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बिहार चुनाव में एनडीए को बढ़त

मतदान से एक हफ्ता पहले एनडीए को महागठबंधन पर स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में द इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के लिए विशेष..
Author नई दिल्ली | October 7, 2015 08:01 am

मतदान से एक हफ्ता पहले एनडीए को महागठबंधन पर स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में द इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के लिए विशेष रूप से ‘लोकनीति’ और ‘सीएसडीएस’ के जरिए कराए गए चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को महागठबंधन के मुकाबले कम से कम चार प्रतिशत की बढ़त मिल रही है। हमारे सर्वेक्षण (पद्धति के लिए ब्योरा देखें) के मुताबिक अगर सितंबर के आखिरी हफ्ते में चुनाव हुए होते तो एनडीए को बयालीस प्रतिशत वोट मिलते और महागठबंधन को अड़तीस प्रतिशत।

समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाला तीसरा मोर्चा और पप्पू यादव कोई भी असर डालते हुए नहीं दिख रहे हैं। यहां तक कि ‘वोटकटवा’ के रूप में भी वे कहीं नहीं हैं। नतीजों के मुताबिक, वामपंथी पार्टियों और बसपा की स्थिति में और गिरावट आएगी और ओवैसी की पार्टी एमआइएम शायद ही कोई असर डाल पाए। लेकिन ऐसी संभावना है कि अपने प्रचार अभियान से वह कुछ मुसलिम वोट खींच ले।

क्या कोई तय स्वरूप है:

दोनों गठबंधनों के समर्थकों का सामाजिक वर्ग बिल्कुल साफ दिखता है। उम्मीद के मुताबिक, एनडीए को सवर्ण जातियों, अति पिछड़ी जातियों और दलितों के एक हिस्से, खासतौर पर पासवान समुदाय का समर्थन हासिल है। इसके उलट महागठबंधन बहुत हद तक यादव, कुर्मी-कोइरी और मुसलमानों के समर्थन पर निर्भर है। लेकिन इस सामाजिक विभाजन के अलावा एक स्थानीय विभाजन भी इस चुनाव की खासियत होगा। शहरी इलाकों में एनडीए को महागठबंधन पर भारी बढ़त मिलती दिख रही है, जबकि ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में महागठबंधन एनडीए को कड़ी टक्कर दे रहा है।

सर्वेक्षण के मुताबिक, शहरी इलाकों की सीटों पर एनडीए को महागठबंधन पर बीस प्रतिशत वोटों की बढ़त मिलेगी, जबकि ग्रामीण इलाकों में महज दो प्रतिशत की मामूली बढ़त दिखती है। तिरहुत, मिथिला और पूर्वी सीमांचल के इलाकों में महागठबंधन अच्छा प्रदर्शन करता दिख रहा है, जबकि भोजपुर और मगध क्षेत्र में एनडीए काफी आगे है।

महागठबंधन पीछे क्यों:

इससे पहले के सर्वेक्षण में यह कहा गया था कि चुनावी गणित महागठबंधन के पक्ष में दिखता है, लेकिन यह अनिवार्य रूप से सच में तब्दील नहीं भी हो सकता है। अब अनुसूचित जाति के मतदाताओं के बीच एनडीए को महागठबंधन पर भारी बढ़त (32 प्रतिशत के मुकाबले 55 प्रतिशत) दिखती है। यहां तक कि महागठबंधन के ठोस समर्थक समूह यादव, कुर्मी और कोइरी के बीच भी हर दस में दो मतदाता एनडीए का समर्थन कर रहे हैं।

यह स्थिति महागठबंधन के अपने निश्चित वोटरों के बीच उसके समर्थन को सीमित करती है। इसमें मुसलिम मतदाता भी शामिल हैं। चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण के मुताबिक महागठबंधन को 52 प्रतिशत मुसलमानों का समर्थन हासिल है और 39 प्रतिशत मुसलमान दोनों गठबंधनों के अलावा किसी और विकल्प की ओर देख रहे हैं।

महागठबंधन के घटक दल इसमें ज्यादा कुछ नहीं जोड़ रहे हैं। कांग्रेस जहां केवल चंद शहरी इलाकों में सिमटी हुई दिखती है, राजद एक बोझ साबित हो सकता है।

लालू राज को ‘जंगलराज’ कह कर चलाए गए भाजपा के अभियान को आम मतदाताओं के बीच समर्थन मिला है, जो महागठबंधन की उम्मीदों को नुकसान पहुंचा रहा है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद के लिए अब भी बाकी सभी नेताओं के मुकाबले ज्यादा लोकप्रिय और सबसे आगे हैं, लेकिन गठबंधन के लिए वोट जुटाने की जिम्मेदारी करीब-करीब अकेले उन पर ही है। उनकी निजी अपील शायद काफी साबित नहीं हो।

फिलहाल एनडीए आगे क्यों:

दूसरी ओर, भाजपा को सत्ता में आए अभी सिर्फ अठारह महीने हुए हैं, इसलिए उसके गठबंधन को कुछ स्वाभाविक फायदे हैं। मोदी लोकप्रिय हैं और अच्छी-खासी संख्या में मतदाता इस खयाल से उनका समर्थन करते दिखते हैं कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी का सत्ता में होना राज्य के विकास में मददगार होगा। भाजपा के सहयोगी, खासकर पासवान और मांझी एनडीए के लिए दलितों का समर्थन लाएंगे। अति-पिछड़ी जातियों का लगभग आधा हिस्सा एनडीए का समर्थन करेगा। सबसे अहम यह है कि अगड़ी जातियों के बीच इसके समर्थन में अभूतपूर्व ध्रुवीकरण (लगभग 80 प्रतिशत) एनडीए को मजबूत करेगा।

अगड़ी जातियों और अति-पिछड़ी जातियों के साथ दलितों का शामिल होना एनडीए के समर्थन को वर्ग के लिहाज से भी ज्यादा संतुलित बना रहा है। एनडीए आर्थिक गणित के पायदान पर आधे से नीचे खड़े लोगों के 40 प्रतिशत और आधे से ऊपर के 46 प्रतिशत का समर्थन खींच रहा है। इसके उलट, इस कसौटी पर महागठबंधन को आधे से ऊपर के महज 30 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं, लेकिन आधे से नीचे खड़े लोगों के बीच से वह 42 प्रतिशत से ज्यादा समर्थन हासिल करने में नाकाम है।

भाजपा को फायदे की सीमा:

एक लंबे और कई चरणों में होने वाले चुनाव में एक खास इलाके में किसी के आगे चलने से संबंधित ‘खबरें’ उस इलाके में बाद के चरणों में होने वाले मतदान के राजनीतिक मिजाज पर असर डालता है। हालांकि बिहार में कोई स्थिर राय रखने वाले वोटर संख्या में बहुत नहीं हैं, फिर भी अगर दूसरे इलाकों में किसी खास गठबंधन को समर्थन मिलता है तो इसका असर उन पर पड़ेगा।

चार प्रतिशत के अंतर के साथ एनडीए को आसानी से आगे निकल जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ कुछ तथ्यों का उल्लेख जरूरी है।

पहला, सर्वेक्षण में लोगों ने अपनी पसंद के संकेत तब दिए थे, जब वे उम्मीदवारों को नहीं जानते थे। उम्मीदवारों के चयन में जाति के तत्त्व का सूक्ष्म-प्रबंधन बहुत महत्त्व रखता है।

दूसरा, भाजपा और एनडीए का सुहाना दिखने वाला समर्थन आमतौर पर शहरी विधानसभा क्षेत्रों में केंद्रित है। इसलिए 42 प्रतिशत का आंकड़ा इस अर्थ में भ्रामक हो सकता है कि वे वोट एनडीए की जीत वाली सीटों में अनिवार्य रूप से कुछ खास नहीं जोड़ें।

तीसरा, एक कड़वाहट से भरा चुनाव अभियान अब जाकर शक्ल ले रहा है। इसका असर मतदाताओं पर पड़ेगा। सर्वेक्षण में भागीदार 10 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे अपना अभी का चुनाव बदल भी सकते हैं। एनडीए समर्थकों के बीच रुख बदलने वाले ऐसे ‘संभावित’ लोगों की तादाद 12 प्रतिशत है और महागठबंधन का समर्थन करने वालों के बीच यह आंकड़ा 8 प्रतिशत है। इसलिए, चुनाव से पहले के रुझानों को केवल रुझान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, किसी नतीजे की तरह नहीं।
(लेखक लोकनीति व सीएसडीएस से जुड़े हैं)

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  1. P
    Prem
    Oct 7, 2015 at 12:07 pm
    शाकाहार और बीफ की लड़ाई में शाकाहार ही जीतेगा...चुनाव जीतने के लिए लोग क्या क्या करते हैं..बड़े बेटे की उम्र छोटी हो जाती हैः और छोटे बेटे की उम्र बड़ी...ताज्जुब है की यादव लालू को वोट दें..एक सच्चा यादव या सच्चा हिन्दू बीफ कभी नहीं खा सकता...और लालू ने कितने यादव समाज का भला किया है आज तक.
    (1)(0)
    Reply
    1. B
      BHARAT
      Oct 7, 2015 at 12:35 pm
      लालू ने यादवो का सिर्फ इतना भला किया है, खुद का भला किया खुद यादव(?) है
      (0)(0)
      Reply
      1. B
        BHARAT
        Oct 7, 2015 at 10:24 am
        हो गया दूध का दूध, और बीफ का बीफ..
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        Reply
        1. N
          Naveen Bhargava
          Oct 7, 2015 at 1:44 pm
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          Reply