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अरविंद केजरीवाल भी मिले प्रणब से, दी हालात की जानकारी

दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अधिकारों को लेकर जारी विवाद मंगलवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दरबार में पहुंच गया। मंगलवार को राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति से उपराज्यपाल नजीब जंग भी मिले और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी मुलाकात की। दोनों ने अपना पक्ष रखा।

दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अधिकारों को लेकर जारी विवाद मंगलवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दरबार में पहुंच गया। मंगलवार को राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति से उपराज्यपाल नजीब जंग भी मिले और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी मुलाकात की। दोनों ने अपना पक्ष रखा।

यह विवाद कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ था, जो अब दूसरे अफसरों की नियुक्ति तक पहुंच चुका है। उपराज्यपाल ने मंगलवार को ही केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की और उन्हें पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया। समझा जाता है कि राजनाथ सिंह बुधवार को इस विवाद के सिलसिले में खुद राष्ट्रपति से मुलाकात कर सकते हैं।


गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात के दौरान उपराज्यपाल ने कार्यवाहक मुख्य सचिव पद पर शंकुतला गैमलिन की नियुक्ति को लेकर आप सरकार के साथ बने गतिरोध के बारे में उन्हें सूचित किया। भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक 15 मिनट की मुलाकात के दौरान जंग ने गृह मंत्री को वरिष्ठ आइएएस अधिकारी गैमलिन की दिल्ली के कार्यवाहक मुख्य सचिव पद पर नियुक्ति से जुड़ी परिस्थिति और इस दौरान अपनाई गई प्रक्रिया की जानकारी दी। दिल्ली सरकार गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत आती है। उपराज्यपाल का कहना है कि उन्हें अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार है और उनकी कोई भी कार्रवाई ‘असंवैधानिक’ नहीं है जैसा कि आप सरकार आरोप लगा रही है।

उधर गृह मंत्रालय की राय है कि उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री को अपने कर्तव्यों का निर्वहन नियमों और संविधान के मुताबिक करना चाहिए। सूत्रों ने बताया कि गृह मंत्रालय ने प्रदेश सरकार के साथ उपराज्यपाल के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बारे में अटार्नी जनरल से कानूनी राय मांगी है। जबकि दिल्ली सरकार ने भी बड़े वकीलों से इस मामले में राय ली है। प्रख्यात वकीलों राजीव धवन और इंदिरा जयसिंह ने केजरीवाल सरकार के रुख का पक्ष लेते हुए कहा बताते हैं कि उपराज्यपाल के पास इस मामले में कोई स्वतंत्र विवेकाधिकार नहीं है। धवन ने अपने पत्र में कहा है कि मुख्यमंत्री को अपनी पसंद का मुख्य सचिव रखने का अधिकार है और उपराज्यपाल ने समस्या पैदा की है।

दिल्ली सरकार को लिखे पत्र में धवन ने कहा है कि 40 घंटे गुजर जाना उपराज्यपाल के लिए मुख्यमंत्री पर अपनी पसंद थोपने का पर्याप्त कारण नहीं है, खास कर तब जब उनके तात्कालिक अधिकारों की बात तब ही उत्पन्न होती हो जब संदर्भ केंद्र सरकार के समक्ष लंबित हो। उन्होंने कहा कि मुख्य सचिव की नियुक्ति को लेकर राज्यपाल मुख्यमंत्री को सलाह दे सकते हैं। धवन ने अपनी राय में कहा कि यह बिल्कुल साफ है कि उपराज्यपाल अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ गए और उन्होंने अपने व मंत्रिपरिषद के संबंधों को उस दिशा में मोड़ दिया जहां लोकतंत्र और संविधान के लिए मुश्किल होती है।

धवन की तरह ही इंदिरा जयसिंह ने भी दिल्ली सरकार के नजरिए का पक्ष लिया है। वे मानती हैं कि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे उपराज्यपाल को मुख्य सचिव की नियुक्ति के मामले में स्वविवेक से काम करने का अधिकार मिलता हो। मुख्य सचिव की नियुक्ति के प्रस्ताव पर नियमों के मुताबिक सरकार को पहल करनी चाहिए। इस मुद्दे पर विचारों में मतभेद का सवाल तब ही उठता है जब मंत्रिपरिषद प्रस्ताव तैयार करे और उपराज्यपाल के पास भेजे। इससे पहले विचारों में मतभेद का सवाल ही नहीं उठ सकता।

जयसिंह के मुताबिक संविधान की लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुख्य सचिव की नियुक्ति के मामले में उपराज्यपाल के पास कोई स्वतंत्र विवेकाधिकार नहीं है। मुख्य सचिव के पद पर किसे नियुक्त किया जाए, यह फैसला केवल मंत्रिपरिषद का होना चाहिए और अगर उपराज्यपाल के विचार इस निर्णय पर अलग हैं तो उनकी भूमिका शुरू होती है। इसलिए मंत्रिपरिषद के फैसले का इंतजार किए बिना, उपराज्यपाल के लिए यह निर्णय करने का सवाल ही नहीं उठता कि मुख्य सचिव किसे नियुक्त किया जाए।

उपराज्यपाल नजीब जंग के साथ मुख्य सचिव की नियुक्ति पर टकराव के बीच आप सरकार ने सोमवार को अपने सभी अधिकारियों को, उपराज्यपाल से मिले मौखिक या लिखित आदेशों के बारे में उनका पालन करने से पहले मुख्यमंत्री, संबद्ध मंत्री या उनके कार्यालय को सूचित करने के लिए कहा था। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में कहा गया है कि मुख्य सचिव सहित सभी नौकरशाहों को उप राज्यपाल से मिले किसी भी निर्देश पर अमल करने से पहले, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों से परामर्श करना होगा।

इस बीच भाजपा और दिल्ली सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी तेज हो गया है। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उपराज्यपाल जंग प्रशासन को अपने हाथों में लेने का प्रयास कर रहे हैं। उधर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करते हुए मंगलवार को दिल्ली की आप सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि चुनाव में दिल्ली के लोगों ने एक नई पार्टी के साथ प्रयोग किया। लेकिन यह काफी महंगा प्रयोग रहा क्योंकि शासन उनके एजंडे में नहीं है।

उधर अपने रुख पर कायम रहते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक कदम भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे। अलबत्ता वे इस लड़ाई पर सीधे केंद्र सरकार को चुनौती देने के मूड में हैं। केजरीवाल ने मुखर्जी से मुलाकात के बाद जो तेवर अपनाए उससे यही संकेत मिलता है। उन्होंने बताया- हमने राष्ट्रपति को बताया कि उपराज्यपाल इस प्रकार बर्ताव कर रहे हैं जैसे दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा हो।

उनके उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने कहा कि उनसे सलाह किए बिना कार्यवाहक मुख्य सचिव को नियुक्त करने के उपराज्यपाल के फैसले को उन्होंने स्वीकार कर लिया लेकिन इसके बाद भी उपराज्यपाल दिल्ली सरकार को अनदेखा कर अधिकारियों की नियुक्ति किए जा रहे हैं। वे सीधे नौकरशाहों को आदेश दे रहे हैं और उनकी अनुपालना नहीं होने पर उन्हें धमका भी रहे हैं। सिसोदिया ने मुखर्जी के साथ मुलाकात को अच्छा बताते हुए कहा, ‘हमने उनसे अनुरोध किया कि उपराज्यपाल से कहें कि वह जो कर रहे हैं, नहीं करें। राष्ट्रपति ने ध्यान से हमारी बात सुनी और मुझे उम्मीद है कि वह इस मामले में देखेंगे।’

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