसकी तारीख पहले करने और कांग्रेस के बागी विधायकों की अयोग्यता को लेकर विधानसभा अध्यक्ष नबम रेबिया और राज्यपाल राजखोवा के बीच हुआ पत्राचार देखना चाहती थी। कांग्रेस के कुछ बागी विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने राज्यपाल के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि विधानसभा का सत्र बुलाने को ‘अलोकतांत्रिक’ नहीं कहा जा सकता और यह ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ को निष्फल नहीं करता है, बल्कि विधानसभा भवन को ताला लगाना और उसका सामना नहीं करना अलोकतांत्रिक कृत्य है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा का सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल को मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल से सलाह लेना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान की कुछ व्यवस्थाओं में राज्यपाल को ‘विशेष’ परिस्थितियों में खुद ही विशेष कदम उठाने होते हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने विधानसभा का सत्र आहूत कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को क्रियाशील बनाया। उन्होंने सवाल किया कि बहुमत गंवा चुके और सदन से बच रहे लोग इसे गैरकानूनी कैसे करार दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि विधानसभा की इमारत पर ताला लगाना निश्चित ही साधारण और लोकतांत्रिक कृत्य नहीं था। अदालत इस मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ रेबिया और अन्य कांग्रेसी नेताओं की याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनवाई करेगी।
मालूम हो कि 60 सदस्यीय विधानसभा में शुरू में नबम तुकी सरकार को 47 विधायकों का समर्थन हासिल था। लेकिन इटानगर के सामुदायिक केंद्र में आयोजित विधानसभा के सत्र में उसने 33 मतों से विश्वास मत गंवा दिया था।

 

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  1. अशोक.गोविंद.शहा
    Feb 5, 2016 at 3:29 am
    वन्दे मातरम-क्या अदालतों ने इंदिरा आपात कल का संज्ञान लिया था ?क्या उस वक्त लाखोकी तादात में जेल में बंद किये गए आर इस इस स्वयंसेवकोंका मुलभुत हक़ संरक्षित किया था ? कानून और संविधान के तजत अगर विधान सभा बर्खास्त हुई है तो इतना हो हल्ला क्यों? जा ग ते र हो
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    Reply
    सबरंग