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अपनों की खरी-खरी सहने का भी माद्दा नहीं भाजपा नेताओं में

भारतीय जनता पार्टी के नेता सत्ता के मद में चूर नजर आ रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की लानत-मलानत की कोशिश का निहितार्थ तो यही है। अरुण शौरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशासनिक और राजनीतिक क्षमता व ईमानदारी के पुराने प्रशंसक रहे हैं।
अरुण शौरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशासनिक और राजनीतिक क्षमता व ईमानदारी के पुराने प्रशंसक रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी के नेता सत्ता के मद में चूर नजर आ रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की लानत-मलानत की कोशिश का निहितार्थ तो यही है। अरुण शौरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशासनिक और राजनीतिक क्षमता व ईमानदारी के पुराने प्रशंसक रहे हैं। लेकिन मोदी सरकार के बारे में उन्होंने साफगोई से टिप्पणी क्या कर दी, भाजपा के नेता आपा खो बैठे। ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने तो हास्यास्पद बयान दे डाला कि शौरी की टिप्पणी पद नहीं मिलने की झुंझलाहट लगती है।

पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी शौरी पर हमला करते वक्त न उनकी वरिष्ठता का लिहाज किया और न बेदाग व्यक्तित्व का। उन्होंने तो शौरी की तुलना उन नेताओं से कर डाली जो केवल अच्छे वक्त के साथी होते हैं। बताते चलें कि अरुण शौरी ने पत्रकारिता के अपने करिअर को छोड़ कर भाजपा से नाता जोड़ा था। वे वाजपेयी सरकार में मंत्री भी रहे थे। शौरी आर्थिक सुधारों के पक्षधर रहे हैं। इससे पहले वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम जेठमलानी ने भी काले धन के मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरा था तो भाजपाई तिलमिला गए थे।

विरोधियों की आलोचना पर बौखलाहट तो समझ आ सकती है पर अपनों की बेबाक राय को भी नहीं सह पाना पार्टी नेताओं की असहिष्णुता का परिचायक है। इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति भक्तिभाव दिखाने की प्रवृत्ति का भी सबूत मिलता है। कबीर ने आलोचक को मित्र समझ कर साथ रखने की सलाह दी थी पर भाजपा नेताओं को कबीर की सलाह कतई नहीं भाती। पीयूष गोयल ने जहां शौरी को पदलोलुप साबित करने की कोशिश की है, वहीं दूसरों को भी चेताया है कि जो शौरी की राह चलेगा, उसकी भी इसी अंदाज में निंदा करेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने बंपर बहुमत इस उम्मीद से दिया था कि मोदी सरकार उनके अच्छे दिन ला देगी। पर सरकार के ग्यारह महीने के कामकाज से अच्छे दिनों का कोई आगाज नहीं हो पाया है। यह सही है कि प्रधानमंत्री अपने स्तर पर ईमानदारी से कोशिश कर रहे हैं पर उनकी कार्यप्रणाली आलोचनाओं से परे नहीं है। इसमें अपने ही साथियों पर भरोसा नहीं करने की खतरनाक प्रवृत्ति भी है। यही वजह है कि अरुण जेटली, अमित शाह और पीयूष गोयल की तिकड़ी को छोड़ शायद ही कोई मंत्री अपनी स्थिति से संतुष्ट हो।

यूपीए सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना था। वह सरकार जाते-जाते लोकपाल कानून बना गई। लेकिन मोदी को ग्यारह महीने में लोकपाल संस्था में नियुक्तियों की न जरूरत महसूस हुई और न फुर्सत मिली। उनके विरोधी अगर यह कह कर उनकी आलोचना कर रहे हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते भी उन्होंने लोकायुक्त को अस्तित्व में नहीं आने दिया था तो इसमें गलत क्या है?

इससे यह संकेत भी मिलता है कि लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं पर भी उन्हें भरोसा नहीं। वे खुद जो करते हैं, बस उसी को सही मानते हैं। देश का चुनाव आयोग कहने को तीन सदस्यीय है। पर इस समय उसमें अकेले सदस्य मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग का कामकाज भी अर्से से ठप पड़ा है। इसका असर सीबीआइ की नियुक्तियों पर भी हुआ है। नियमानुसार सीबीआइ में किसी भी अफसर की नियुक्ति सतर्कता आयोग की मंजूरी के बाद ही हो सकती है।

यह भी पढ़ें: शौरी पर भाजपा ने कसा ताना, कहा: अच्छे समय के मित्र ने बदल दिए सुर

इसी तरह देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में भी जजों के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं। जजों की नियुक्ति के लिए लंबी कवायद के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का कानून तो जरूर बना दिया पर उसका गठन अभी तक नहीं हो पाया है। अलबत्ता इस कानून को जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलने से नई मुश्किल पैदा हुई है। मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने याचिका का निपटारा होने तक आयोग की चयन समिति में शामिल होने से इनकार कर सरकार की मुश्किल और बढ़ा दी है।

और तो और राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा प्राधिकरण के ज्यादातर पद भी मोदी सरकार की अनिर्णय और लटकाऊ कार्यप्रणाली के कारण खाली पड़े हैं। करीब एक दर्जन राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति तक की सरकार को फुर्सत नहीं है। नतीजतन राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को करीब नौ सौ किलोमीटर दूर स्थित शिमला के राजभवन का जिम्मा भी उठाना पड़ रहा है। इसी तरह हरियाणा के राज्यपाल के पास पंजाब के राज्यपाल का भी कार्यभार है। दूसरे कई राज्यपालों पर भी इसी तरह का बोझ होना अटपटा लगता है।

अनिल बंसल

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  1. S
    suresh k
    May 4, 2015 at 4:01 pm
    बंसल जी काहे को कागज ख़राब करते हो ? सोररीजी ने बालको बेच कर निहाल कर दिया , पार्टी आज भी शर्मिंदा है ,इन घिसे पिटो के लिए काहे का रोना रोते हो , इन्हे सफाई के काम पर लगाओ
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