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BLOG: बिहार में हार के बाद मोदी को ढीले करने होंगे तेवर, अमित शाह को छोड़नी होगी अध्‍यक्ष की कुर्सी

पांच चरणों में लगभग एक माह तक चले बिहार विधानसभा के अभूतपूर्व चुनावी दंगल का परिणाम सामने आ चुका है। इस कटुतापूर्ण चुनावी समर में जीतने के लिए कोई एैसा हथकंडा नहीं होगा जो दोनों पक्षों की ओर से अपनाया न गया हो। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण एवं जातीय उन्माद पैदा करने की भी भरपूर कोशिश की गई।
विधानसभा के इन चुनावों ने इसलिए नीतीश कुमार को एक नया जीवन प्रदान किया है। नीतीश कुमार अब भारत में विपक्ष की भूमिका के केन्द्र बिन्दु बनकर उभर सकते हैं। (फोटो: प्रशांत रवि)

पांच चरणों में लगभग एक माह चले बिहार विधानसभा के अभूतपूर्व चुनावी दंगल का परिणाम सामने आ चुका है। इस कटुतापूर्ण चुनावी समर में जीतने के लिए कोई एेसा हथकंडा नहीं होगा जो दोनों पक्षों की ओर से अपनाया न गया हो। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण एवं जातीय उन्माद पैदा करने की भी भरपूर कोशिश की गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन चुनावों में जीतने के लिए लगभग तीस बड़ी-बड़ी रैलियां करके एक नया कीर्तिमान खड़ा किया है। सभाओं में उमड़ी भीड़ को देखकर मोदी जी को कभी एहसास ही नहीं हुआ होगा कि चुनावों के नतीजे इतने निराशाजनक होंगे। पूर्व में लिखे मैंने अपने लेखों में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि इन चुनावों के परिणाम बहुत दूरगामी प्रभाव डालेंगे।

अब निःसन्देह कहा जा सकता है कि इन चुनावों का प्रभाव सबसे ज्यादा नरेन्द्र मोदी पर व्यक्तिगत रूप से पड़ने वाला है क्योंकि भाजपा में अब असंतोष के स्वर और मुखर हो जाएंगे। गृह सचिव रह चुके भाजपा के वर्तमान सांसद आर.के. सिंह ने पार्टी की शर्मनाक हार के जिम्मेवार लोगों को चिन्हित करने की मांग उठा दी है। निश्चित रूप से उनका इशारा सीधे प्रधानमंत्री एवं अमित शाह की ओर जाता है क्योंकि वे टिकटों के बंटवारे के समय से ही नाराज होकर कोपभवन में बैठ गये थे। उनकी नाराजगी का आलम इस हद तक पहुंच गया था कि उन्होंने मतदान करना भी गवारा नहीं समझा।

शत्रुघ्न सिन्हा की नाराजगी किसी से छिपी हुई नहीं है। अब कई और बड़े नेता भी मोदी के एकाधिकार को चुनौती देने की कोशिश करेंगे। एल.के. आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और शान्ता कुमार जैसे कई वरीय नेताओं की कुंठा की परतें भी अब खुलने लगेंगी। अमित शाह की निरंकुश कार्यप्रणाली पर भाजपा में पहले से ही उंगलियाॅ उठ रही थीं। उन्‍हें अब शायद अध्यक्ष पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़े।

बिहार के चुनावों का असर भारत की राष्ट्रीय राजनीति पर भी अवश्य पड़ेगा। विपक्ष और अधिक एकजुटता के साथ लोकसभा में सत्ताधारी दल के सामने अड़चनें खड़ी करेगा। राज्यसभा में तो भाजपा के अल्पमत में रहने के कारण पहले से ही गतिरोध जारी था। बिहार के चुनावों में हार के बाद सदन चलाने के लिए मोदी को अपने तेवर अब काफी ढीले करने पड़ेंगे। आरएसएस और भाजपा के बीच भी गलतफहमी पैदा होने की आशंका बनेगी क्योंकि सरसंघ चालक मोहन भाग्वत का आरक्षण पर दिया गया बयान भी भाजपा को चुनावों में काफी नुकसान पहुंचा गया है।

बिहार का चुनाव भाजपा के मनोबल को कमजोर करेगा जिसका प्रभाव वर्ष 2016 में बंगाल, केरल, पंजाब, असम जैसे राज्‍यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। वैसे भी इन राज्यों में भाजपा का जनाधार काफी कमजोर है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी का कद छोटा होगा क्योंकि बिहार के चुनावों ने यह संदेश तो दे ही दिया है कि अब भारत में मोदी लहर लगभग खत्म हो चुकी है।

इन परिस्थितियों को पैदा करने के लिए बहुत हद तक मोदी खुद जिम्मेवार हैं। पिछले 18 महीनों में उनके कारनामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि उनकी कथनी और करनी में काफी अन्तर है क्योंकि एक ओर वे सार्वजनिक मंचों एवं प्रचार माध्यमो के द्वारा ‘‘सबका साथ, सबका विकास” करने की बात करते हैं, वहीं उनका व्यवहार इस कथन से सर्वथा विपरीत रहा है।

अनर्गल बयान देने वाले भाजपा के किसी सांसद या नेता के खिलाफ नरेन्द्र मोदी ने आज तक कोई कारवाई नहीं की है। अगर किया होता तो जनता पर इसका काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा होता। साहित्यकारों, फिल्मकारों एवं वैज्ञानिकों को अपने अलंकरण वापस करने की नौबत ही नहीं आती। सरकार एवं भाजपा के प्रवक्ताओं द्वारा टीवी चैनलों पर भी भड़काऊ बयानों के लिए किसी नेता की निंदा तक नहीं की गई। उल्टे साहित्यकारों को ही कांग्रेस और वामपंथियों का पिट्ठू बताकर अपमानित करने की कोशिश की गई।

अनुपम खेर के नेतृत्व में सरकार द्वारा प्रायोजित फिल्मकारों की रैली करना भी एक नकारात्मक कदम था। क्योंकि सभी जानते हैं कि अनुपम खेर भाजपा सांसद किरण खेर के पति हैं। भाजपा ने यदि शालीनता से सकारात्मक कदम उठाया होता तो साहित्यकारों एवं अन्य बुद्धिजीवियों को आसानी से मनाया जा सकता था लेकिन उनके घावों पर नमक छिड़कने का काम किया गया है।

बिहार के चुनाव एक तरफ जहां नरेन्द्र मोदी को अत्यधिक दबाव में ला देंगे वहीं पिछले 18 महीनों से मोदी की तीखी आलोचनाओं से घायल नीतीश कुमार को नई ऊर्जा मिलेगी। वर्ष 2013 में भाजपा से एकतरफा नाता तोड़ लेने के कारण वर्ष 2014 के संसदीय चुनावों में नीतीश कुमार लोकसभा की दो सीटें ही जीत पाए थे। लेकिन अब वह विपक्ष की भूमिका के केन्द्र बिन्दु बनकर उभर सकते हैं। ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल ही नहीं, शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे जैसे लोगों का नीतीश को उनकी जीत पर दिल खोलकर बधाई देना इस बात का संकेत है। बिहार के चुनावों ने भाजपा को एैसी चोट पहुंचाई है जिससे निजात पाने के लिए उसे भगीरथ प्रयास करने पड़ेंगे।

(लेखक इंदर सिंह नामधारी झारखंड विधानसभा के अध्‍यक्ष और पूर्व सांसद हैं)

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