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केजरीवाल को लगा धक्का: सुप्रीम कोर्ट ने 3 हफ्ते में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग करने वाली केंद्र की याचिका पर दिल्ली सरकार से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है
दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश, LG के पास भेजें जाएं नियुक्ति-तबादले के प्रस्ताव

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग करने वाली केंद्र की याचिका पर दिल्ली सरकार से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। हाई कोर्ट के फैसले में आप सरकार की शक्तियों को कम करने वाली अधिसूचना को संदिग्ध कहा गया था। 21 मई की अपनी अधिसूचना में केंद्र ने दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार रोधी शाखा को अपने अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामलों में कार्रवाई करने से रोक दिया था और कहा था कि उपराज्यपाल अपनी मर्जी से काम कर सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश के 25 मई के फैसले पर किसी तरह की रोक नहीं लगाए जाने की बात स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति यूयू ललित के अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि इस चरण में हम रोक लगाने के इच्छुक नहीं हैं और जवाब मिलने के बाद हम इस पर गौर करेंगे।

शीर्ष अदालत ने 25 मई के आदेश में पैराग्राफ 44 और 65 से 67 में की गई टिप्पणियों पर रोक के लिए सालिसिटर जनरल रंजीत कुमार के अनुरोध का जिक्र करते हुए कहा कि चूंकि नोटिस जारी किया जा रहा है, इसलिए तीन हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल होने के बाद रोक लगाने पर विचार किया जाएगा। पीठ ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट केंद्र की 21 मई की अधिसूचना को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की ताजा याचिका पर स्वतंत्र रूप से और एकल न्यायाधीश की ओर से सुनाए गए फैसले में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना सुनवाई करेगा। अधिसूचना के अनुसार सेवाओं, जन व्यवस्था, पुलिस और जमीन से जुड़े मामले उपराज्यपाल के अधिकारक्षेत्र में होंगे और जब भी उन्हें जरूरी लगे, वे अपनी मर्जी से मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि आप सरकार के जवाब के बाद चार हफ्ते के भीतर केंद्र अपना प्रत्युत्तर दाखिल करेगा।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी याचिका में केंद्र ने कहा कि हाई कोर्ट की टिप्पणियों ने अनिश्चितता पैदा कर दी है और इससे राष्ट्रीय राजधानी में रोजमर्रा का प्रशासन मुश्किल हो गया है। केंद्र ने कहा है कि दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच के समीकरण में संतुलन लाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 239 एए की स्पष्ट व्याख्या की जरूरत है।

केंद्र ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक की मांग करते हुए कहा कि यह फैसला उसका पक्ष सुने बिना ही कर दिया गया। इसके साथ ही केंद्र ने इस फैसले को दरकिनार करने के लिए नौ आधार बताए। इनमें एक कारण यह भी बताया गया कि यह फैसला दिल्ली के शासन के नाजुक संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता है और वह भी भारतीय संघ को सुनवाई का अवसर दिए बिना। केंद्र की ओर से उठाए गए अन्य मुद्दों में गृह मंत्रालय ने कहा है कि हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकार की एसीबी की क्षमता से जुड़े मुद्दे पर फैसला सुनाने में गलती की। उन्होंने मौजूदा मामले में शिकायत पर केंद्र को नोटिस जारी किए बिना और उसका पक्ष सुने बिना कार्रवाई करके गलती की।

याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट प्राकृतिक न्याय की मूल शर्त के पालन में विफल रहा है। यह मूल शर्त सुनवाई के अधिकार की है और यह जानने के बावजूद कि यह महत्त्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है, जिसका संबंध केंद्र की कार्यकारी शक्ति से है और इस मुद्दे पर केंद्र की सुनवाई के बिना या उसका रुख जांचे बिना अंतिम फैसला नहीं सुनाया जा सकता, एकल न्यायाधीश ने उसका पक्ष नहीं सुना।

केंद्र ने कहा कि न्यायाधीश को यह ज्ञात है कि मामला एक अन्य पीठ के समक्ष लंबित है लेकिन उन्होंने इसे पहले से देख रहे पीठ के पास भेजने के बजाय इस पर आगे बढ़ने को प्राथमिकता दी। हाई कोर्ट के फैसले पर अपना पक्ष रखते हुए केंद्र ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 239 एए (3) (ए) के तहत दिल्ली विधानसभा को वहीं तक शक्तियां प्राप्त हैं, जहां तक मामला केंद्र शासित प्रदेश से जुड़ा है, इससे इतर नहीं।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का संवैधानिक दर्जा एक राज्य के समान नहीं है और यह अनुसूची एक के भाग दो के तहत संघ का एक केंद्र शासित प्रदेश है। इसकी विधायी शक्तियां संवैधानिक आधार पर सीमित हैं। हाई कोर्ट की टिप्पणियां दिल्ली पुलिस के सिपाही अनिल कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए आई थीं। अनिल कुमार को एसीबी ने गिरफ्तार किया था।

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