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दुनिया से अलविदा अरुणा शानबाग रहेंगी यादों में

42 बरस तक अचेत रही किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग सोमवार को इस दुनिया से चली गर्इं। उनके जाने से केईएम अस्पताल की नर्सों की दुनिया में सूनापन समा गया। अब वह सहकर्मी नर्सों की यादों में बसी रहेंगी। यहां के 4-ए वार्ड के पास बने कमरे को उनकी यादों के तौर पर सहेजा जाएगा। अस्पताल प्रशासन ने इस पर कोशिश शुरू कर दी।
Author May 20, 2015 10:56 am
मुंबई के केईएम अस्पताल का वह विशेष कमरा जहां अरुणा शानबाग ने 42 साल गुजारे। (फोटो : वसंत प्रभु)

42 बरस तक अचेत रही किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग सोमवार को इस दुनिया से चली गर्इं। उनके जाने से केईएम अस्पताल की नर्सों की दुनिया में सूनापन समा गया। अब वह सहकर्मी नर्सों की यादों में बसी रहेंगी। यहां के 4-ए वार्ड के पास बने कमरे को उनकी यादों के तौर पर सहेजा जाएगा। अस्पताल प्रशासन ने इस पर कोशिश शुरू कर दी।

अस्पताल के डीन अविनाश सुपे का कहना है कि अरुणा की यादों को सहेजने को लेकर अस्पताल प्रशासन जल्द ही मुंबई महानगरपालिका आयुक्त से बातचीत करेगा। सोमवार को अरुणा के निधन के बाद उनके कमरे में ताला लगा दिया गया। इससे पहले अस्पताल ने तलघर स्थित उस कमरे को भी कई सालों तक तालाबंद रखा था जहां अरुणा के साथ नवंबर 1973 की रात एक दरिंदे ने बलात्कार किया था। लगभग तीन दशकों बाद तलघर एक ट्रस्ट को दे दिया गया था जहां मरीजों के रिश्तेदारों के रहने व्यवस्था की जाने लगी।

दरअसल केईएम अस्पताल की नर्सों और अरुणा के बीच एक अनाम रिश्ता बन गया था। इन 42 सालों में अरुणा अस्पताल की नर्सों के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी थीं। अरुणा की पसंद-नापसंद के मुताबिक ये नर्सें गाहे-बगाहे घर से अरुणा के लिए मछली करी बनाकर लाया करती थीं। अरुणा के निधन के बाद चाहे दुनिया अपनी गति से चल रही हो, इन नर्सों की दिनचर्या में अरुणा की कमी महसूस होने लगी है।

आज अरुणा चाहे ना हों, मगर उनकी हंसी केईएम की नर्स प्रतिभा प्रभु की यादों से शायद निकल ना पाए, जो उनकी पसंद की मछली बनाकर ले जाया करती थीं। जब नर्सों को फुरसत मिलती थी, वे अरुणा के साथ गपशप करने की कोशिश करती थीं और अरुणा प्रतिक्रिया भी दे देती थीं। सुबह अरुणा के कमरे में चार नर्सें रहती थीं। दोपहर और रात को दो-दो नर्सें अरुणा की देखभाल के लिए रहती थीं। अरुणा को खुश रखने के लिए उनके कमरे में अगरबत्ती लगाई जाती थी और कुछ दिनों के अंतराल के बाद परदे भी बदले जाते थे।

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केईएम की नर्सों की अलग ही दुनिया थी, जिसके बारे में अस्पताल के पूर्व डीन डॉ संजय ओक का मानना है कि केईएम की नर्सें इस बात का उदाहरण हैं कि नर्सों को कैसा होना चाहिए। नर्सों और अरुणा के बीच स्नेह का एक अनूठा बंधन बंध गया था। यही कारण था लेनी कॉर्नेलिया अपने रिटायरमेंट के दिन अरुणा को बताकर जाती हैं कि वे उनसे रोज नहीं मिल पाएंगी। मगर अरुणा के जन्मदिन एक जून पर जरूर मिलने आएंगी। केईएम की नर्सें हर साल अरुणा का जन्मदिन मनाती थीं और 1 जून को अरुणा का 68वां जन्मदिन मनाने की तैयारियां भी की जा रही थीं।

अस्पताल की एक नर्स के मुताबिक, एक दौर चाहे खत्म हो गया हो मगर अरुणा की मौत के बाद ऐसा खालीपन पैदा हो गया है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ज्योति श्रीवास्तव आज 62 साल की हैं, मगर नर्स की ड्यूटी के अपने पहले दिन को नहीं भूली है। उसी दिन अरुणा से उनकी मुलाकात हुई थी और अरुणा के बारे में उन्हें बताया गया था कि वे बहुत खूबसूरत हैं। संजीवनी जाधव के लिए अरुणा एक छोटी-सी बच्ची थी, जिससे नर्सों को लगाव हो गया था। इतना लगाव तो सोमवार को अस्पताल प्रशासन के आह्वान पर आई अरुणा की छोटी बहन श्यामला को भी अपनी बहन से नहीं होगा।

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हालांकि कर्नाटक में रहने वाली श्यामला भी अपनी बहन को दिल से नहीं निकाल पाईं। आर्थिक अभाव के चलते श्यामला और मुंबई में रहनेवाली उनकी बहन शांता अरुणा की देखभाल करने में असमर्थ थीं, लिहाजा वे अरुणा को घर नहीं ले गईं। परिवार की गरीबी के चलते ही अरुणा कर्नाटक से कामकाज करने के लिए मुंबई आई थीं और 1967 से केईएम के सर्जरी विभाग में काम करने लगी थी।

गणेश नंदन तिवारी

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