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IRCTC: बायोडाइजेस्टर शौचालय कर सकते हैं रेलवे को स्वच्छ

देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के प्रयास के बीच आये एक शोध में कहा गया है कि ट्रेनों में ‘बायोडाइजेस्टर शौचालय’ लगाने के जटिल कार्य की सफलता रेलवे को स्वच्छ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
Author नई दिल्ली | October 12, 2016 12:06 pm
(Pic- Go Green Solutions

देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के प्रयास के बीच आये एक शोध में कहा गया है कि ट्रेनों में ‘बायोडाइजेस्टर शौचालय’ लगाने के जटिल कार्य की सफलता रेलवे को स्वच्छ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। गांंधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा हाल में प्रकाशित किताब ‘जल थल मल’ के अनुसार, ‘रेल की पटरी पर शौच निस्तारण को लेकर न्यायालय अक्सर अधिकारियों को फटकार लगाता है। लेकिन समाज में फैली विषमताओं के चलते निकट भविष्य में हर किसी को शौचालय मुहैया होना नामुमकिन है। कई सालों के भरसक कोशिशों के बाद भी ऐसा होना आसान नहीं होगा, चाहे इसमें कितने ही हजार करोड़ रूपये डाल दिये जाएं।….पटरी के किनारे बैठे व्यक्ति के अलावा ट्रेन के अंदर बैठे व्यक्ति भी इसका स्त्रोत हैं।’ किताब के मुताबिक, ‘अगर हर रोज 160 लाख लोग लंबी दूरी की रेलगाड़ी में सफर करते हैं और एक दिन में एक मनुष्य 200 से 400 ग्राम मल पैदा करता है तो 20 से 40 लाख मल हर रोज पटरियों पर गिराया जाता है। जो कोई भी रेलगाड़ी में शौच जाता है वह हाथ से मैला साफ करवाने की कुरीति को बढ़ावा तो देता ही है।’


सोपान जोशी की शोध आधारित किताब में आगे कहा गया है कि डिब्बों में बने शौचालयों की नाली की बनावट को बदलने के लिए लगभग 40 साल से कोशिश हो रही हैं।…भारतीय रेल की समस्या दूसरे देशों से एकदम अलग है, क्योंकि हमारे यहां पानी का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि, किताब में बताया गया है कि अंटार्कटिका में पाये जाने वाले बिना आक्सीजन के जीवित रहने वाले बैक्टीरिया की खोज डीआरडीओ के वैज्ञानिक लोकेंद्र सिंह ने एवरेस्ट के प्रदूषण को समाप्त करने के लिए की। यहां से ही भारतीय रेल के लिए ‘बायोडाइजेस्टर शौचालय’ बनाने का विकल्प सामने आया, क्योंकि हमारे पेट में इस तरह के बैक्टीरिया बसते हैं और उनके बिना हम भोजन नहीं पचा सकते।

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