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अनुच्छेद-370 को रद्द नहीं किया जा सकता: हाई कोर्ट

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने कहा है कि राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करने वाले अनुच्छेद 370 ने संविधान में स्थायी जगह हासिल कर ली है और यह संशोधन, हटाने या रद्द किए जाने से परे है..
Author श्रीनगर | October 12, 2015 11:26 am

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने कहा है कि राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करने वाले अनुच्छेद 370 ने संविधान में स्थायी जगह हासिल कर ली है और यह संशोधन, हटाने या रद्द किए जाने से परे है। अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर में लागू मौजूदा कानूनों को ‘संरक्षण’ प्रदान करता है।

न्यायमूर्ति हसनैन मसूदी और न्यायमूर्ति राज कोटवाल के खंडपीठ ने अपने 60 पृष्ठों के फैसले में कहा, ‘अस्थायी प्रावधान के शीर्षक के तौर पर और पैरा 21 में अस्थायी, परिवर्तनकारी और विशेष उपबंधों के शीर्षक से शामिल किया गया अनुच्छेद 370 संविधान में स्थायी जगह ले चुका है’। पीठ ने कहा कि इस अनुच्छेद को संशोधित नहीं किया जा सकता, हटाया नहीं जा सकता या रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि देश की संविधान सभा ने उसे भंग किए जाने से पहले इस अनुच्छेद को संशोधित करने या हटाए जाने की अनुशंसा नहीं की थी।

अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 370 (1) के तहत राष्ट्रपति को संविधान के किसी उपबंध को कुछ सुधारों के साथ राज्य पर लागू करने का अधिकार है जिन्हें वह (राष्ट्रपति) सरकार की सहमति से उचित समझते हों। हाई कोर्ट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर ने भारत के अधिराज्य को स्वीकार करते हुए सीमित संप्रभुता हासिल की और दूसरी रियासतों की तरह भारत के अधिराज्य के साथ उसका विलय नहीं हुआ। उसने कहा, ‘राज्य के लिए उसे मिली सीमित संप्रभुता के साथ उसका विशेष दर्जा बना हुआ है’।

हाई कोर्ट ने कहा, ‘अनुच्छेद 370 के तहत सीमित संप्रभुता या विशेष दर्जा संविधान का एकमात्र ऐसा प्रावधान है जो राज्य पर खुद से लागू होता है। अनुच्छेद 370 के जरिए जिस एकमात्र अन्य संवैधानिक प्रावधान को लागू करने योग्य बनाया गया है, वो अनुच्छेद 1 है’। उसने कहा कि अनुच्छेद 370 (1) के तहत संविधान में कोई दूसरा प्रावधान नहीं है जो राज्य के साथ विचार-विमर्श के बाद आए राष्ट्रपति के आदेश के सिवाय राज्य पर लागू होने योग्य हो। अदालत के मुताबिक, भारत के शासन और राज्य की तय संवैधानिक रूपरेखा अनुच्छेद 370 में उल्लिखित है। इसका मूल विलय के दस्तावेज के पैरा 4 और 7 में हैं।

हाई कोर्ट ने अनुच्छेद 370 के संदर्भ में कहा कि राज्य पर संसद की विधायी शक्ति बुनियादी तौर पर तीन विषयों-रक्षा, विदेश मामले और संचार-तक सीमित है जिसका विलय के दस्तावेज में उल्लेख किया गया है। उसने कहा, ‘बहरहाल, राष्ट्रपति के पास इसकी शक्ति है कि वे संविधान के दूसरे उपबंधों और उन कुछ दूसरे कानूनों को भी राज्य पर लागू कर सकते हैं जो विलय के दस्तावेज में उल्लिखित विषयों से संबंधित हैं। इस तरह के उपबंधों और कानूनों को लागू करते हुए अधिकार के इस्तेमाल में राज्य सरकार के साथ विचार-विमर्श शामिल होता है’।

अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 370 के खंड (3) के प्रावधानों के संदर्भ में संविधान सभा को यह अधिकार है कि वह राष्ट्रपति से इसकी अनुशंसा कर सकती है कि अनुच्छेद 370 को समाप्त घोषित किया जाए या अनुशंसा में उल्लिखित अपवादों और सुधारों के साथ यह संचालित हो। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने कहा, ‘संविधान सभा ने 25 जनवरी, 1957 को भंग किए जाने से पहले ऐसी कोई अनुशंसा नहीं की’।

उसने कहा, ‘नतीजतन, अनुच्छेद 370 के अस्थायी उपबंध वाले शीर्षक के तौर पर उल्लिखित होने के बावजूद यह संविधान का एक स्थायी प्रावधान है। इसे रद्द नहीं किया जा सकता, हटाया नहीं जा सकता या फिर इसमें संशोधन भी नहीं हो सकता क्योंकि अनुच्छेद 370, खंड (3) के तहत दी गई व्यवस्था अब मौजूद नहीं है’।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में अनुच्छेद 368 को इस संदर्भ में अमल में नहीं लाया जा सकता, यद्यपि यह अनुच्छेद 370 को नियंत्रित नहीं करता है जो संविधान का एक स्व-नियंत्रित प्रावधान है। हाई कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 के प्रावधान और अनुच्छेद 368, उपबंध को संविधान में जोड़ा गया है और ये राज्य पर लागू होते हैं। उसने कहा, ‘अनुच्छेद 35ए राज्य में लागू मौजूदा कानूनों और 1954 के बाद राज्य विधायिका के क्रियान्वियत किसी भी कानून को संरक्षण देता है’।

संविधान का विधान:
अस्थायी प्रावधान के शीर्षक के तौर पर और पैरा 21 में अस्थायी, परिवर्तनकारी और विशेष उपबंधों के शीर्षक से शामिल किया गया अनुच्छेद 370 संविधान में स्थायी जगह ले चुका है। इस अनुच्छेद को संशोधित नहीं किया जा सकता, हटाया नहीं जा सकता या रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि देश की संविधान सभा ने उसे भंग किए जाने से पहले इस अनुच्छेद को संशोधित करने या हटाए जाने की अनुशंसा नहीं की थी।…. न्यायमूर्ति हसनैन मसूदी और न्यायमूर्ति राज कोटवाल के खंडपीठ ने कहा

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