March 29, 2017

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दिवाली में कितनी कारगर रहेगी चीन की बेदखली!

कहीं उत्साह तो कहीं चीनी उत्पादों के विरोध में शुरू हुई मुहिम के औचित्य पर उठ रहे हैं सवाल ।

Author नोएडा | October 12, 2016 09:20 am
चीन का राष्ट्रीय झंडा।

कश्मीर पर आतंकवादियों को पाकिस्तान के खुले समर्थन का साथ दे रहे चीन के खिलाफ पहली बार देश में एक ऐसी विरोध की लहर शुरू हुई है, जिसे अंजाम तक पहुंचाने में सोशल मीडिया घी का तो काम कर रहा है लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए जनता केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ देख रही है। सस्ते सामान खरीदने की भारतीय मानसिकता को भांप कर पिछले एक दशक से ज्यादा समय के दौरान चीन के उत्पादों ने भारतीय उद्योगों को बंदी के कगार पर पहुंचा दिया है। मोबाइल, टीवी, कैमरे, घड़ी, टायर से लेकर रसोई में इस्तेमाल होने वाला चाकू और सुई तक चीन में निर्मित हैं, जिन्हें रोजमर्रा में भारतीय इस्तेमाल कर रहे हैं। वजह यह है कि चीन में निर्मित चाकू की गुणवत्ता भले ही भारतीय कंपनी के बने चाकू के मुकाबले काफी कम है। लेकिन कीमत में कई गुना के अंतर से भारतीय उत्पादों की बिक्री पर ग्रहण लग रहा है। लगातार उत्पादों के नहीं बिकने के कारण भारतीय कंपनी पहले बीमार और फिर बंदी के कगार पर पहुंच रही हैं। औद्योगिक महानगर नोएडा और ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली सैकड़ों कंपनियों में से कुछ दर्जन ही क्रियाशील बची हैं। वे भी चीन से सस्ते सामान को खरीदकर महज ‘असेंबल’ कर रही हैं।

नोएडा एंटर प्रिन्योर्स असोसिएशन के अध्यक्ष विपिन मल्हन ने बताया कि पाकिस्तान का खुला साथ देने के विरोध में पिछले दिनों सभी उद्यमियों ने चीन निर्मित उत्पादों का बहिष्कार करने का फैसला लिया है। इस फैसले का उद्यमियों के अलावा ज्यादातर व्यापारिक संगठनों और मार्केट एसोसिएशनों ने स्वागत कर साथ देने का वादा किया है। इसी कड़ी में उप्र सरकार ने चीन में निर्मित पटाखों पर प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक फैसला किया है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया में चीनी पटाखों के धुएं से तमाम तरह की बीमारियां फैलने की जानकारी चल रही है। जिसको लेकर ज्यादातर अभिभावक अभी से सचेत हो गए हैं। अलबत्ता चीनी पटाखों समेत अन्य उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने के लिए अगले हफ्ते जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर जांच रणनीति तय की जाएगी। साथ ही दीपावली से पहले चीनी पटाखों का इस्तेमाल नहीं करने वाले बैनर, होर्डिंग और पर्चे बंटवाने का फैसला लिया गया है।  उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह सर्फाबाद गांव में हुई पंचायत में भी चीन निर्मित उत्पादों का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया गया था। इस दौरान गांव की दुकानों पर बिकने वाले चीनी सामान की होली भी जलाई गई थी। ग्रेटर नोएडा में भी चीन उत्पादों के इस्तेमाल के खिलाफ जन जागरूकता रैली निकाली गई है।
चीनी मोबाइल से ही प्रसारित हो रहे चीन के खिलाफ संदेश

मोबाइल पर वाट्सऐप समेत अन्य सोशल मीडिया पर चीनी उत्पादों के बहिष्कार की सोच का स्वागत योग्य कदम है। भले ही इस मुहिम में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर मोबाइल फोन चीन में निर्मित हैं लेकिन लगातार ऐसी मुहिम आम व्यक्ति की सोच को प्रभावित करती है। बदली सोच से कुछ फीसद भी चीन के उत्पादों में कमी आना ही मुहिम की सफलता के लिए पर्याप्त है। भारतीय मानसिकता सस्ते सामान खरीदने की रही है लेकिन यदि चीन की जगह उसी कीमत के उत्पाद पाकिस्तान से आएंगे, तो भारतीय खरीदार उसे नहीं खरीदेंगे। जबकि चीन का माल खरीदने में ऐसी कोई परोक्ष प्रभाव नहीं है। जापान पर अमेरिका के परमाणु विस्फोट के बाद वहां की जनता ने अमरीकी उत्पादों को नहीं खरीदने का फैसला किया था। चीन के मामले पर भी ऐसा रुख अपनाने की जरूरत है। हालांकि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्युटीओ) का सदस्य होने के कारण भारत सरकार चीन का सामान आने पर रोक नहीं लगा सकती है। आयुर्वेदिक उत्पादों के मामले में बाबा रामदेव जैसी पहल भारतीय कंपनियों को करनी चाहिए।

प्रोफेसर आरके गुप्ता, विभागाध्यक्ष वाणिज्य विभाग, गवर्नमेंट पीजी कॉलेज नोएडा चीनी उत्पाद नहीं सरकारी नीतियां हैं जिम्मेदार चीन के सामान की वजह से नहीं बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों की वजह से देशी उद्योग बंद हो रहे हैं। चीन के सामान पर भारत रोक नहीं लगा सकता है। जरूरत है कि चीन जैसा औद्योगिक माहौल अपने देश की सरकारें उपलब्ध कराए। ऐसा हुआ तो भारतीय सामान चीन में वहीं तहलका मचाएगा, जैसा मौजूदा समय में चीन के उत्पाद भारत में कर रहे हैं। उद्योगों को सस्ती जमीन, रियायती दर पर बिजली, पानी, उपयुक्त कानून व्यवस्था के हालात और इंस्पेक्टर राज से मुक्ति देने पर सरकार को पहल करनी चाहिए। वातावरण में बदलाव से वास्तविक अंतर आएगा न कि सोशल मीडिया या चीनी उत्पादों के विरोध में रैलिया निकालने से। चीन ने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर इस मुकाम को हासिल किया है। भारतीय उद्यमी परंपरागत तकनीक को पूंजी के रूप में संजोए हुए हैं। यही वजह है कि विदेशी कंपनियां भारत में आधुनिक फैक्टरियां लगाकर मोटा मुनाफा कमा रही हैं।
कैप्टन विकास गुप्ता, ट्रस्टी मौलिक भारत

 

 

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First Published on October 12, 2016 2:56 am

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