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दिल्‍ली में 18 तो असम में 3 बार प्रचार के लिए गए मोदी, जानें बीजेपी ने कैसे बदली जीत की स्‍ट्रैटिजी

दिल्‍ली में मोदी ने आप लीडरशिप पर सीधा हमला बोला था। इसके अलावा, स्‍थानीय बीजेपी यूनिट को नजरअंदाज करते हुए किरण बेदी को बतौर सीएम कैंडिडेट पार्टी पर थोप दिया गया।
Author गुवाहाटी | May 20, 2016 13:05 pm
पार्टी ने चुनाव प्रचार में केंद्रीय नेतृत्‍व का बेहद कम इस्‍तेमाल किया।

असम चुनाव में बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है। हाल ही में बि‍हार और उससे पहले दिल्‍ली चुनाव में पार्टी को जो करारी शिकस्‍त मिली है, उसे देखते हुए इन नतीजों से पार्टी को कुछ राहत मिल सकती है। पार्टी के रणनीतिकारों का कहना है कि उन्‍होंने असम में वो रणनीति नहीं अपनाई, जो उन्‍होंने हाल के वक्‍त में दिल्‍ली और बिहार चुनाव में अपनाया।

पार्टी ने चुनाव प्रचार में केंद्रीय नेतृत्‍व का बेहद कम इस्‍तेमाल किया। पीएम नरेंद्र मोदी हों या पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह, दोनों ने सिर्फ तीन-तीन बार राज्‍य का दौरा किया। जिम्‍मेदारियां तय करने से लेकर टिकट बंटवारे तक के लिए स्‍थानीय लीडरशिप से सलाह मशविरा किया गया। इसके अलावा, पार्टी ने निगेटिव कैंपेनिंग से भी किनारा किया। देखा जाए तो तो हर उस गलती को दोहराया नहीं गया, जो दिल्‍ली और बिहार में की गई।

दिल्‍ली में मोदी ने आप लीडरशिप पर सीधा हमला बोला था। इसके अलावा, स्‍थानीय बीजेपी यूनिट को नजरअंदाज करते हुए किरण बेदी को बतौर सीएम कैंडिडेट पार्टी पर थोप दिया गया। वहीं, बिहार में केंद्रीय मंत्रियों ने पूरे चुनाव के दौरान राज्‍य में कैंपिंग की और अभियान पर नजर रखी। खुद मोदी ने 18 बार दौरा किया।

असम की बात करें तो मोदी और शाह के अलावा राजनाथ दो बार, जबकि अरुण जेटली और सुषमा स्‍वराज ने एक-एक बार दौरा किया। मोदी ने पहली बार असम के मुस्‍ल‍िमों को उस वक्‍त खुले तौर पर धार्मिक अपील की, जब उन्‍होंने सऊदी अरब के दौरे से लेकर वर्ल्‍ड सूफी फोरम में खुद की भागेदारी के बारे में बातें की।

बीजेपी महासचिव राम माधव से जब पूछा गया कि उन्‍होंने राज्‍य में अलग क्‍या किया, उनका जवाब था-हर चीज। उन्‍होंने कहा, ‘कांग्रेस हमें लगातार गैर स्‍थानीय मुद्दों मसलन-केंद्र सरकार के प्रदर्शन की ओर खींचती रही। हम विकास के मुद्दे पर केंद्रित रहे। असमी पहचान और गैरकानूनी अप्रवास पर। जीत की धुरी राज्‍य की लीडरशिप है। हमारे सभी सांसदों ने पूरी कोशिश की कि उनके संबंधित संसदीय इलाकों में पार्टी बेस्‍ट परफॉर्मेंस दे। हमने एक सपने सरीखा गठबंधन किया और चुनाव में अकेले जाने की गलती नहीं की। हमने एक गलती भी नहीं की।’

सूत्रों का कहना है कि चुनावी कैंपेन में आरएसएस और बीजेपी की बीच धीरे-धीरे दूरियां बढ़ीं। उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों के मुताबिक, आरएसएस बीजेपी और असम गण परिषद के बीच गठबंधन के खिलाफ थी। इसके अलावा, वो प्रत्‍याशियों के चुनाव से इतनी नाखुश थी कि उसने सात सीटों पर निर्दलीय कैंडिडेट खड़े कर दिए। इनमें से एक गुवाहाटी सीट भी शामिल है। बीजेपी के एक सीनियर नेता ने कहा कि इस मुद्दे को आंतरिक तरीके से निपटाया जाएगा। पार्टी के अंदर के कुछ लोगों ने कहा कि असम की जीत आरएसएस और बीजेपी के आपसी रिश्‍तों में बदलाव लाएगी। साथ ही शाह और मोदी की पार्टी के मुद्दों पर पकड़ बढ़ेगी।

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