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बॉम्बे हाईकोर्ट ने मांस बिक्री के प्रतिबंध पर लगाई रोक, मछली-अंडे पर किया सवाल

जैन फेस्टिवल के चलते मीट बैन को लेकर जारी गतिरोध में हाल ही बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला आया है। कोर्ट के ताजा फैसले में कहा गया है कि 17 सितंबर को मीट की बिक्री होगी।
Author मुंबई | September 14, 2015 17:56 pm
Meat Ban पर बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला, कहा 17 सितंबर को बिकेगा मटन

बांबे उच्च न्यायालय ने आज मुंबई में 17 सितंबर को जैन समुदाय के पर्यूषण पर्व के मद्देनजर मांस की बिक्री पर लगे विवादास्पद प्रतिबंध पर रोक लगा दी और साथ ही सवाल किया कि केवल मटन और चिकन पर ही प्रतिबंध क्यों, मछली और अंडे पर क्यों नहीं?

अदालत ने प्रतिबंध पर सवाल लगाते हुए कहा, ‘‘यदि यह जैन समुदाय द्वारा अहिंसा का पालन किए जाने का सवाल है तो केवल मटन और चिकन को ही प्रतिबंध में शामिल क्यों किया गया है , मछली और अंडों को क्यों नहीं ?’’ इस मुद्दे ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है जिसमें लोगों की खानपान की आदतों में घुसपैठ को लेकर सवाल किए जा रहे हैं।

जैन समुदाय के ‘पर्यूषण’ पर्व के मद्देनजर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली बांबे मटन डीलर्स द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यह रोक मुंबई न्यायाधिकार क्षेत्र तक सीमित रहेगी।

हालांकि इसी प्रकार का प्रतिबंध मुंबई के समीपवर्ती ठाणे जिले में मीरा भयंदर और नवी मुंबई नगर निगमों में लगाया गया है लेकिन अदालत ने कहा कि यह रोक इसके बारे में नहीं है ‘‘क्योंकि उस क्षेत्र से किसी ने प्रतिबंध को चुनौती नहीं दी है।’’

न्यायाधीश अनूप वी मोहता और अमजद सैयद की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘हम 17 सितंबर को मांस की बिक्री पर प्रतिबंध पर रोक लगा रहे हैं लेकिन हम उस दिन पशु वध पर प्रतिबंध एवं बूचड़खानों को बंद रखने के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं।’’

उच्च न्यायालय ने इस बात को भी रेखांकित किया कि महाराष्ट्र सरकार ने दो दिन मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए वर्ष 2004 में एक सर्कुलर जारी किया था लेकिन इसे कभी पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘हालांकि 2004 से प्रतिबंध है लेकिन इसे सही मायनों में कभी लागू नहीं किया गया।’’

शुरुआत से ही इस मुद्दे पर कड़ा आलोचनात्मक रवैया रखने वाली अदालत ने कहा कि वृहन मुंबई नगर निगम (एमसीजीएम) और राज्य सरकार के रुख में निरंतरता नहीं रही है। राज्य सरकार ने सात सितंबर 2004 को एक सर्कुलर जारी कर कहा था कि जैन समुदाय के ‘पर्यूषण’ के दौरान दो दिन के लिए बूचड़खाने बंद रहेंगे और मांस की बिक्री तथा पशु वध पर प्रतिबंध रहेगा।

अदालत ने कहा, ‘‘हालांकि सर्कुलर 2004 का था, हम पूरी तरह स्पष्ट हैं कि एमसीजीएम ने कभी मांस की बिक्री पर प्रतिबंध को पूरी तरह लागू नहीं किया। इसने कभी मांस की बिक्री पर प्रतिबंध पर जोर नहीं दिया लेकिन केवल बूचड़खानों को बंद रखने पर जोर दिया।’’

जजों ने आगे कहा, ‘‘हम केवल कानून के अनुसार चल रहे हैं और इस मामले में भावनाओं और राजनीतिक चीजों के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं।’’ इसके साथ ही अदालत ने याचिका पर चार सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई की तारीख तय कर दी।

एमसीजीएम ने 13 और 18 सितंबर को मांस की बिक्री पर प्रतिबंध और बूचड़खानों को बंद रखने की घोषणा की थी लेकिन राज्य सरकार ने इसे 10 और 17 सितंबर को भी प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन नगर निकाय ने अपनी निर्वाचिन परिषद की आपात बैठक में प्रस्ताव पारित कर पिछले सप्ताह इस प्रतिबंध को वापस ले लिया था और अपने फैसले के बारे में उच्च न्यायालय को सूचित किया था।

भाजपा को छोड़कर शिवसेना समेत सभी प्रमुख पार्टियों ने प्रतिबंध की आलोचना की थी। एमसीजीएम में शिवसेना प्रमुख सत्ताधारी पक्ष है। शिवसेना के साथ ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना दस सितंबर को प्रतिबंध का उल्लंघन करते हुए सड़कों पर उतर आयी थी।

अदालत ने मांस की बिक्री पर प्रतिबंध पर रोक लगाते हुए यह भी सवाल किया कि जैन समुदाय क्यों केवल कुछ ही दिनों में अहिंसा का पालन करना चाहता है। अदालत ने कहा,‘‘यदि कुछ दिनों पर पशु वध किया जाता है तो आप (जैन) लोगों को कोई समस्या नहीं है। यदि आपके दिमाग में अहिंसा है तो यह वैकल्पिक दिनों की अनुमति क्यों?’’

पीठ ने यह भी कहा कि सरकार को ऐसे फैसलों के बारे में जनता को पहले से बताना चाहिए। ‘‘अंतिम क्षणों में लोगों को पता चलता है और इससे पेचीदगियां पैदा होती हैं। अचानक से प्रतिबंध, विशेष रूप से खान पान की आदतों पर यह सही नहीं है।’’

अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि वह कुछ मुद्दे तय करने जा रही है जिन पर मामले की अंतिम सुनवाई में विचार करना होगा। अदालत ने कहा कि इन मुद्दों में यह शामिल है कि क्या एक शाकाहारी धार्मिक समूह का प्रतिवेदन मांस की बिक्री पर रोक और बूचड़खानों को बंद करने की घोषणा के लिए काफी है , क्या ऐसे प्रतिबंध की घोषणा से पूर्व संबंधित पक्षों की बात नहीं सुनी जानी चाहिए, क्या ऐसी कार्रवाई धर्मो के बीच भेदभाव नहीं है और क्या अहिंसा का पालन करने वाले एक समुदाय की भावनाओं को केवल मांस तक सीमित रखा जा सकता है, मछली और अंडों तक नहीं।

अदालत यह भी विचार करेगी कि क्या इस प्रकार का प्रतिबंध एक महानगर में सही है और क्या यह लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है तथा क्या एक धर्म को दूसरे धर्म पर तरजीह दी जा सकती है।

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