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कमल पर दिखेगी अब कलह का कीचड़

दिल्ली की हार से भले सतह पर न आया हो पर बिहार की हार के बाद भारतीय जनता पार्टी का अंदरूनी कलह दबा-ढका नहीं रह पाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भले कोई नेता..
Author नई दिल्ली | November 9, 2015 07:34 am
बिहार चुनाव के नतीजे के बाद दिल्ली स्थित भाजपा कार्यालय में पसरा सन्नाटा। (पीटीआई फोटो)

दिल्ली की हार से भले सतह पर न आया हो पर बिहार की हार के बाद भारतीय जनता पार्टी का अंदरूनी कलह दबा-ढका नहीं रह पाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भले कोई नेता सीधे सवाल करने का साहस अभी न जुटा पाए पर उनके हनुमान बने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह निशाने पर जरूर आएंगे। आरएसएस को प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष एक ही राज्य का बनना पहले भी अखरा था पर अब मोहन भागवत इस मुद्दे को तूल दे सकते हैं। राजनाथ सिंह के इस्तीफे के कारण अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष बने थे। भाजपा में संगठन चुनाव की प्रक्रिया पहले से जारी है। संघ की शह पर शाह का विरोधी खेमा उनके पार्टी अध्यक्ष चुने जाने की राह में रोड़े अटका सकता है।

प्रधानमंत्री के बड़े कद के कारण हाशिए पर पहुंचा दिए जाने और उपेक्षा के बावजूद अभी कोई नेता बोल नहीं पा रहा था। लेकिन बिहार की करारी हार ऐसे आतंकित नेताओं को ताकत देगी। संघ प्रमुख के आरक्षण संबंधी बयान से चुनाव में कोई नुकसान नहीं होने की बात कह कर रविवार को रविशंकर प्रसाद ने भले मुद्दे को हल्का करने की कोशिश की हो पर पार्टी में हर कोई मानता है कि इससे विरोधियों को मुफ्त में मुद्दा मिल गया। रक्षात्मक टोन अपनाए लालू और नीतीश अचानक आक्रामक हो गए। संघ प्रमुख ने समीक्षा का बयान बिहार चुनाव के समय ही क्यों दिया, इसे महज संयोग समझने वाले सियासी रूप से नादान कहे जा सकते हैं। सोमवार को पार्टी संसदीय बोर्ड की बैठक बिहार के नतीजों की समीक्षा करेगी। इसके बाद ही सत्ता का संघर्ष तेज होेने के अनुमान लगाए जा रहे हैं।

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लालू की लीला शुरू:
बिहार के चुनाव का असर डेढ़ साल बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है। इन नतीजों से बसपा सुप्रीमो मायावती को ऊर्जा मिलेगी। उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए बिहार से भी ज्यादा अहम है। 80 में से पार्टी ने यहां न केवल 73 सीटें जीती थीं बल्कि खुद नरेंद्र मोदी ने गुजरात छोड़ कर वाराणसी को ही अपनी कर्मस्थली बना लिया। लालू यादव ने घोषणा की है कि वे अब मोदी के लोकसभा क्षेत्र में जाकर ही उनके खिलाफ बिगुल बजाएंगे। विधानसभा चुनाव से पहले लालू यादव को सियासी हाशिए पर एक चुके हुए नेता के नाते आंका जा रहा था। लोकसभा चुनाव में उन्हें महज चार सीटों पर सफलता मिल पाई थी। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि लालू यादव की बिहार में अनदेखी नहीं की जा सकती।

कांग्रेस में प्राण, सपा की गई जान:
बिहार में कांग्रेस तो लगभग मरणासन्न हालत में थी। महागठबंधन में शामिल होने का उसे सबसे ज्यादा फायदा हुआ है। अब बिहार की राजनीति में उसके भी मायने होंगे। मुलायम सिंह यादव भी महागठबंधन से अलग अपना तीसरा मोर्चा बना कर मोदी का तो कोई भला नहीं कर पाए पर अपनी लुटिया जरूर डुबो ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में उनका मुसलमान वोटबैंक खिसक कर बसपा के साथ चला जाए तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

जहां तक भाजपा के अंदरूनी असंतोष का सवाल है, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृहमंत्री राजनाथ सिंह व उद्यम मंत्री कलराज मिश्र जैसे बड़े नेता अभी तक खामोश थे पर वे अब पार्टी में टोका-टाकी जरूर करेंगे। गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनने से आयकर जांच के बहाने रोकने वाले नेताओं को अब चौकस हो जाना चाहिए। केवी चौधरी को इन्हीं नेताओं ने मुख्य सतर्कता आयुक्त बनवाया। मोहन भागवत के जरिए गडकरी अब अपना पुराना हिसाब चुकाना चाहेंगे।

बिहारियों को ‘शत्रु’ सलाम:
शत्रुघ्न सिन्हा तो पहले से ही असंतुष्ट चल रहे थे, अब नतीजे आते ही चंदन मित्र के तेवर भी तीखे हो गए। जो न केवल राज्यसभा के सदस्य रहे हैं बल्कि पार्टी के अहम पदों पर भी रह चुके हैं। इससे पहले अरुण शौरी ने मोदी के खिलाफ बयान दिया था तो मोदी के प्रति भक्तिभाव दिखाने के चक्कर में कुछ छुटभैए नेताओं ने खींसें निपोरी थीं कि पद न मिलने की हताशा में शौरी यह कर रहे हैं। सिन्हा ने तो महागठबंधन की जीत को लोकतंत्र की जीत करार दिया और पार्टी के शीर्ष नेताओं पर यह कहते हुए कटाक्ष किया कि बिहारी के मुकाबले बाहरी के मुद्दे का हमेशा के लिए समाधान हो गया है। पटना सहिब से भाजपा के सांसद सिन्हा ने एक अन्य ट्वीट में पार्टी नेतृत्व को सलाह भी दे डाली कि आत्मावलोकन, परिवर्तन, भविष्य में बेहतर रणनीति, टीमवर्क और समन्वय आज के दिन की मांग है। एक बार फिर बिहारियों को सलाम।

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असादुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआइएमआइएम के चुनाव में कूदने से लग रहा था कि इससे महागठबंधन को नुकसान होगा और उसके अल्पसंख्यक वोट बंटेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चुनाव में जहां तक विजय दर की बात है तो लालू प्रसाद की पार्टी राजद हर दस में से आठ सीटों पर विजयी हुई है जबकि भाजपा के प्रत्येक तीन उम्मीदवारों में से सिर्फ एक जीत सका है। बिहार चुनाव के नतीजों का विश्लेषण दर्शाता है कि भाजपा की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्यूलर) इस मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले हैं। वे पांच चरणों में तकरीबन सात फीसद और चार फीसद सीट जीतने में कामयाब रहे हैं।

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