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बोफोर्स घोटाला: सीबीआई फिर करना चाहती है जांच, सरकार की हरी झंडी का इंतजार

Bofors case: सीबीआई ने संकेत दिया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिका का समर्थन कर सकती है, जो मामले को रद्द करने के फैसले को चुनौती देती है।
इस केस को सबसे पहले 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो सामने लाया था।

सीबीआई दशकों पुराने बोफोर्स मामले की दोबारा जांच कर सकती है। सीबीआई ने संसदीय समिति से कहा है कि बोफोर्स मामले को दोबारा खोला जा सकता है। इसके लिए सरकार की हरी झंडी का इंतजार है। बोफोर्स मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अन्य अधिकारियों पर रिश्वत लेने का आरोप लगा था। तब सत्ता में कांग्रेस की सरकार थी। कानून मंत्रालय को अब इस पर फैसला लेना है। पिछले महीने इस संसदीय समिति में से अधिकांश का मानना था कि सीबीआई मामले की जांच फिर से शुरू करे और इसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश करे। यह मामला सिस्टम की विफलता का एक स्पष्ट उदाहरण है, पैनल के सदस्यों ने सीबीआई से आग्रह किया कि सीबीआई सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके इस केस को सरकार से फिर खोलने की मांग करे। सीबीआई ने संकेत दिया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय में लंबित याचिका का समर्थन कर सकती है, जो मामले को रद्द करने के फैसले को चुनौती देती है।

सीबीआई के डायरेक्टर अलोक वर्मा ने पूछा कि जांच एजेंसी पहले सर्वोच्च न्यायालय में क्यों नहीं गई थी। सांसदों ने कथित तौर पर बताया कि उस समय सीबीआई को यूपीए सरकार ने आगे की कार्रवाई नहीं करने दी। उस समय कांग्रेस सत्ता में थी।

छह सांसदो के पैनल के सामने पुरानी रिपोर्ट रखी है जो 1986 में बोफोर्स सौदे के लिए बनाई गई थी। बोफोर्स मामले ने 1980 में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार को तबाह कर दिया था और सत्ता में आने की पार्टी की संभावनाओं को बर्बाद कर दिया। इस केस को सबसे पहले 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो सामने लाया था। इसमें स्वीडिश डिफेंस मेन्युफेक्चरर द्वारा अपनी तोप बेचने के बदले राजीव गांधी समेत अन्य लोगों को मोटी रिश्वत देने का आरोप था। हाई कोर्ट ने कहा है कि राजीव गांधी ने रिश्वत ली थी, इसका कोई सबूत नहीं है।

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